Friday 22 August 2008

कुत्ते भी इन्सानियत अपनाने लगे हैं

कुत्तों में भी

इन्सानी गुण आने लगे हैं


जाते थे पहले पतिदेव

साथ बाज़ार

लेकिन अब

कुत्ते साथ जाने लगे हैं


नौकर मन ही मन देता है

साहब को गालियॉ

देखा है, कुत्ते भी

मालिक को गुर्राने लगे हैं


करते हैं प्यार भरी बातें

झाड़ियों के पीछे, प्रेमीयुगल

कुत्ते तो

खुलेआम इश्क लड़ाने लगे हैं


प्यार में होती है मारपीट

प्रेमियों के बीच

कुतिया को लेकर, कुत्ते भी

एक दूसरे को काट खाने लगे हैं


युवतियों को देख लार टपकाते

देखा है बूढ़ों को

बुजुर्ग कुत्ते भी, जवान

कुतियों पर नज़र गड़ाने लगे हैं


इन हरकतों को देख

लगता है जैसे

कुत्ते भी

इन्सानियत अपनाने लगे हैं


- मनीष

Sunday 17 August 2008

आखिरी पड़ाव

 

             सिन्दूरी शाम, मन्द गति से चलती हवाएँ और डूबता हुआ सूरज। इन सबसे बेखबर गाड़ियाँ नैनी ब्रिज पर दौड़ रही है और कुछ लोग चहलकदमी कर रहे हैं। कुछ लोग उफान ले रही यमुना नदी को निहार रहे हैं और कुछ थूकने के बाद थूक के प्रक्षेपण मार्ग का अवलोकन कर रहे हैं। विचरण हेतु आये सभी लोग अपने में मस्त हैं। इन्ही के बीच एक किनारे खड़ी बीस वर्षीय युवती अपने अतीत को निहार रही थी। अतीत, जिसमें वह खिलखिलाई, हँसी, मुस्कुराई और गमज़दा हुई। अतीत, जिसमें एक प्यार छिपा था माँ का, बाप का, भाई बहन का। अतीत, जिसमें लड़कपन था, अल्हडपन था और थोड़ी सी शरारत। अतीत, जिसमें उल्लास था कुछ कर गुजरने का जज्बा था। अतीत, जिसमें एक प्यार का फूल खिला था। अतीत, जिसमें फरेब था, धोखा था, छलावा था, दर्द था, दुख था। और वह अतीत, जिसमें हार थी, बेचैनी थी, घुटन थी।

 

          सारे अतीत के पन्ने एक एक कर उसके सामने खुल रहे थे। कितनी ख्वाहिशें थी मन में लेकिन … । एक आँसू की पतली धार उसके आँखों से बह चली। लेकिन उस वक़्त इस आँसू को कोई पोछने वाला वहाँ कोई नही था और आँसुओं की यह धार लम्बी खिंचती चली गयी।

 

            चार साल पहले ही तो वह बुन्देलखण्ड से इलाहाबाद आई थी पिता की होनहार बेटी बनकर। इलाहाबाद यूनिर्वसिटी से ग्रेजुएशन किया था और 75% अंक बटोरे थे वह भी B.Sc.(Maths) से। लेकिन सब व्यर्थ ही जायेगा शायद। कितनी खुशी से उसने M.Sc.(Maths) में प्रवेश लिया था, इस बात से बेखबर कि यह रास्ता उसके जीवन डगर को छीन लेगा। प्रवेश की खुशी अभी कम भी न हो पायी थी कि फ्रेशर पार्टी में उसे मिस फ्रेशर चुन लिया गया। इतनी खुशी एक साथ मिल जाने के कारण वह कुछ सोच समझ भी न पाई थी कि मतलबी लोगों के जाल में फँस गयी और यह जाल उसे नैनी ब्रिज पर ला खड़ा किया।

             

                   अपने अतीत की यादों में सिसकते हुए उसने एक दोस्त को फोन किया लेकिन उस दोस्त ने फोन रिसीव नही किया, दूसरे को किया लेकिन कोई उत्तर नही मिला, फिर तीसरे को, फिर चौथे को फिर……फिर और फिर। लेकिन उसके दोस्तों को अब उसकी कोई ज़रूरत नही रह गयी थी।

 

                वह झुंझलाहट के मारे चीख पड़ी। कई दिन के तनाव ने उसके सोच समझ को जकड़ रखा था नतीजन वह नदी में छलांग लगाने को उतावली हो गयी और बिना कुछ विचार किये नैनी ब्रिज से यमुना नदी में कूद पड़ी।

 

              शरीर का भार जो अब शून्य था, हवा का बहाव जो नदी के पानी तक पहुँचने से उसे रोक रहा था। इन सब चीजों ने शायद उसकी चेतना लौटा दी थी लेकिन तब तक देर हो गयी थी। एक जोरदार छपाके की आवाज़ के साथ वह यमुना नदी की गहराई मे दाखिल हो गयी। मटमैले पानी के स्वाद से उसका मुँह भर गया। पानी की एक तेज़ धार उसके आँसुओं को धुलती हुई अन्दर तेजी से बढ़ी। इसने उसे रोकना चाहा लेकिन मुँह अनायास ही खुल गया और पानी की वह धार गले से नीचे उतर गयी। उस समय वह पानी से बाहर आने के लिये बुरी तरह छटपटा रही थी। हाथ पैर तेजी से हिल रहे थे लेकिन सब व्यर्थ। आँखे मिट्टी से भर गयी और एक भयानक अंधेरा उसके सामने तैर गया। उसे सहायता की ज़रूरत थी लेकिन सहायता इस तेज बहाव के कारण काफी पीछे छूट गयी। उसका दम घुटने लगा और जीवन के सारे दृश्य अचानक ही उससे होकर निकल गये और दिल ने धड़कना बन्द कर दिया। वह निढाल सी होकर तलहटी में घिसटने लगी। घिसटते-घिसटते वह बहुत दूर निकल गयी। इतनी दूर कि कोई अपना उसे ढूँढ न पाये।

 

          नैनी ब्रिज से कई खुले मुँह और फटी आँखे उसे पानी में तलाश रही थी।

 

            कितनी अजीब बात है जब वह इलाहाबाद आई थी तो नैनी ब्रिज निर्माणाधीन था। शायद उसके जीवन का आखिरी पड़ाव यही था।

 

      या फिर

          वह अभी भी सफर कर रही होगी नदी की तलहटी में घिसटते हुए……

 

            उसके सड़ चुके बदन को कई कीड़े चाट रहे होंगे और वह किसी जंगल में नदी के किनारे लग गयी होगी। उसका सुन्दर शरीर जानवर खा रहे होंगे।

 

             शायद आखिरी पड़ाव से गुजरना अभी बाकी है।

 

नोट – अभी कुछ दिन पहले घटी इस घटना ने मन को व्यथित कर दिया। मैनें अपने जीवन का सातवाँ सहपाठी खोया है। इलाहाबाद यूनिर्वसिटी से B.Sc.(Maths) करते समय भी मैने एक दोस्त को खो दिया था।

Saturday 16 August 2008

नाना पाटेकर की आवाज में रिंगटोन

          आजकल युवाओं में तरह तरह के रिंगटोन बजाने की होड़ सी मची है। पान की दुकान के पास कोई रिंगटोन बजा रहा है तो कोई सिंगटोन …

         और कुछ शाही लोग तो काफ़ी कुछ देख सुन लेते हैं।

    लेकिन ऐसे क्लिप्स मिल जाये तो फिर क्या बात …

  आप भी सुनिये …और खामोश चेहरे पर मुस्कान ले आइये :)

ज़रा इस पर भी कान लगाईये…

कैसा लगा???

 

नोट - आवाज न सुन पाने की स्थिति में कृपया इसे इन्टरनेट एक्स्प्लोरर में ही चलाये।

Friday 15 August 2008

…ए बेटी रखती तोहके कुँवार

         भोजपुरी गाने अकसर फूहड़ ही  होते हैं, लेकिन इसे देख मेरी सोच बदल गयी।

              कुछ तो ऐसे हैं जो आँसू निकाल देते हैं।

Sunday 10 August 2008

‘अछूत’

 

              आसमान पर कुछ सफ़ेद बादल धीमी गति से तैर रहे थे । धीमी हवा कभी कभी मेरे बालों को उड़ा देती । सूरज एक बादल की आड़ मे छिपा बैठा था और उस उड़ते बादल की छाया धीरे धीरे मुझसे दूर टीले की तरफ़ भागी जा रही थी । मैं भी उस टीले की तरफ़ अपने बचपन के साथी संदीप के साथ जा रहा था । छुटपन मे हम लोग इसी टीले के उस पार मल विसर्जन किया करते थे । कई वर्ष बाद उससे मुलाक़ात हुई तो हमने पुराने दिनों की याद ताज़ा करने हेतु व्यर्थ भ्रमण करने का विचार बनाया था और पहला गंतव्य इस टीले को चुना गया ।

 

   हम दोनों चुपचाप टीले की तरफ़ चले जा रहे थे ।

 

       कुछ ही देर में हम टीले के करीब थे । टीला वैसे ही डरावना लग रहा था जैसा कि बचपन में लगता था । मैनें टीले पर चढ़ते ही नाग की बिल की तरफ़ देखा और चुप्पी तोड़ते हुए संदीप से पूछा –

“ कालिया है”

“ नहीं !! कुछ साल पहले गाँव वालों ने मार दिया”

संदीप ने हल्के स्वरों में ज़वाब दिया ।

“क्यों ???”

