कल एक जंग हुई थी, लड़ाई तो नही कह सकते लेकिन जंग तो थी ही। सुबह से ही इस जंग की तैयारी हो रही थी, आखिरकार इस दिन के लिये पूरे एक वर्ष का लम्बा इन्तजार हमारे मित्रों ने किया था। दूसरे पीरियड के तुरंत बाद ही एक मित्र ने अपने उज्ज्वल भविष्य के लिये, अपने जन्मदिन के सुअवसर पर कुछ खिलाया और ढेर सारा कोल्ड ड्रिंक पिलाया।
अभी पात्र में भरा द्रव समाप्त भी नही हुआ कि नगाड़े बज उठे, शंख की ध्वनियाँ चारों दिशाओं में गूँज उठी। एक ही स्वर चारों तरफ सुनाई दे रहा था, “चलो इन्ट्रो लेना है”। दरअसल यही जंग का एलान था। हमारे सेनापति ने विपक्ष के सैनिकों को बन्दी बना लिया था, बस अपनी सुरक्षा के लिए अपने कुछ सैनिकों को तलाश रहे थे। एकाएक उन्होनें मुझपर खोजपूर्ण दृष्टि डाली और तैश मे आकर बोले – क्या जी चलोगे कि नही? मैं जरा सा सहम गया और चुपचाप अपने सेनापति के साथ हो लिया।
कुछ ही देर बाद मेरे सामने रणक्षेत्र था। जिसमे बन्दी बनाये गये सारे जूनियर डरे सहमे एक कतार में खड़े थे और हमारे मित्रगण मतलब सीनियर लोग विजय मुद्रा में बैठे कुर्सियां तोड़ रहे थे। कुछ ने अपनी क्रूर निगाहें अपने जूनियर्स पर गड़ाये थे मानो वह कोई पुराना दुश्मन हो। एकाएक मेरी निगाह एक तरफ खड़ी कुछ लड़कियों पर गयी जो कुछ ज्यादा सहमी दिख रही थी जिन्हें देख कर मुझे अपनी छोटी बहन याद आ गयी और उसका वह सहमा सा चेहरा, जब पिता जी ने उसे डांटा था। तब उसकी आँखें केवल मम्मी या दीदी को ही ढूँढ रही होती जहाँ वह अपने आप को छिपा सकती थी।
यहां भी लगभग वही महौल था, हमारे मित्र सारी सीमाएं तोड़कर सबको डांट लगा रहे थे। कि ऐसा क्यों है वैसा क्यों है? शर्ट खुली क्यों है, बटन बन्द करो, हाथ सही करो आदि आदि। इस बात से बेखबर की उनके इस व्यवहार से कुछ बच्चों की हृदय गति काफी बढ़ गयी है और वे काफी डरे हुए हैं। मैने हालात को समझा और रणक्षेत्र से बाहर निकल गया।
मैं बाहर आकर सोचने लगा कि अपने मित्रों का विरोध तो नही कर सकता कि ऐसा मत करो तो क्या किया जाय। अचानक मेरी निगाह कक्षा में बैठी अपनी महिला सहपाठियों की तरफ गया वे अभी कोल्ड ड्रिंक की चुस्कियां लेने में व्यस्त थीं। मैनें सोचा कि काश यही लोग रणक्षेत्र में जाकर बैठ जाय तो शायद बच्चों के साथ अभद्रता न हो। क्योंकि हमारे सैनिक ये कतई नहीं चाहेंगे कि उनकी इमेज इन सुन्दरियों के सामने खराब हो। साथ ही साथ उन लड़कियों को भी कोई अपना मिल जायेगा जिसके समक्ष वे अपनी बात आसानी के साथ रख सके। शायद किसी न किसी महिला सहपाठी में बड़ी दीदी जैसा गुण तो होगा ही।
शायद सबमें ऐसे गुण मौजूद थे तभी तो वे औरतों की तरह झुंड बना कर बतियाने में लगी थी। जब मैनें देखा कि कुछ ज्यादा समय लग जायेगा तो मजबूरन आवाज लगानी पड़ी कि – चलिए ! आप लोग भी चलिए। इतना सुनकर उस स्थान पर सीट छोड़ने की हलचल हुई और मेरे मन की हलचल समाप्त हुई।