“ठाकुर साहब को दौड़ा लिया था , बस मार दिया”

“ये ठाकुर साहब कहाँ से पैदा हो गया ,ये कौन है???”

“ अरे वही लँगड़ा का पूत ……स्साला……”

   एक भद्दी गाली उसके मुँह से निकली । और तुरंत ही चुप हो गया ।

         हम लोग टीले पर चढ़ चुके थे । हवा कुछ तेजी से बहने लगी थी और मेरे बाल बिखर से गये । सरपतों के झुंड चारों तरफ़ फैले थे और हवा के वेग से झुक जा रहे थे । उन्हीं के बीच एक सियार दुबका बैठा था । साँप की दो तीन केचुल छोटी घास पर पड़ी हिल रही थी । छुटपन मे इन्ही को देखकर मैं जोर से भागने लगता था लेकिन आज धीमे कदमों से चलते हुए मुस्कुरा रहा था ।

 

      टीले की पगडंडियों से होते हुए हम कटीली झाड़ियों तक आ गये थे जहाँ एक बड़ा सा बबूल का पेड़ था जिसके तने से एक चिपचिपा पदार्थ निकलता था जिसे हम लोग च्यूंइगम की तरह चबाते थे और सामने ही टीले के नीचे पौहारी बाबा के ट्यूबवेल का खंडहर था । मैने संदीप से वहां जाने की इच्छा जताई ।

     

         संदीप सरपतों के झुंड से होता हुआ ,घनी झाड़ियों मे सरकता चला गया । टीले की ढाल इस तरफ़ कुछ ज्यादा थी। मैं भी सरपतों को पकड़ता हुआ धीरे धीरे नीचे चला आया। टीले के इस पार नीरवता छाई थी बिल्कुल शान्त !

 

      कुछ ही दूरी पर पौहारी बाबा के ट्यूबवेल का खंडहर था और पास मे ही एक घनी छांह वाला नीम का पुराना पेड़ जिसे पौहारी बाबा के पिता ने लगाया था और उसके चारों तरफ़ सीमेंट का चबूतरा बाबा ने बनवाया था । समय के साथ यह भी बिल्कुल बिखर सा गया था । मैं चुपचाप वहाँ जाकर बैठ गया लेकिन संदीप कुछ बेचैनी से यहाँ वहाँ टहल रहा था । मैने उसे बुलाते हुए कहा –

“आ जाओ भाई ,कुछ सुस्ता लिया जाये । गाँव से काफ़ी दूर आ गये हैं”

वह चुपचाप आकर बगल में बैठ गया

 

        सामने से आती मैदानी हवाएं कुछ अच्छी लग रही थी । दूर – दूर तक वीरानियाँ फ़ैली थी सब कुछ शांत, केवल दर्जन भर खड़े पेड़ों की पत्तियाँ हवा के साथ संगीत बिखेर रही थी ।

 

        दूर कुछ धूमिल सी दिखती कुछ झाड़ियॉ दिखी , और मैने उत्सुकता वश बगल में बैठे संदीप से पूछ लिया –

“पोखरा मे पानी है”

“हाँ लेकिन अब कोई वहाँ जाता नहीं” ,

“तो पहले ही वहाँ कौन जाता था!!” मैने उबासी लेते हुए कहा ।

वह फ़िर चुप हो गया ।

 

    बचपन मे हम लोग चोरी छिपे इस तरफ़ बहुत आया करते थे , लेकिन गांव वाले इधर झाँकने भी न आते थे क्योकि यह साँप प्रधान क्षेत्र था , और कालिया जैसा खतरनाक साँप इस क्षेत्र की रखवाली करता था । इसके बावजूद हम इधर आते और प्रकृति के सौन्दर्य को निहारते । घनी झाड़ियों से घिरे उस पोखरे का पानी पीते और सारा दिन इमली और आम तोड़ कर खाते । कुछ लोग कहते थे कि पोखरे के पास एक चुड़ैल है । लेकिन हमने तो आज तक नहीं देखी ।

 

            कही से फ़ूलों की गंध आ रही थी । बगल में लाल बड़ी चींटियों की कतार पेड़ पर जा रही थी और मेरी नज़र दूर उस पोखरे की तरफ टिकी थी एक याद का साया अचानक तैर सा गया और एक लालिमा लिये गोरा सा चेहरा आँखो के सामने आ गया। वह पुष्पा ही तो थी …

 

         हवा कुछ अधिक तेज बहने लगी थी । पेड़ों की पत्तियाँ कुछ ज्यादा आवाज करने लगी थीं । आसमान में अब भी सफेद बादल तैर रहे थे, लेकिन अब कुछ गिद्ध बादलों के पास मडरा रहे थे , और पुष्पा मेरे इर्द गिर्द ।

 

      उस दिन भी सफ़ेद फ़ाहे जैसे बादल तैर रहे थे और गिद्ध ऊँची उड़ान भर रहे थे, जब पोखरे पर मेरी आँखें पुष्पा के नंगे बदन को देख अचानक बन्द हो गयी थी।

 

       लेकिन बन्द होने से पहले आँखों ने बहुत कुछ देख लिया था, जिसमें शर्म के मारे लाल हुई पुष्पा का चेहरा भी था। शर्मा तो मैं भी गया था, आखिर वह अचानक ही तो वह पानी से बाहर निकली थी, और अचानक ही मैं झाड़ियों से अन्दर पोखरे पर गया था। सब कुछ अचानक ही तो हुआ था। वह जड़वत वही खड़ी रही और मैं आखें बन्द किये खड़ा रहा। आँखें तो बन्द ही थी लेकिन वह दृश्य अभी तक सामने था, साँस फूल रही थी और आँखें खुलने का प्रयास कर रहीं थीं।

 

          कानों ने कुछ सुना शायद पहली बार उस आवाज ने मेरे कानों को चूमा था, उसकी आँखें तो कई बार मेरी आँखो को चूमी थीं, शायद आवाज का चूमना अभी शेष था। लेकिन कानों ने जो सुना उसे सुन आँखें खुल गयी और वह दृश्य एक बार फिर दोहरा उठा। उसके कपड़े मेरे पीछे एक कँटीली झाड़ी पर फैले थे। जिसे मागने के लिये उस आवाज ने कानों पर दस्तक दी थी।

 

       मैं अपने आप को असहज महसूस कर रहा था लेकिन फिर भी मैने उसके कपड़े झाड़ियों से उतार कर उसके करीब पहुँचा। वह अपनी आँखें ज़मीन पर गड़ाये सिमटी जा रही थी। कपड़े देते ही मेरे कदम तेजी से वापस मुड़ गये, और झाड़ी से बाहर आकर ठिठक गये। मुझे लगा था कि माफी मागना जरूरी है।

 

        कुछ देर बाद वह कपड़ों से लिपटी बाहर आ गयी और मुझे वही खड़ा देख तेज रफ्तार से टीले की तरफ जाने लगी। मैने उसे रोका था और अटकते हुए कहा था “गलती से…”

 

      वह हल्की सी मुस्कुराई थी और बोली “गलती कैसी, ये किसी का घर थोड़े ही है……”

 

       और उसके शब्द बढ़ते गये उन शब्दों मे असलियत थी एक लाचारी थी, एक संवेदना थी…

 

          उस रोज पता चला कि निम्नवर्ग की औरतें, लड़कियाँ बाहर खुले में कैसे नहा लेती हैं शायद यही कारण था कि वह गांव से इतनी दूर इस एकान्त में आई थी।

 

     उसके शब्द समाप्त हो गये थे और मेरे पास कुछ न शेष था लेकिन उसके शब्दों ने मेरे सम्मान को वापस लौटा दिया। जाते हुए उसने अपने आप को अछूत कह गयी। और मैं देर तक वहीँ खड़ा झाड़ियों मे उलझता रहा।

 

         उस दिन को गुजरे एक अरसा बीत गया। लेकिन मेरी निगाहें उन्हीं झाड़ियों में अटकी थी शायद पुष्पा को ढूँढना चाहती थी, उसी रूप में……

 

           लेकिन शायद वह फिर न दिख सकेगी क्योंकि वह अदृश्य रूप में वहाँ नहा रही होगी या हो सकता है कि वह पोखरे वाली चुड़ैल की सहेली बन गयी हो। क्योंकि अब पुष्पा नही रही। गाँव के कुछ सवर्णों के कपूतों ने एक दिन पोखरे पर उसकी अस्मत लूट ली थी और पोखरे के पानी में उसे डुबोकर मार डाला। कई दिन तक वह पानी में नहाती रही। सियार उसे पानी से बाहर खींच लाये थे और मरने के बाद भी उसे लूट रहे थे। कौवे स्तनों पर चोंच मार रहे थे। इन सबसे बेखबर पुष्पा हवाओं मे तैर रही थी।

 

         शायद उसकी चींखें इस वीरानें ने अपनी यादों मे रख लिया होगा, तभी तो आज भी वहाँ मनहूस खामोशी छाई हुई है।

 

       मैं अपनी जगह से उठा और उस पुराने पोखरे की तरफ चल पड़ा।

          एकाएक एक तेज हवा का झोंका उस तरफ बह चला। शायद पुष्पा आज भी उन्हीं झाड़ियों के बीच नग्न होकर सिसक रही है।

Friday 8 August 2008

अरे रे मेरी जान है राधा


पिछले
दिनों एक दोस्त की पेन ड्राइव में कुछ वीडियो सांग दिखे। जिसमें से कुछ बेहद पसंद आये, इनमें से कुछ गीत ऐसे हैं जो काफी लोक प्रिय हुए हैं जैसे

अरे रे मेरी जान है राधा ....

सपने में रात में ......

सखी मोरी पनघट ......

सुन यशोदा ......

आजा कलयुग में .......


ये सारे गीत हर घर में आज भी बड़े चाव से देखे और सुने जाते हैं। बूढ़े पुरनियों को ये गीत बहुत पसंद आ रहे हैं तो वही बच्चे इस गीत पर थिरक रहे हैं क्योंकि ये सारे गीत नन्हें मुन्हों पर ही फ़िल्माया गया है।


मुझे आज भी याद है वो रात, जब मैं बस से इलाहाबाद से निकल रहा था। कुछ दूर पर एक कार्यक्रम हो रहा था जिसे बच्चे प्रस्तुत कर रहे थे जिन्हे देखने के लिये ड्राइवर ने एक घंटे बस रोक रखी थी लेकिन किसी ने विरोध नही किया था सब अरे रे मेरी जान है राधा देख कर झूम रहे थे।


हमारे ऐसे बन्धु जो विदेश मे रह रहे हैं या ऐसे जो भारत में रह कर भी इसका लुत्फ़ न उठा पाये हों उनसे कहूंगा कि एक बार तो देख ही लें।


अगर गीत न मिल रहा हो तो मुझसे कहे मैं मेल करने को तैयार हूँ :) :)


विचार था कि यहाँ अपलोड कर ही दिया जाय लेकिन विचार पर एक और बड़े विचार ने ग्रहण लगा दिया।

अगर देखे हो तो ज़रा सा मुस्कुरा भर दीजिये। :) :) :)


Wednesday 6 August 2008

मैं और मेरा सीधापन

 

               आज एक महत्वपूर्ण दिन है, अरे भाई नागपंचमी का त्यौहार है। आज इस दिन के मौके पर कई मन्दिरों में नाग देवता पूजे जायेंगे, दूध दही से नहलाये जायेंगे और वही मन्दिर के ठीक बाहर कई नाग फन फैलाये टुकुर टुकुर देख रहे होंगे और मदारी हाथ फैलाये। कई जगह मेला भी लगेगा जैसे कि यहाँ इलाहाबाद में मेरे पूज्य देव नागवासुकी महाराज जो कि इस पेज के सबसे नीचे मेरे साथ विराजमान है लेकिन डर के मारे मेरे पीछे छिपे हैं, कि मानव मेरे भी दाँत न तोड़ दे, इनके यहाँ भी मेला लगेगा। आज मेले में नागवासुकी महाराज देखेंगे कि कैसे ढेर सारे मानवों का जत्था उनके मन्दिर में घुसने के लिये मारपीट करेगा। दूध चढ़ाने के चक्कर में दूध मुँह पर फेक देगा और यह भी देखेंगे कि कैसे उनका दरबार दूध का समंदर बन जायेगा जिसमें दूध से वंचित बच्चे फिसल पड़ेंगे। वाकई आज एक महत्वपूर्ण दिन है।

            इसी महत्वपूर्ण दिन के 23 साल पहले इसी त्यौहार के दिन एक और लाचार इस दुनिया में झटक दिया गया, वो भी सुबह सुबह जब सूरज महाराज अपनी आँख खोलने ही वाले थे। शायद वो यह दृश्य देखना नही चहते थे तभी तो वे काले बादलों की ओट में छिप पड़े थे और बादल उन्हें बहरियाने के चक्कर में बरस पड़े थे। तो ज़नाब मैं ही था वो लाचार और आज ही है मेरा जन्मदिन। हमारे यहाँ जन्मदिन के अवसर पर दीप जलाये जाते हैं और ईश्वर से प्रार्थना की जाती है कि हे! ईश्वर मेरे अन्दर इसी दीप की भाँति ज्ञान ज्योति को प्रज्ज्वलित कीजिए। आजकल जन्मदिन मनाने के खास तरीके हैं जैसे 10-20 मोमबत्ती जलाना और फिर थोड़ी देर बाद फूँक कर बुझा देना और तालियाँ बजाना कि हें हें हें दीप बुझ गया। अगर इस नजरिए से देखें तो गलत अर्थ निकल जायेगा। सबका अपना अपना नजरिया होता है अपने अपने ढंग होते हैं अगर कुछ कह दिया तो हमारे राज भैया की भाँति एक और संदेश मिल जायेगा कि भाई दुनिया में एक आप सीधे (शरीफ़) हैं और दूसरा पता नही।

 

             सीधा होना क्या है मुझे तो पता नही लेकिन हाँ बचपन में जब कोई लड़का किसी लड़के को पटक कर मार देता था तो मार खाये लड़के की माँ शिकायत लेकर पहुँचती थी कि मेरा बेटा सीधा है तो तुम्हारा बेटा इसे मारेगा?? मतलब जो मार खाये वह सीधा। चौराहे पर किसी रिक्शे वाले को थपड़िया रहे कार वाले को देखकर तमाशाबीन कहेंगे कि ये रिक्शा वाला सीधा है तभी तो पलटवार नही कर रहा है। मतलब जो लाचार वह सीधा। सीधे होने की और भी ढेर सारी कंडीशन है जैसे हमारे प्रधानमन्त्री सीधे हैं।

            बचपन से ही मोहल्ले की औरतें मुझे सीधेपन से नवाजती और साथ में यह भी कहती बेचारा सही से बोल नही पाता। मतलब जो बोल न पाये वह सीधा। अपना लड़कपन तो इसी तनाव में गुजार दिया कि मेरा कोई दोस्त नही। कोई हमउम्र मिलता तो पहले हँसता फिर दोस्ती के प्रस्ताव को लात मार देता। जैसा कि सभी जानते है कि दूसरों से फायदा कैसे उठाये, ऐसे भी कुछ मिल गये जो दोस्ती का नाटक कर मजे लिए और काम निकल जाने पर बुरा भला कह गये। मतलब जो बर्दास्त करे वह सीधा।

            धीरे धीरे इतने बरस बीत गये लेकिन मेरी इस सीधाई ने साथ नही छोड़ा और मैं इस सीधेपन के साथ आज धूर्तों की भीड़ में खड़ा हूँ।

 

               गांधी जी ने कहा था कि मौन व्रत रखो सही फैसला कर सकने में मददगार होगा। यहाँ तो इसी व्रत का पालन बचपन से हो रहा है और फैसला कर भी रहा हूँ कि भैया पलटवार करना बेकार है क्योंकि एक तो हम अकेले किसी से मार करने क्यों जाये। पता चले गये भौकाल टाइट करने और माहौल हँसी वाला बन जाय। यहाँ तो दोस्ती भी स्वार्थवश होती है।

              जैसे एक बार किसी समारोह में जाना था तो हमारे एक सहपाठी ने जोर देकर कहा था कि भैया इसको मत ले जाना नहीं तो बेइज्जती हो जायेगी। मतलब जो बेइज्जती कराये वह सीधा।