मैं वापस रणक्षेत्र में लौट आया और एक कुर्सी पर बैठ गया। अभी कुछ ही देर हुई कि महिला फौज भी आ गयी, आते ही सबसे पहले मुझे कुर्सी से टरकाया। मैं चुपचाप कुर्सी छोड़कर कहीं और ठौर तलाशने लगा।
हाँ तो बन्दियों के साथ पूरे जोर शोर के साथ पूछताछ चल रही थी कि किस देश से आये हैं और नाम पता क्या क्या है। हमारे सेनापति महोदय इस पूछताछ का जिम्मा उठाये थे और उनके लेखाधिकारी हर एक कैदी का विवरण अपनी पुस्तिका में अंकित कर रहे थे। वैसे सेनापति महोदय हमारी कक्षा के सी आर (क्लास रिप्रजेन्टेटिव) थे जिन्हें हम प्यार से सियार बुलाते थे। हमारा प्यार उनके प्रति इतना गहरा हो गया था कि वे वास्तव मे अपने को भूल कर खुद को सियार समझ बैठे और सियारों की भांति हुँआसने लगे थे। जैसा कि सर्वविदित है कि सियार के हुँआसने से उनकी श्रेणी के सारे जानवर आवाजें निकालने लगते हैं, जैसे कुत्ते, पिल्ले और दूसरे सियार। बस रणक्षेत्र की हालत वही हो गयी थी आगे आगे ये बोलते पीछे – पीछे इनके सहयोगी जो पिछले वर्ष अपने साथ हुए इसी तरह के कांड से जरा सा खिसक गये थे वे अपना इलाज बखूबी कर रहे थे। शायद वे यह परखना चाहते थे कि देखें मुझमे केवल डरने वाला गुण है कि डराने वाला भी गुण मौजूद है। इसी जद्दोजहद में कुछ गलतियाँ भी हो जा रही थी। जैसे एक मित्र ने बन्दियों से कहा कि “किसी को हिन्दी समझने में परेशानी है” उनके ये शब्द हिन्दी में थे बस जोरदार ठहाका लग गया।
हँसी के इस महौल को हमारे परमवीर सेनापति पचा नहीं सके और एक जोरदार आवाज के साथ चिल्लाये – बड़ी हँसी आ रही है तुम लोगों को (आँखें तरेरते हुए)……… महौल शान्त हो गया। शायद कोई भी बंदी ऐसे नही डांटा गया होगा, आजकल के माँ बाप तो चूँ भी नही करते डांटना तो दूर की बात है। बाकी कुछ तगड़े गबरू जवान भी थे जो मल्लयुद्ध मे कुशल थे लेकिन सब चुप थे और कथित इंट्रो की शुरुआत हुई।
सर्वप्रथम बन्दियों के परिधानों पर हमला हुआ। जिनके शर्ट बाहर खुली हवा में साँस ले रहे थे उनकी हवा पानी बंद कर दी गयी और तो और सबकी गर्दन को सील कर दिया गया।
महौल में आये इस परिवर्तन से दोनों तरफ खड़ी सेना में भी कुछ परिवर्तन आये। सामने खड़े बेचारे जूनियर्स अपने आपको जब्त किये चुपचाप खड़े थे, कुछ की साँस फूल रही थी, और कुछ बेहयाई से टुकुर टुकुर यहां वहां देख रहे थे और कुछ अपने हाथ की उँगलियों को रगड़ रहे थे वह भी उसी हाथ की उँगली से। सब की खोपड़ी मे एक ही प्रश्न घूम रहा था कि वे अपना परिचय किस प्रकार देंगे और सीनियर्स का मुकाबला कैसे करेंगे। समाचार चैनलों की भाषा में कहे तो माहौल तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण मे था। नियंत्रण केवल जूनियर्स पर था बाकी सब शेर बन बैठे थे। शेर तो एक ही घोषित था केवल हमारा सेनापति। लेकिन उसे छकाते हुए कुछ सैनिको ने विद्रोह कर दिया और खुद को योद्धा समझने लगे। हमारा सेनापति इस परिस्थिति को देख अपनी कमान नारी जैसे मुखड़े और स्वभाव वाले एक वीर(उपसेनापति) को सौप दिया और खुद उन योद्धाओं से भिड़ने लगा जो अपनी ही सेना में थे। उसके कुछ हितैषी उसे अपनी अपनी राय दे रहे थे जो मिलता सेनापति को एक राय सौप देता इस विद्रोह को रोकने के लिये। लेकिन राय व्यर्थ जा रही थी और सेनापति भिड़ गये। नतीजन एक खास योद्धा जो कुछ ज्यादा ही वीर बन रहा था, वाकआउट कर गया।