             सीधाई की बातें कई हैं। बस दुख तभी होता है जब कोई दुख देता है, बाकी कौन है जो पूरा खुश है। इसी बात से हम खुश हैं और रहेंगे।

          सबको अपनी खास सवारी उड़न तश्तरी उड़ाने वाले समीर  भैया  भी इसी सिधाई का फायदा उठा लिये  और  मेरी मिठाई  भी साथ उड़ा ले गये।

  

         खैर मिठाई तो आज खूब खाई लेकिन सीधेपन वाली बात कुछ ज्यादा मीठी लगी।

     

        कुछ लोग देख कर ही नाप लेते है कि किसी व्यक्ति में सीधाई की कितनी मात्रा शेष है। कुछ जाति पूछ्कर नापते है कुछ रंग देखकर … और इनकी सारी गणना इस दोहे से होती है -

       करिया (काला) बाभन (ब्राह्नण) गोर चमार, इनसे रहिये सदा हुसियार (होशियार)।

  

     कुछ मुझे देखते हैं और जाति जानने के चक्कर मे पूरा नाम भी पूछ लेते हैं जब उन्हें पता चलता है कि मैं यादव हूँ तो बात बात में कह देते हैं

  

          "अहीर मिताई तब करे जब सगर जाति मिट जाय"

         फिर  भी मैं  खुश रहता हूँ ……

        अपनी सिधाई और सीधेपन के साथ ………

                                                                                 

Monday 4 August 2008

आज़मगढ़ से इलाहाबाद तक ……

 

            मैं अपने घर बैठा छुट्टियों के मजे ले रहा था कि अचानक खास सूत्र से पता चला कि मेरी प्रायोगिक परीक्षाओं की तिथि घोषित हो चुकी है , जल्दी चले आओ । मैने भी अपनी बिखरी किताबें समेटी और स्पेशल झोला उठा कर इलाहाबाद आने के लिये तैयार हो गया । अभी मैं घर से निकल ही रहा था कि मेरे लंगोटिया यार ने दूर से आवाज़ दी।

कहाँ चल दिये यार ।

इलाहाबाद जा रहा हूँ भाई ।

           अरे यार आज का प्रोग्राम था कि आज हम लोग भाभी को देखने पुल पर जायेंगे , उसका क्या ? – उसने पूछा

      ऐसा कर तू अपनी भाभी को जाकर देख उनसे मिल और चार पाँच जूती खा , मैं तो निकलता हूँ – मैने कहा

अरे यार मैं तो तेरे लिये ही ..….………

                उनके शब्द अभी पूरे भी न हो पाये कि मैने कहा कि भाई मटरगश्ती बाद में पहले परीक्षा दे आउं ।

        अच्छा चल तुझको बस स्टाप तक छोड़ दूं – उन्होने साथ आने की पेशकश की

मैने कहा भाई चल ।

रिमझिम बारिश की हल्की बूँदें आसमान से झर रही थी ।

          बस स्टाप पर पवन गोल्ड बस खड़ी थी । इसे देखकर मैं उसकी तरफ़ दौड़ा क्योंकि ऐसी स्पेशल बसें मुश्किल से मिलतीं है । पिछली बार मैं इसे जोहते जोहते घर लौट आया था ।

बस मे आसानी से सीट मिल गयी , और मेरे साथी भाई से मैने विदा कहा ।

           बस अभी कुछ ही दूर गयी होगी कि एक सुन्दर कन्या देखकर ड्राइवर ने बस रोक दी । हल्की बारिश से कन्या जरा भीग गयी थी । उसने हड़बड़ी में बस में कदम रखा । सब यात्री टकटकी बाँधकर उसे देखने लगे । मेरी बात तो छोड़ ही दीजिये , ऐसे मौके पर मैं शामिल नही होता ।

             वह मेरी बगल में झाँक कर देखी कि एक सीट खाली है । लेकिन एक जवान लड़के को देख वहाँ बैठना उसने उचित न समझा , और आगे जाकर एक बूढ़े दादा के बगल में जाकर उसने स्थान ग्रहण किया ।

              कन्या कुछ ज्यादा ही खूबसूरत थी , नतीजन एक साथ कई जोड़ी आँखें लग गयी मुआयना करने । लेकिन मेरी आँखें उन आँखों का मुआयना कर रही थी,जो बेहयाई से ये दृश्य देख रहे थे। जिन्हें न अपनी उम्र का ध्यान था न ही उन सरोकारों का जो ऐसे मौके पर मक्खन पालिश लगा कर पेश किए जाते हैं। अभी कुछ पल ही बीता था कि उस बूढ़े दादा को बीड़ी पीने की इच्छा हुई, इच्छा क्या अक्सर इस उम्र में ऐसे अवसरों पर वे अन्दर छिपी भावना को रोक नही सकते, आखिर बचपन से बुढ़ौती तक तो वही बातें करते हैं, जिसमें रस मिले। बस फिर क्या था बातों का सिलसिला दादा ने शुरु कर दिया, कहां जाना है, क्यों जाना है, किस लिए जाना है, घर कहां है,बाहर कहां है आदि आदि। कन्या कुछ ज्यादा ही नरम स्वभाव की थी पहली बार सफर मे मेरे साथ भी ऐसा हुआ था बगल बैठे एक आदमी ने लगातार खोपड़ी खाई थी। हम ठहरे शान्तिप्रिय ससुरे ने अशान्ति फैला दिया था। बुढ़उ की हरकत देख कर अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह क्या सोच रहे हैं। अभी वह रिलैक्स होने के लिए बीड़ी सुलगा ही रहे थे कि कन्या ने सीट छोड़ दी। अचानक हुए इस घटनाचक्र से बुढ़उ हड़बड़ाये और बोले – क्या हुआ बेटी? बैठो , मैं इसे बुझा दे रहा हूँ। लेकिन कन्या ने एक न सुनी, शायद उसे अपनों के द्वारा दी गयी सीख पर भरोसा ही न रह गया हो। बुढ़उ दादा वही छटपटाने लगे, कभी इधर देखते कभी उधर, मानो कोई लाटरी छिन गयी हो।

              कन्या ने बस का मुआयना किया कि शायद कहीं और खाली सीट दिख जाय। जब वह सीट की तलाश में इधर उधर देख रही थी तो ऐसो ने उसे सीट दिलाने का ऐलान किया जो यात्रा मे किसी असहाय के लिए कभी अपनी सीट नही छोड़ते। कई लोगों ने अपने बगल वालों को ऐसे देखा मानो गाली दे रहे हैं कि ससुरा कहाँ से आकर बैठ गया। कन्या ने समय की नाजुकता को समझा और खुद के द्वारा नकारी गयी सीट ग्रहण करने का फैसला किया। उसकी पतली आवाज मेरे कानों में पड़ी – क्या आप अपना बैग हटायेंगे ?

              मैं अक्सर अकेला रहना ही पसंद करता हूँ और दो की सीट पर अकेले ही पसरा था, बगल में मेरा मिनी संगणक यंत्र आराम फरमा रहा था कि उसकी ये आवाज़ आई। मैंने अपना टिम टाम उठाया और खिड़की की तरफ खिसक लिया। बस में मौजूद सभी आँखें एक ही तरफ केंद्रित थीं। एकाध तो देखते देखते नीद में झूमने लगे थे।

               बाहर हो रही हल्की बारिश कुछ तेज हो गयी और मैं अपनी कल्पनाओं को सँजोए प्रकृति के इस मनोरम दृश्य को अपने ढंग से देखने लगा। बाहर गिर रही बूँदों के तिरछेपन को देख कर गणित के कुछ सवाल याद आ गये और उन्हीं के सहारे हवाओं की गति की गणना करने लगा। बाहर चल रही हवाओं से बारिश में भीगे हुए पेड़ मस्ती में झूम रहे थे और खेतों में चर रहे कुछ मवेशी मजे से भीगे ब्रेकफास्ट का आनंद ले रहे थे। बादलों ने अपनी हरकत को तेज़ कर दिया और सारे मनोरम दृश्य बूदों से बने कुहासे में विलीन हो गये।

              मैनें अपनी दायी भुजा मे कुछ गीलापन महसूस किया। मुआयना करने पर पता चला कि कन्या कुछ ज्यादा ही भीगी है। जिसे देख मुझे अफसोस हुआ और इस अफसोस को मेरी आँखें और भौंहें दोनों ने मिलकर प्रकट किया। जवाब में उसने भी इसी मूक भाषा में उत्तर दिया – कोई बात नही। मैनें उसे खिड़की के पास बैठने का आमंत्रण दिया जिससे उसके कपड़े कुछ सूख जाये जिसे उसने सहर्ष स्वीकार कर लिया मानो काफी देर से उस ओर बैठने की प्रतिक्षा कर रही हो। उसे लगा कि अब ये भी शुरू हो जायेगा और पूछताछ शुरू कर देगा लेकिन उसे क्या मालूम था कि भगवान ने स्पेशल ताला मेरी जबान पर जड़ रखा है जिसे मैं सबके सामने नही खोल सकता। मैं कुछ देर बस मे देखा ससुरे सब के सब भिखारियों की भाँति नजरे गड़ाये इसी तरफ देख रहे थे मानो अभी कुछ मिलेगा। मैं फिर बस के बाहर उन दृश्यों की तरफ लौट पड़ा जो बदल रहे थे शायद कोई बाज़ार आने वाली थी। कन्या गुमसुम सी होकर खिड़की से बाहर देख रही थी कि बाज़ार में खड़े एक मसखरेबाज़ ने कन्या को देख अपनी एक आँख दबा दी। कन्या अपने साथ हो रहे अजीब व्यवहार से परेशान होकर मेरी तरफ देखा। मैं अपने चिर-परिचित अंदाज़ में मुस्कुरा पड़ा और बाहर की तरफ इशारा किया। एक और बुजुर्ग बस की तरफ मुँह उठा कर उसे देख रहे थे। उन्हें देख पहले अभिनेत्रियों की भाँति आश्चर्य व्यक्त किया फ़िर हँस पड़ी। मैं बस मुस्कुराता रहा लेकिन अन्दर ही अन्दर अपने इस दोगले समाज को कोस रहा था। अब इस समय समाज के किस पहलू की बात रखूँ। क्या समाज की परिभाषा देनी होगी? शायद समाज हर मोढ़ पर बदल जाता है। दार्शनिक ओशो की कुछ पंक्तियाँ दिमाग मे आ गयी कि समाज बीमार है कुंठित है, इलाज की जरूरत है।

           अभी मै उन पंक्तियों से उलझा था कि कन्या की आँखो से आंसू की कुछ बूंदे टपक पड़ी। मै हड़बड़ाया और सारी कहा। प्रत्युत्तर मे उसने कहा – वो बात नही है। मुँह से ‘फिर’ निकल जाना स्वभाविक था। मेरे इस ‘फिर’ के बाद वह अपने नारी स्वरूप में आ गयी और अपने साथ हो रहे हर घटना चक्र के बारे में विस्तार से सिसकते हुए बताना शुरू किया। शायद उसने मुझे इस लायक समझा। उसकी हर एक बात से समाज में छिपी एक से एक बुराई से अवगत हुआ और इस बात से भी कि लड़कियां क्या क्या सहन कर लेती हैं।

              दरअसल वह अपने मौसा जी की हरकतों से रुष्ट होकर अकेले 180 किमी की यात्रा पर निकली थी। वह वापस अपने घर लौट रही थी। उसने अपनी मौसी से शिकायत की तो उन्होनें विरोध न करके बात छुपाने का मशवरा दे दिया था। अपने दुख दर्द को एक अनजान व्यक्ति से बाँट रही थी बिना कुछ जाने समझे। शायद व्यक्ति समझने की परख परिस्थितियों ने उसे सिखा दिया था। मैं भी चुपचाप उसकी बातें सुनता रहा। कभी सुना था कि दर्द बाटने से कम होता है आज सामने देख रहा था धीरे धीरे उसके चेहरे से तनाव दूर हो रहा था और शायद अब वह पहले से कहीं अधिक सुन्दर हो गयी थी। मेरे लिए सुन्दरता की माप के मापदंड अलग हैं।

             दीदी ने सिखाया था कि सुन्दर कौन और असुन्दर कौन। कुछ पल रो लेने से जब उसका मन हल्का हो गया तो वह भी अपने मन के अन्धेरों से बाहर निकली और खिड़की के बाहर उन नजारों को देखना शुरु किया जो कुछ देर पहले मेरी नज़रो से होकर उतरे थे। बारिश अभी भी हो रही थी और बस चारो तरफ फैले खेतों के बीच से गुजर रही थी। शायद कन्या मेरे प्रति कुछ ज्यादा ही सहज हो गयी थी तभी तो उसने बच्चों की भाँति एक प्रश्न किया – वो लोग बारिश मे भीग क्यों रहे हैं? मैं उस ओर देखा जिस तरफ उसने इशारा किया था और देखते ही हँसी आ गयी। मैनें कहा – वो लोग धान की रोपाई कर रहे हैं, आप अगर करीब से जाकर देखेंगी तो शायद आपको कुछ गीत सुनने को मिल जाय जो इस अवसर पर गाए जाते हैं।

- अच्छा !!!

- हाँ

- कभी गांव नही रही तो पता नही था। (हँसते हुए)

- कोई बात नही,

- आप गाँव से हैं

- हाँ

- लेकिन लगते तो नही। (मुस्कुराते हुए)

- दरअसल दिखता कुछ और है होता कुछ और है……

- आप आज़मगढ़ के ही हैं

- हाँ

- इलाहाबाद पढ़ाई करते हैं

- हाँ

       मेरे 'बात घटाउ' उत्तरों से उब कर वह चुप हो गयी। मेरे ज्यादातर उत्तर छोटे ही थे और कोई होता तो काफी लम्बी बातचीत करता। क्या करें भगवान ने ताला जो जड़ रखा है।

         मैनें उस समय गौर किया कि वह बातों की शौकीन है, कई बातें इधर की, उधर की जो औरतों को ही शोभा देती है ऐसी बातें वह बोली जा रही थी। मैं मन ही मन हँसता।

      

            ऐसे ही उसकी बातें सुनते सु्नते इलाहाबाद करीब आ गया। इलाहाबाद करीब आते ही उसकी बातें धीरे धीरे कम होने लगी और उसकी वही चुप्पी फ़िर हावी होने लगी। शायद उसे यह आभास होने लगा था कि यह सफ़र बस खत्म हो जायेगा फिर वह अकेली हो जायेगी और समाज की दूषित आँखें उसे फिर घूरेंगी।

   शायद वह अकेला नहीं होना चाहती थी तभी तो उसने पूछा था –

- आप इलाहाबाद से पहले उतर जायेंगे।

- हाँ , चुंगी के पास …

- ओके (धीरे से) … आपके साथ इलाहाबाद तक आना याद रहेगा।

- मुझे भी (मुस्कुराते हुए मैने कहा)

- आप धार्मिक लगते है।

- हाँ सही मायनो में… (और हँस पड़ा) क्यों?

- (हँसते हुए) मुझे लगा।

- आप भी है। (मैने कहा)

- मुझे नही लगता (उसने आश्चर्य से कहा)

- लगने लगेगा।

इतने मे मेरे सफर का पड़ाव आ गया और

मैने कहा – चलता हूँ।

वो बोली – आशा है आप फिर मिलेंगे।

- हाँ शायद ! … लेकिन आगे के सफर में कुछ अच्छे इन्सान ज़रूर मिल जायेंगे आपको। ज़िन्दगी छोटी है बड़ी मत कीजियेगा। (और मुस्कुरा पड़ा)

- जी याद रहेगा (स्वर रूआंसा था लेकिन बनावटी हँसी हँस रही थी)

- ओके बाय

- बाय

            बस रूकते ही मैं नीचे उतर गया। सड़क पर खड़े कुछ लोग उसी अन्दाज में उसे देख रहे थे और वह डरी हुई नज़रों से मुझे अलविदा कह रही थी। बस चल पड़ी और मैं भी रिक्शे पर सवार होकर अल्लापुर की तरफ रवाना हो गया।

      रास्ते भर सोचता रहा इस समाज और उस मासूम के बारे में…

        

           यादें धुँधली न हो जाएँ इसलिए उन यादों को शब्दों में कैद करना उचित समझा लेकिन कुछ चीजे छूट गयी। शायद कैद करना मुझे नही आता।

                                                                              -- मनीष

Sunday 3 August 2008

जूनियर बनाम सीनियर

 

         कल एक जंग हुई थी, लड़ाई तो नही कह सकते लेकिन जंग तो थी ही। सुबह से ही इस जंग की तैयारी हो रही थी, आखिरकार इस दिन के लिये पूरे एक वर्ष का लम्बा इन्तजार हमारे मित्रों ने किया था। दूसरे पीरियड के तुरंत बाद ही एक मित्र ने अपने उज्ज्वल भविष्य के लिये, अपने जन्मदिन के सुअवसर पर कुछ खिलाया और ढेर सारा कोल्ड ड्रिंक पिलाया।