कुछ देर तक चली गहमागहमी के बाद सेनापति ने अपना पदभार सँभाला और कैदियों को शिष्टाचार सिखाने लगा कि आप सभी जिसको देखे सबको विश करें चाहे वह हमारे कालेज का चपरासी ही क्यों न हो।
सेनापति महोदय उर्फ़ सियार ने अपने शब्द को आगे बढ़ाते हुए कहा कि हमारी सेना को आप सब खास सम्मान दें 90 डिग्री झुककर। जब वह इस खास प्रकार के सम्मान को कैसे दिया जाय यह समझा रहा था तब मुझे योग गुरू बाबा रामदेव याद आ गये और उनके सारे योगासन की मुद्रायें भी। एक कैदी को आगे बुला कर यह सम्मान वाला आसन विधिवत कराया गया और कुछ गलती होने पर हमारे उपसेनापति अपनी जानी पहचानी आवाज में समझाते कि दाएँ हाथ को उठाकर अपनी नाभि पर लगाओ और उसी के सहारे 90 अंश झुक जाओ।
अभी यह सिलसिला चल ही रहा था कि अपने खेमे का एक और फौजी अन्दर दाखिल हुआ, कैदियों की तरफ से कोई रिस्पांस न देखकर सियार चिल्लाये – आप लोग मैनर इतनी जल्दी भूल गये!! ये आपके सर हैं। विश कीजिए !!! इतना सुनते ही कई सिर एक साथ नीचे झुक गये और वह फौजी अपने आप को सम्मानित महसूस करता हुआ गर्व से आगे बढ़ चला। उसे देखकर दूसरे फौजियों को ग्लानि हुई और वे अन्दर बाहर करना शुरू कर दिये और कुछ सम्मान पाने लगे,कुछ मुँह लटकाये आकर बैठ जाते। इस सम्मान के चक्कर में दरवाजा कई बार चिल्लाया होगा कि अबे धीरे से बन्द करो दर्द हो रहा है।
सम्मान शब्द भी अपने आपको कोसता होगा कि काहे मुझे ऐसी जगह घसीट लाते है जहां मै नही आना चाहता। जबरदस्ती सम्मान करना भला किसे सुहाता है, बचपन में जब हमारे बाप जी आँखें दिखाते हुए किसी मेहमान के पैर छूने को कहते तो कितना बुरा लगता, वही दूसरे भी मेहमान भी थे जो वास्तव में सम्मान के हकदार थे जिनके लिये हमारे हाथ अपने आप उनके चरणों की तरफ खिंचे चले जाते। सम्मान दिखावे की चीज थोड़े ही है, हाँ चापलूसों के लिए यह बड़ी काम की चीज है। खैर चाहे जो भी हो कालेज के कमरे की दीवारें सम्मान के इसी रूप को देखती चली आ रही है। सालों से चल रहे इस प्रकरण को चुपचाप सहती रही हैं।
इतने में गिनती गिनने की आवाजें आने लगी, वन टू थ्री… मैने देखा कि उपसेनापति महोदय ने गिनती गिनने का आदेश दे रखा है और कैदी गिन रहे हैं। अब इस उम्र मे कोई पहाड़ा पढ़ने को कह दे तो ठीक लेकिन गिनती गिनने से तो छोटे बच्चे भी कतराते हैं। इसी बात पर एक कैदी हँस पड़ा। यह देख नारीमुखी उपसेनापति ने औरतों वाले लहजे मे डांटा – क्या जी!!! तुम लोगो को समझ में नही आ रहा है कि हम क्या कह रहे हैं। हँस क्यों रहे हो। जब ये डांट रहे थे तो इनकी हरकतों को देखकर अपनी पड़ोस वाली आंटी याद आ गयीं वह भी कुछ ऐसे ही डांटती थीं – क्या जी !! क्या कर रहे हो?