           अभी पात्र में भरा द्रव समाप्त भी नही हुआ कि नगाड़े बज उठे, शंख की ध्वनियाँ चारों दिशाओं में गूँज उठी। एक ही स्वर चारों तरफ सुनाई दे रहा था, “चलो इन्ट्रो लेना है”। दरअसल यही जंग का एलान था। हमारे सेनापति ने विपक्ष के सैनिकों को बन्दी बना लिया था, बस अपनी सुरक्षा के लिए अपने कुछ सैनिकों को तलाश रहे थे। एकाएक उन्होनें मुझपर खोजपूर्ण दृष्टि डाली और तैश मे आकर बोले – क्या जी चलोगे कि नही? मैं जरा सा सहम गया और चुपचाप अपने सेनापति के साथ हो लिया।

           कुछ ही देर बाद मेरे सामने रणक्षेत्र था। जिसमे बन्दी बनाये गये सारे जूनियर डरे सहमे एक कतार में खड़े थे और हमारे मित्रगण मतलब सीनियर लोग विजय मुद्रा में बैठे कुर्सियां तोड़ रहे थे। कुछ ने अपनी क्रूर निगाहें अपने जूनियर्स पर गड़ाये थे मानो वह कोई पुराना दुश्मन हो। एकाएक मेरी निगाह एक तरफ खड़ी कुछ लड़कियों पर गयी जो कुछ ज्यादा सहमी दिख रही थी जिन्हें देख कर मुझे अपनी छोटी बहन याद आ गयी और उसका वह सहमा सा चेहरा, जब पिता जी ने उसे डांटा था। तब उसकी आँखें केवल मम्मी या दीदी को ही ढूँढ रही होती जहाँ वह अपने आप को छिपा सकती थी।

 

                 यहां भी लगभग वही महौल था, हमारे मित्र सारी सीमाएं तोड़कर सबको डांट लगा रहे थे। कि ऐसा क्यों है वैसा क्यों है? शर्ट खुली क्यों है, बटन बन्द करो, हाथ सही करो आदि आदि। इस बात से बेखबर की उनके इस व्यवहार से कुछ बच्चों की हृदय गति काफी बढ़ गयी है और वे काफी डरे हुए हैं। मैने हालात को समझा और रणक्षेत्र से बाहर निकल गया।

                मैं बाहर आकर सोचने लगा कि अपने मित्रों का विरोध तो नही कर सकता कि ऐसा मत करो तो क्या किया जाय। अचानक मेरी निगाह कक्षा में बैठी अपनी महिला सहपाठियों की तरफ गया वे अभी कोल्ड ड्रिंक की चुस्कियां लेने में व्यस्त थीं। मैनें सोचा कि काश यही लोग रणक्षेत्र में जाकर बैठ जाय तो शायद बच्चों के साथ अभद्रता न हो। क्योंकि हमारे सैनिक ये कतई नहीं चाहेंगे कि उनकी इमेज इन सुन्दरियों के सामने खराब हो। साथ ही साथ उन लड़कियों को भी कोई अपना मिल जायेगा जिसके समक्ष वे अपनी बात आसानी के साथ रख सके। शायद किसी न किसी महिला सहपाठी में बड़ी दीदी जैसा गुण तो होगा ही।

 

                 शायद सबमें ऐसे गुण मौजूद थे तभी तो वे औरतों की तरह झुंड बना कर बतियाने में लगी थी। जब मैनें देखा कि कुछ ज्यादा समय लग जायेगा तो मजबूरन आवाज लगानी पड़ी कि – चलिए ! आप लोग भी चलिए। इतना सुनकर उस स्थान पर सीट छोड़ने की हलचल हुई और मेरे मन की हलचल समाप्त हुई।

              मैं वापस रणक्षेत्र में लौट आया और एक कुर्सी पर बैठ गया। अभी कुछ ही देर हुई कि महिला फौज भी आ गयी, आते ही सबसे पहले मुझे कुर्सी से टरकाया। मैं चुपचाप कुर्सी छोड़कर कहीं और ठौर तलाशने लगा।

               हाँ तो बन्दियों के साथ पूरे जोर शोर के साथ पूछताछ चल रही थी कि किस देश से आये हैं और नाम पता क्या क्या है। हमारे सेनापति महोदय इस पूछताछ का जिम्मा उठाये थे और उनके लेखाधिकारी हर एक कैदी का विवरण अपनी पुस्तिका में अंकित कर रहे थे। वैसे सेनापति महोदय हमारी कक्षा के सी आर (क्लास रिप्रजेन्टेटिव) थे जिन्हें हम प्यार से सियार बुलाते थे। हमारा प्यार उनके प्रति इतना गहरा हो गया था कि वे वास्तव मे अपने को भूल कर खुद को सियार समझ बैठे और सियारों की भांति हुँआसने लगे थे। जैसा कि सर्वविदित है कि सियार के हुँआसने से उनकी श्रेणी के सारे जानवर आवाजें निकालने लगते हैं, जैसे कुत्ते, पिल्ले और दूसरे सियार। बस रणक्षेत्र की हालत वही हो गयी थी आगे आगे ये बोलते पीछे – पीछे इनके सहयोगी जो पिछले वर्ष अपने साथ हुए इसी तरह के कांड से जरा सा खिसक गये थे वे अपना इलाज बखूबी कर रहे थे। शायद वे यह परखना चाहते थे कि देखें मुझमे केवल डरने वाला गुण है कि डराने वाला भी गुण मौजूद है। इसी जद्दोजहद में कुछ गलतियाँ भी हो जा रही थी। जैसे एक मित्र ने बन्दियों से कहा कि “किसी को हिन्दी समझने में परेशानी है” उनके ये शब्द हिन्दी में थे बस जोरदार ठहाका लग गया।

                 हँसी के इस महौल को हमारे परमवीर सेनापति पचा नहीं सके और एक जोरदार आवाज के साथ चिल्लाये – बड़ी हँसी आ रही है तुम लोगों को (आँखें तरेरते हुए)……… महौल शान्त हो गया। शायद कोई भी बंदी ऐसे नही डांटा गया होगा, आजकल के माँ बाप तो चूँ भी नही करते डांटना तो दूर की बात है। बाकी कुछ तगड़े गबरू जवान भी थे जो मल्लयुद्ध मे कुशल थे लेकिन सब चुप थे और कथित इंट्रो की शुरुआत हुई।

                 सर्वप्रथम बन्दियों के परिधानों पर हमला हुआ। जिनके शर्ट बाहर खुली हवा में साँस ले रहे थे उनकी हवा पानी बंद कर दी गयी और तो और सबकी गर्दन को सील कर दिया गया।

                 महौल में आये इस परिवर्तन से दोनों तरफ खड़ी सेना में भी कुछ परिवर्तन आये। सामने खड़े बेचारे जूनियर्स अपने आपको जब्त किये चुपचाप खड़े थे, कुछ की साँस फूल रही थी, और कुछ बेहयाई से टुकुर टुकुर यहां वहां देख रहे थे और कुछ अपने हाथ की उँगलियों को रगड़ रहे थे वह भी उसी हाथ की उँगली से। सब की खोपड़ी मे एक ही प्रश्न घूम रहा था कि वे अपना परिचय किस प्रकार देंगे और सीनियर्स का मुकाबला कैसे करेंगे। समाचार चैनलों की भाषा में कहे तो माहौल तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण मे था। नियंत्रण केवल जूनियर्स पर था बाकी सब शेर बन बैठे थे। शेर तो एक ही घोषित था केवल हमारा सेनापति। लेकिन उसे छकाते हुए कुछ सैनिको ने विद्रोह कर दिया और खुद को योद्धा समझने लगे। हमारा सेनापति इस परिस्थिति को देख अपनी कमान नारी जैसे मुखड़े और स्वभाव वाले एक वीर(उपसेनापति) को सौप दिया और खुद उन योद्धाओं से भिड़ने लगा जो अपनी ही सेना में थे। उसके कुछ हितैषी उसे अपनी अपनी राय दे रहे थे जो मिलता सेनापति को एक राय सौप देता इस विद्रोह को रोकने के लिये। लेकिन राय व्यर्थ जा रही थी और सेनापति भिड़ गये। नतीजन एक खास योद्धा जो कुछ ज्यादा ही वीर बन रहा था, वाकआउट कर गया।

                कुछ देर तक चली गहमागहमी के बाद सेनापति ने अपना पदभार सँभाला और कैदियों को शिष्टाचार सिखाने लगा कि आप सभी जिसको देखे सबको विश करें चाहे वह हमारे कालेज का चपरासी ही क्यों न हो।

               सेनापति महोदय उर्फ़ सियार ने अपने शब्द को आगे बढ़ाते हुए कहा कि हमारी सेना को आप सब खास सम्मान दें 90 डिग्री झुककर। जब वह इस खास प्रकार के सम्मान को कैसे दिया जाय यह समझा रहा था तब मुझे योग गुरू बाबा रामदेव याद आ गये और उनके सारे योगासन की मुद्रायें भी। एक कैदी को आगे बुला कर यह सम्मान वाला आसन विधिवत कराया गया और कुछ गलती होने पर हमारे उपसेनापति अपनी जानी पहचानी आवाज में समझाते कि दाएँ हाथ को उठाकर अपनी नाभि पर लगाओ और उसी के सहारे 90 अंश झुक जाओ।

              अभी यह सिलसिला चल ही रहा था कि अपने खेमे का एक और फौजी अन्दर दाखिल हुआ, कैदियों की तरफ से कोई रिस्पांस न देखकर सियार चिल्लाये – आप लोग मैनर इतनी जल्दी भूल गये!! ये आपके सर हैं। विश कीजिए !!! इतना सुनते ही कई सिर एक साथ नीचे झुक गये और वह फौजी अपने आप को सम्मानित महसूस करता हुआ गर्व से आगे बढ़ चला। उसे देखकर दूसरे फौजियों को ग्लानि हुई और वे अन्दर बाहर करना शुरू कर दिये और कुछ सम्मान पाने लगे,कुछ मुँह लटकाये आकर बैठ जाते। इस सम्मान के चक्कर में दरवाजा कई बार चिल्लाया होगा कि अबे धीरे से बन्द करो दर्द हो रहा है।

            सम्मान शब्द भी अपने आपको कोसता होगा कि काहे मुझे ऐसी जगह घसीट लाते है जहां मै नही आना चाहता। जबरदस्ती सम्मान करना भला किसे सुहाता है, बचपन में जब हमारे बाप जी आँखें दिखाते हुए किसी मेहमान के पैर छूने को कहते तो कितना बुरा लगता, वही दूसरे भी मेहमान भी थे जो वास्तव में सम्मान के हकदार थे जिनके लिये हमारे हाथ अपने आप उनके चरणों की तरफ खिंचे चले जाते। सम्मान दिखावे की चीज थोड़े ही है, हाँ चापलूसों के लिए यह बड़ी काम की चीज है। खैर चाहे जो भी हो कालेज के कमरे की दीवारें सम्मान के इसी रूप को देखती चली आ रही है। सालों से चल रहे इस प्रकरण को चुपचाप सहती रही हैं।

              इतने में गिनती गिनने की आवाजें आने लगी, वन टू थ्री… मैने देखा कि उपसेनापति महोदय ने गिनती गिनने का आदेश दे रखा है और कैदी गिन रहे हैं। अब इस उम्र मे कोई पहाड़ा पढ़ने को कह दे तो ठीक लेकिन गिनती गिनने से तो छोटे बच्चे भी कतराते हैं। इसी बात पर एक कैदी हँस पड़ा। यह देख नारीमुखी उपसेनापति ने औरतों वाले लहजे मे डांटा – क्या जी!!! तुम लोगो को समझ में नही आ रहा है कि हम क्या कह रहे हैं। हँस क्यों रहे हो। जब ये डांट रहे थे तो इनकी हरकतों को देखकर अपनी पड़ोस वाली आंटी याद आ गयीं वह भी कुछ ऐसे ही डांटती थीं – क्या जी !! क्या कर रहे हो?

              गिनती का सिलसिला कई बार चला लड़के गिनती गड़बड़ा देते बड़ी मुश्किल से गिनती अन्त तक पहुँची। मुझे डर था कि कहीं वर्णमाला के अक्षर गिनवाना न शुरु कर दे नहीं तो सुबह हो जायेगी। लड़कों के बीच में एक बड़ा ही हँसमुख बन्दा मौजूद था जो बिल्कुल मेरी तरह हरकतें कर रहा था उसकी लंबी मुस्कुराहट देख सियार साहब के पसीने छूट रहे थे, कुछ और वीर उसे धमका भी रहे थे लेकिन चलती हवाएँ कब रूकी है उसकी मुस्कुराहट और लंबी होती चली गयी आखिर पहली बार ऐसे सीनियरों से पाला पड़ा था। बगल में खड़ा एक कैदी अपने मित्र की इस हरकत देख कर मुस्कुरा पड़ा। बस हमारे कुछ फौजी उसे बलिवेदी पर पकड़ लाये और बोले हँसों, वह चुप था कि अचानक स्त्रीमुखी उपसेनापति ने कहा ठीक है रोओ। एक को हँसने के लिए प्रेरित किया जा रहा था तो दूसरे को रोने के लिए। अजीब उठापटक हो रही थी। इतने में सेनापति को समाचार मिला कि अपने खेमे के ही कुछ सैनिक कुछ बन्दियों को अलग ले जा कर प्रताड़ना दे रहे हैं आनन फानन में सियार साहब वहां पहुँचकर मुआयना किये तो पता चला कि वे सैनिक कैदियों को होमवर्क दे रहे हैं कि अगली बार क्या क्या करना है और कैसे करना है। सेनापति को ये बात नागवार लगी और बोले – तुम लोगों को जो करना है समाने आकर करो। तो उस सैनिक गुट के प्रमुख बलिवेदी के निकट आकर बोले – मैने इनको होमवर्क दे दिया है आप लोग भी कर के आइयेगा और घर जाकर नेट पर इस संस्थान का इतिहास देखियेगा अगली क्लास में पूछा जायेगा। मैं नेट श्ब्द सुनकर जरा सा मुस्कुराया। पीछे से कुछ सैनिकों ने हल्ला मचाया सेनापति फिर पगलाये पहुँचे, बोले क्या बात है यार क्यों शोर मचा रहे हो। वे सैनिक कुछ नही बोले क्योंकि उन्हें अपार खुशी हो रही थी इस महौल में कि खुशी बर्दाश्त नही हो रही थी सो पगला रहे थे और सियार साहब को भी पगलवा रहे थे।

 

            संकट की इस घड़ी में आगे बैठी वीरांगनाओं ने अपने हुनर का जादू फैलाया और कुछ देर तक कैदियों को वे ही संभालती रही। कुछ कोमल हृदय वाली वीरांगनायें देर से खड़ी लड़कियों के दर्द को समझा और उन्हें बैठने को कहा। यह देख मुझे खुशी हुई और अफसोस हुआ कि काश ये वीरांगनायें न लाई गयी होती तो ये मुए सैनिक और सेनापति आपस की लड़ाई के चक्कर में एकाध को बेहोश कर ही दिये होते। पिछली बार तो नरमी नही हुई थी।

               कुछ अँगरेज़ी विद्या के जानकार चुप्पी साधे बैठे थे कि जब तक सियार महोदय खुद आकर पैरों पर नाक न रगड़े तब तक वे सभा को सम्बोधित नहीं करेंगे। किसी तरह कुछ विद्याधर को मनाया गया तो उनका प्रवचन हुआ। प्रवचन के बाद सेनापति महोदय ने एलान किया कि आज कैदियों के साथ ज्यादा कुछ नही किया जायेगा केवल नाम, रैंक और पसंद पूछ कर छोड़ दिया जायेगा। दरअसल सियार साहब ऐसा नही चहते थे लेकिन वहां की स्थिति बेकाबू हो चली थी सो मजबूरन उन्हें ये कदम उठाना पड़ा। वे अपने इस फैसले की आम सहमति के लिए बार बार वीरांगनाओं से विचार विमर्श कर रहे थे कि कुछ और सैनिको की शिकायत मिल गयी। सियार साहब उधर दौड़ पड़े और इधर उपसेनापति कमान सँभाल लिये। बोले – नाच गाना पसंद में होना ज़रूरी है(क्योंकि नाचने गाने के ये शौकीन थे,बहुत लोगों ने इन्हे नचाया और गवाया था) कुछ ने बात को समझा नही कि आखिर ये क्या बक रहा है, पसंद मे भी घुसपैठ लगा दी कम्बख्तों ने !

 

              जल्दी जल्दी कैदी आते गये, और लेखाधिकारी ने सबके नाम दर्ज कर लिये। मौका-ए-वारदात से सेनापति नदारत थे पता चला कुछ खाने पीने का समान मगवाने गये हैं। तभी पूरे आत्मविश्वास के साथ विश्वास साहब दो शीतल पेय की बोतले टांगे कमरे मे दाखिल हुए, अचानक मेरे मुँह से निकल पड़ा – भाई दूध ले आये होते मुझे तो दूध पीना है आगे पीछे बैठे मित्रगण भड़क गये। मैने उन्हें समझाया कि भाई दरअसल जूनियर्स के माता-पिता हास्टल में दूध की व्यवस्था की मांग कर रहे थे शायद कुछ बच्चे अभी भी दूध पीते होंगे। इसी पर मैने एक टिप्पणी कर दी तो क्या हुआ? मित्रगण बोले – कुछ नही बस मतलब कुछ और निकल गया था।

               कैदी बाकायदा समोसे काटने लगे और सूख चुके गले को शीतल पेय के जरिये तर करने लगे। इतने में अचानक प्रकट हुए सियार साहब चिल्लाये – कौन अपने पापा से फोन पर कहा है कि यहां रैगिंग हो रही है!?