गिनती का सिलसिला कई बार चला लड़के गिनती गड़बड़ा देते बड़ी मुश्किल से गिनती अन्त तक पहुँची। मुझे डर था कि कहीं वर्णमाला के अक्षर गिनवाना न शुरु कर दे नहीं तो सुबह हो जायेगी। लड़कों के बीच में एक बड़ा ही हँसमुख बन्दा मौजूद था जो बिल्कुल मेरी तरह हरकतें कर रहा था उसकी लंबी मुस्कुराहट देख सियार साहब के पसीने छूट रहे थे, कुछ और वीर उसे धमका भी रहे थे लेकिन चलती हवाएँ कब रूकी है उसकी मुस्कुराहट और लंबी होती चली गयी आखिर पहली बार ऐसे सीनियरों से पाला पड़ा था। बगल में खड़ा एक कैदी अपने मित्र की इस हरकत देख कर मुस्कुरा पड़ा। बस हमारे कुछ फौजी उसे बलिवेदी पर पकड़ लाये और बोले हँसों, वह चुप था कि अचानक स्त्रीमुखी उपसेनापति ने कहा ठीक है रोओ। एक को हँसने के लिए प्रेरित किया जा रहा था तो दूसरे को रोने के लिए। अजीब उठापटक हो रही थी। इतने में सेनापति को समाचार मिला कि अपने खेमे के ही कुछ सैनिक कुछ बन्दियों को अलग ले जा कर प्रताड़ना दे रहे हैं आनन फानन में सियार साहब वहां पहुँचकर मुआयना किये तो पता चला कि वे सैनिक कैदियों को होमवर्क दे रहे हैं कि अगली बार क्या क्या करना है और कैसे करना है। सेनापति को ये बात नागवार लगी और बोले – तुम लोगों को जो करना है समाने आकर करो। तो उस सैनिक गुट के प्रमुख बलिवेदी के निकट आकर बोले – मैने इनको होमवर्क दे दिया है आप लोग भी कर के आइयेगा और घर जाकर नेट पर इस संस्थान का इतिहास देखियेगा अगली क्लास में पूछा जायेगा। मैं नेट श्ब्द सुनकर जरा सा मुस्कुराया। पीछे से कुछ सैनिकों ने हल्ला मचाया सेनापति फिर पगलाये पहुँचे, बोले क्या बात है यार क्यों शोर मचा रहे हो। वे सैनिक कुछ नही बोले क्योंकि उन्हें अपार खुशी हो रही थी इस महौल में कि खुशी बर्दाश्त नही हो रही थी सो पगला रहे थे और सियार साहब को भी पगलवा रहे थे।
संकट की इस घड़ी में आगे बैठी वीरांगनाओं ने अपने हुनर का जादू फैलाया और कुछ देर तक कैदियों को वे ही संभालती रही। कुछ कोमल हृदय वाली वीरांगनायें देर से खड़ी लड़कियों के दर्द को समझा और उन्हें बैठने को कहा। यह देख मुझे खुशी हुई और अफसोस हुआ कि काश ये वीरांगनायें न लाई गयी होती तो ये मुए सैनिक और सेनापति आपस की लड़ाई के चक्कर में एकाध को बेहोश कर ही दिये होते। पिछली बार तो नरमी नही हुई थी।
कुछ अँगरेज़ी विद्या के जानकार चुप्पी साधे बैठे थे कि जब तक सियार महोदय खुद आकर पैरों पर नाक न रगड़े तब तक वे सभा को सम्बोधित नहीं करेंगे। किसी तरह कुछ विद्याधर को मनाया गया तो उनका प्रवचन हुआ। प्रवचन के बाद सेनापति महोदय ने एलान किया कि आज कैदियों के साथ ज्यादा कुछ नही किया जायेगा केवल नाम, रैंक और पसंद पूछ कर छोड़ दिया जायेगा। दरअसल सियार साहब ऐसा नही चहते थे लेकिन वहां की स्थिति बेकाबू हो चली थी सो मजबूरन उन्हें ये कदम उठाना पड़ा। वे अपने इस फैसले की आम सहमति के लिए बार बार वीरांगनाओं से विचार विमर्श कर रहे थे कि कुछ और सैनिको की शिकायत मिल गयी। सियार साहब उधर दौड़ पड़े और इधर उपसेनापति कमान सँभाल लिये। बोले – नाच गाना पसंद में होना ज़रूरी है(क्योंकि नाचने गाने के ये शौकीन थे,बहुत लोगों ने इन्हे नचाया और गवाया था) कुछ ने बात को समझा नही कि आखिर ये क्या बक रहा है, पसंद मे भी घुसपैठ लगा दी कम्बख्तों ने !
जल्दी जल्दी कैदी आते गये, और लेखाधिकारी ने सबके नाम दर्ज कर लिये। मौका-ए-वारदात से सेनापति नदारत थे पता चला कुछ खाने पीने का समान मगवाने गये हैं। तभी पूरे आत्मविश्वास के साथ विश्वास साहब दो शीतल पेय की बोतले टांगे कमरे मे दाखिल हुए, अचानक मेरे मुँह से निकल पड़ा – भाई दूध ले आये होते मुझे तो दूध पीना है आगे पीछे बैठे मित्रगण भड़क गये। मैने उन्हें समझाया कि भाई दरअसल जूनियर्स के माता-पिता हास्टल में दूध की व्यवस्था की मांग कर रहे थे शायद कुछ बच्चे अभी भी दूध पीते होंगे। इसी पर मैने एक टिप्पणी कर दी तो क्या हुआ? मित्रगण बोले – कुछ नही बस मतलब कुछ और निकल गया था।
कैदी बाकायदा समोसे काटने लगे और सूख चुके गले को शीतल पेय के जरिये तर करने लगे। इतने में अचानक प्रकट हुए सियार साहब चिल्लाये – कौन अपने पापा से फोन पर कहा है कि यहां रैगिंग हो रही है!?
कोई जवाब नही मिला क्योंकि सब काटने में व्यस्त थे। कुछ देर और माथापच्ची करने के बाद कैदियों को कुछ शर्तो के साथ छोड़ दिया गया। कैदी खुशी खुशी निकल लिये लेकिन इधर सियार साहब लाल पीले हो रहे थे। अपने कुछ शेष बचे सैनिकों( बाकी सम्मान पाने के चक्कर में कैदियों के साथ निकल गये थे) से थोड़ी देर पहले हुई दुर्व्यवस्था की रिपोर्ट मांग रहे थे। रिपोर्ट के बदले उन्हें वही ज़वाब मिल रहे थे जो पहले मिले थे। सियार साहब ने देखा कि अब दाल नही गलेगी तो उन्होने गुस्सा थूक दिया। कुछ देर बाद बोले कैदियों का ड्रेस कोड क्या होगा। इस प्रश्न पर कुछ सैनिक अपनी शर्ट दिखाने लगे बोले ये अच्छी रहेगी।
तकरीबन आधे घंटे लम्बी बहस के बाद कुछ फैसला हुआ जिसे कुछ वीरांगनायें समझी और कुछ सैनिक बाकी बस मुँह देखते रह गये। इतने में सभा समाप्ति की घोषणा हुई। ज्यादातर लोग बाहर चले गये, रह गये कुछ गिने चुने मर्द लोग, केवल अपनी जाति देखकर सेनापति साहब अपने अन्दर दबी गालियों की लम्बी श्रृंखला बाहर निकालने लगे। काफी देर तक गालियों की बौछार करने के बाद वे कुछ हल्के हुए फिर बोले चलो अब चलते हैं।(दी जा रही गालियां उनको समर्पित थी जो वहां मौजूद नही थे) और हम चल पड़े अपने अपने आशियानों की तरफ।
जब कालेज से बाहर हम आ रहे थे तो देखा कि कुछ कैदी दिये गये होमवर्क की फोटो कापी आपस में बाँट रहे हैं,…………… और सूर्यग्रहण लगने वाला है साथ चल रहे कुल्लू भाई ने याद दिलाया बोले नहा धो कर कुछ खाना।
कुछ देर बाद मै अपने रूम पर पहुँच गया और शाही स्नान किया, तब तक शाही चाय की प्याली तैयार थी। चुस्कियां लेते समय सफेद संगमरमर पर चल रही चींटियों की एक कतार दिख गयी। उनकी कतार में मुझे वही जूनियर्स दिखने लगे, डरे से सहमे से। क्या उनका स्वाभिमान नही होगा? मैं सोचने लगा कि आखिर इस प्रथा को किसने शुरू किया होगा और क्यों? जवाब में एक सीनियर के शब्द तैर गये – “मैं तुम लोगों को मैनर सिखा रहा हूँ जब किसी कम्पनी के इंटरव्यू में बैठोगे तब पता चलेगा इंट्रो का महत्व………तुम्हारी झिझक मिटा रहे हैं हम”
प्रतिउत्तर मे मेरे अन्दर से आवाज आई कि डांट – डपट से कुछ सीखा जा सकता है क्या भला। इससे तो इन्सान को केवल कुंठित बनाया जा सकता है। वही कुंठा जो वर्षों से सीनियर से जूनियर मे जा रही है। सिखाने के कुछ नियम होने चाहिये और खास रूप से सीखने के लिए भयमुक्त होना बेहद ज़रूरी है। लेकिन क्या हम ये कर पा रहे हैं। गिनती गिनाने, हाथ उपर नीचे करवाने से क्या लाभ?