                  कोई जवाब नही मिला क्योंकि सब काटने में व्यस्त थे। कुछ देर और माथापच्ची करने के बाद कैदियों को कुछ शर्तो के साथ छोड़ दिया गया। कैदी खुशी खुशी निकल लिये लेकिन इधर सियार साहब लाल पीले हो रहे थे। अपने कुछ शेष बचे सैनिकों( बाकी सम्मान पाने के चक्कर में कैदियों के साथ निकल गये थे) से थोड़ी देर पहले हुई दुर्व्यवस्था की रिपोर्ट मांग रहे थे। रिपोर्ट के बदले उन्हें वही ज़वाब मिल रहे थे जो पहले मिले थे। सियार साहब ने देखा कि अब दाल नही गलेगी तो उन्होने गुस्सा थूक दिया। कुछ देर बाद बोले कैदियों का ड्रेस कोड क्या होगा। इस प्रश्न पर कुछ सैनिक अपनी शर्ट दिखाने लगे बोले ये अच्छी रहेगी।

 

                    तकरीबन आधे घंटे लम्बी बहस के बाद कुछ फैसला हुआ जिसे कुछ वीरांगनायें समझी और कुछ सैनिक बाकी बस मुँह देखते रह गये। इतने में सभा समाप्ति की घोषणा हुई। ज्यादातर लोग बाहर चले गये, रह गये कुछ गिने चुने मर्द लोग, केवल अपनी जाति देखकर सेनापति साहब अपने अन्दर दबी गालियों की लम्बी श्रृंखला बाहर निकालने लगे। काफी देर तक गालियों की बौछार करने के बाद वे कुछ हल्के हुए फिर बोले चलो अब चलते हैं।(दी जा रही गालियां उनको समर्पित थी जो वहां मौजूद नही थे) और हम चल पड़े अपने अपने आशियानों की तरफ।

 

               जब कालेज से बाहर हम आ रहे थे तो देखा कि कुछ कैदी दिये गये होमवर्क की फोटो कापी आपस में बाँट रहे हैं,…………… और सूर्यग्रहण लगने वाला है साथ चल रहे कुल्लू भाई ने याद दिलाया बोले नहा धो कर कुछ खाना।

 

              कुछ देर बाद मै अपने रूम पर पहुँच गया और शाही स्नान किया, तब तक शाही चाय की प्याली तैयार थी। चुस्कियां लेते समय सफेद संगमरमर पर चल रही चींटियों की एक कतार दिख गयी। उनकी कतार में मुझे वही जूनियर्स दिखने लगे, डरे से सहमे से। क्या उनका स्वाभिमान नही होगा? मैं सोचने लगा कि आखिर इस प्रथा को किसने शुरू किया होगा और क्यों? जवाब में एक सीनियर के शब्द तैर गये – “मैं तुम लोगों को मैनर सिखा रहा हूँ जब किसी कम्पनी के इंटरव्यू में बैठोगे तब पता चलेगा इंट्रो का महत्व………तुम्हारी झिझक मिटा रहे हैं हम”

 

                 प्रतिउत्तर मे मेरे अन्दर से आवाज आई कि डांट – डपट से कुछ सीखा जा सकता है क्या भला। इससे तो इन्सान को केवल कुंठित बनाया जा सकता है। वही कुंठा जो वर्षों से सीनियर से जूनियर मे जा रही है। सिखाने के कुछ नियम होने चाहिये और खास रूप से सीखने के लिए भयमुक्त होना बेहद ज़रूरी है। लेकिन क्या हम ये कर पा रहे हैं। गिनती गिनाने, हाथ उपर नीचे करवाने से क्या लाभ?

                 लेकिन तर्कों का कोई ओर छोर नही होता। बगल से आवाज आ जायेगी कि यार बस जान पहचान करवाने के लिए ऐसा है बस!! और ना जाने क्या क्या शहद में लिपटी बातें उछाली जायेंगी। समाज में कई तरह के प्राणी रहते हैं कुछ खास किस्म के प्राणी जिन्हें दूसरों को लाचार देखना बेहद पसंद है। ऐसो का क्या किया जाय!!???

 

                बातें करने वाले बातें सतयुग की करेंगे और काम कलयुग वाला। बातें केवल छलावा मात्र रह गयी हैं।

                  असल में देखा जाय तो समाज नष्ट हो रहा है, लोग नष्ट हो रहे हैं। चारों तरफ केवल विनाश ही हो रहा है, निर्माण नहीं। अगर हम ज़रा ध्यान से देखें और चीजों का गहराई से विश्लेषण करें तब पता चलेगा कि इस विनाश लीला मे क्या खोया है हमने! हमने अपने जीवन के मूल्य खो दिये हैं अपनी स्वाधीनता खो दी है। बस शेष रह गये हैं केवल खण्डहर जिन पर हम उछल कूद कर रहे हैं।

                ओह!! लगता है रात के दो बज गये तभी तो हमारे मूषक महाराज खिड़की पर पधारे हैं, शीशे के उस पार से अन्दर ताक झांक कर रहे हैं दरअसल ये महाशय अपनी प्रिय मूष्टिका का इन्तजार कर रहे हैं जो इस समय बगल के भण्डार गृह मे आराम फरामा रही है। कभी कभी महारानी मूष्टिका चली आती हैं खिड़की पर, लेकिन मूषक महाराज हर रोज चले आते हैं। इनके इस प्रेम मिलन को ध्यान में रखते हुए मुझे अपना लेखन कार्य स्थगित करना पड़ रहा है।

            लेकिन अपने जूनियरों (दूसरो को भी जो इस दौर से जूझ रहे हैं) को कुछ टिप्स देकर ही विश्राम करूँगा।

1) जब कोई सीनियर डांट रहा हो तो उससे नजरे मिलाते हुए उसकी बात को गौर से सुनें अगर तनिक भी डर लग रहा हो तो उसे मन में गालियां (जितनी आती हो) देना शुरू कर दें, कान्फिडेंस बढ़ेगा। :) :) :)

2) अगर कोई गाने को कहे और आप गाने के शौकीन न हो या न आता हो तो जितनी कर्कश आवाज आप निकाल पाएं उसी आवाज में एक गीत को अपनी गले से लगायें। :) :)

3) नाचने को कह दिया जाय तो तुरन्त आँखें मूद कर ओशो वाली स्टाइल मे नाचना शुरू कर दे।

4) कोई कविता सुनाने कहने को कहा जाए तो अत्यधिक कठिन शब्द का इस्तेमाल कीजिए।

5) याद रखें आपको डरना नही है यह सब नाटक मात्र मनोरंजन के लिए है (शायद) :(

6) किसी चीज को ना मत कहिए बातें बढ़ सकती हैं

7) खाने पीने में कोई संकोच नही करिए, जहाँ सीनियरों को देखें पहुँच जाएं। वे खुद आपसे दूर रहने लगेंगे। :)

8) याद रखें कभी भी डर को अन्दर न रखें। हानिकारक हो सकता है। अगर लग रहा हो तो खुद को रिचार्ज कीजिए।

9) पढ़ाई पहले स्थान पर है बाकि सब गौण हैं। पढ़ाई छोड़ कर सीनियरों द्वारा दिये गये होमवर्क को न कीजिए। होमवर्क में कुछ भी हो सकता है जैसे एक दूसरे के नाम याद करना।

10) कुछ ही दिन में आप सब समझ जायेंगें। फिर आप शेर बन जायेंगे बाकी सब गीदड़:)

          थोड़ी देर पहले मूष्टिका रानी ने भी दस्तक दे दी है लगता है आज मूषक महाराज की तपस्या सफल होगी। :)

             आइये इनके सफल प्रेम के लिये प्रार्थना करें और उन जूनियर्स के लिये भी जिनके सपने में सीनियर उछलकूद कर रहे हैं।

विशेष  नोट - यह लेख केवल हास्य - विनोद के लिए है कृपया इसे अन्यथा न लें।

                                                                    - मनीष

                                                 http://www.manish2dream.blogspot.com/ 

E-mail - manish2god@gmail.com