लेकिन तर्कों का कोई ओर छोर नही होता। बगल से आवाज आ जायेगी कि यार बस जान पहचान करवाने के लिए ऐसा है बस!! और ना जाने क्या क्या शहद में लिपटी बातें उछाली जायेंगी। समाज में कई तरह के प्राणी रहते हैं कुछ खास किस्म के प्राणी जिन्हें दूसरों को लाचार देखना बेहद पसंद है। ऐसो का क्या किया जाय!!???
बातें करने वाले बातें सतयुग की करेंगे और काम कलयुग वाला। बातें केवल छलावा मात्र रह गयी हैं।
असल में देखा जाय तो समाज नष्ट हो रहा है, लोग नष्ट हो रहे हैं। चारों तरफ केवल विनाश ही हो रहा है, निर्माण नहीं। अगर हम ज़रा ध्यान से देखें और चीजों का गहराई से विश्लेषण करें तब पता चलेगा कि इस विनाश लीला मे क्या खोया है हमने! हमने अपने जीवन के मूल्य खो दिये हैं अपनी स्वाधीनता खो दी है। बस शेष रह गये हैं केवल खण्डहर जिन पर हम उछल कूद कर रहे हैं।
ओह!! लगता है रात के दो बज गये तभी तो हमारे मूषक महाराज खिड़की पर पधारे हैं, शीशे के उस पार से अन्दर ताक झांक कर रहे हैं दरअसल ये महाशय अपनी प्रिय मूष्टिका का इन्तजार कर रहे हैं जो इस समय बगल के भण्डार गृह मे आराम फरामा रही है। कभी कभी महारानी मूष्टिका चली आती हैं खिड़की पर, लेकिन मूषक महाराज हर रोज चले आते हैं। इनके इस प्रेम मिलन को ध्यान में रखते हुए मुझे अपना लेखन कार्य स्थगित करना पड़ रहा है।
लेकिन अपने जूनियरों (दूसरो को भी जो इस दौर से जूझ रहे हैं) को कुछ टिप्स देकर ही विश्राम करूँगा।
1) जब कोई सीनियर डांट रहा हो तो उससे नजरे मिलाते हुए उसकी बात को गौर से सुनें अगर तनिक भी डर लग रहा हो तो उसे मन में गालियां (जितनी आती हो) देना शुरू कर दें, कान्फिडेंस बढ़ेगा। :) :) :)
2) अगर कोई गाने को कहे और आप गाने के शौकीन न हो या न आता हो तो जितनी कर्कश आवाज आप निकाल पाएं उसी आवाज में एक गीत को अपनी गले से लगायें। :) :)
3) नाचने को कह दिया जाय तो तुरन्त आँखें मूद कर ओशो वाली स्टाइल मे नाचना शुरू कर दे।
4) कोई कविता सुनाने कहने को कहा जाए तो अत्यधिक कठिन शब्द का इस्तेमाल कीजिए।
5) याद रखें आपको डरना नही है यह सब नाटक मात्र मनोरंजन के लिए है (शायद) :(
6) किसी चीज को ना मत कहिए बातें बढ़ सकती हैं
7) खाने पीने में कोई संकोच नही करिए, जहाँ सीनियरों को देखें पहुँच जाएं। वे खुद आपसे दूर रहने लगेंगे। :)
8) याद रखें कभी भी डर को अन्दर न रखें। हानिकारक हो सकता है। अगर लग रहा हो तो खुद को रिचार्ज कीजिए।
9) पढ़ाई पहले स्थान पर है बाकि सब गौण हैं। पढ़ाई छोड़ कर सीनियरों द्वारा दिये गये होमवर्क को न कीजिए। होमवर्क में कुछ भी हो सकता है जैसे एक दूसरे के नाम याद करना।
10) कुछ ही दिन में आप सब समझ जायेंगें। फिर आप शेर बन जायेंगे बाकी सब गीदड़। :)
थोड़ी देर पहले मूष्टिका रानी ने भी दस्तक दे दी है लगता है आज मूषक महाराज की तपस्या सफल होगी। :)
आइये इनके सफल प्रेम के लिये प्रार्थना करें और उन जूनियर्स के लिये भी जिनके सपने में सीनियर उछलकूद कर रहे हैं।
विशेष नोट - यह लेख केवल हास्य - विनोद के लिए है कृपया इसे अन्यथा न लें।
- मनीष
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