Thursday 15 October 2009

इसका शीर्षक आप ही सुझाएँ........




कई वर्षों की

लगातार यात्रा

उन राहों पर

जिनके छोर की तलाश

अब तक है


रास्ते,

जिन पर सुगंध की

मचलती खुशबू है

और

वे आँखे हैं, जिन्हें

दो मोटे शीशे

अपनी आड़ में छिपायें हैं





वर्षों से

इन्हीं रास्तों पर

सुगन्धित नग्न नयन

अपनी चमक छोड़ते रहे



रोशनी से घबराता, मैं


उन रास्तों से


उतरकर


पगडंडियों पर चलने लगता





अतीत की


सुर्ख रोशनी की


लगातार कोशिशों के चलते


आँखे अभ्यस्त हो चली


प्रतीत हुआ


पगडंडियाँ,


कितनी वीरान थीं


सुगन्धित रास्तों की


अपेक्षा





घुमावदार राहों पर

पुनः एक चमक दिखी


जो

दो शीशों को

भेदती हुई

ज्यादा चमकदार हो उठी है

और

उसकी भीनीं रोशनी में

दिख पड़ी है राह

जो

छोर की तरफ ले जाती है



परन्तु

मेरे व्याकुल नेत्र

उन आँखों की

झिलमिल रोशनी को

निहारना चाहते हैं

जो

शीशे के उस पार

अंगड़ाई ले रही है



पलकों के साथ

उतरती सांझ

रंग बिरंगे दृश्यों को

अपने में समेटे हुए

ओस की टपकती बूंदों को

अधरों पर बिखेरती हुई

जुगनुओं के प्रदेश में खो जाती है



उसकी तलाश में

थके कदम

पुनः

घुमावदार रास्तों पर चल पड़ते हैं

और मैं

थके हुए कदमों को

वापस खींचने की

असफल कोशिश करता.............





नोट :- इसका शीर्षक मैं चुन न सका. आप ही सुझाएँ. *****दीपावली की हार्दिक शुभकामनाये*****







Tuesday 29 September 2009

परीक्षण

 

छुटपन में

सुना था, बुजुर्गों की

महफ़िल में

खैनी चूना आँख में डालने से

आँखें अन्धी हो जाती हैं

 

चंचल मन प्रयोग कर

वास्तविकता को

निहारना

चाहता था

 

इन्सान की आँखें

दर्द महसूस करती हैं, सो

एक कुत्ते की आँख में, मैनें

मिश्रण झोंक दिया

 

उसकी तड़प और

दर्द की अभिव्यक्तियॉ,

मेरे अन्तर्मन को

आत्मग्लानि से भर दिया था

 

उसके नेत्र से बह रहे

मवाद

उसके आँसुओं को

समेटे थे, कहीं न कहीं

 

इतने बरस बाद, पुनः

वे आँसू

मेरे नेत्रों से फिसल पड़ते हैं

 

परीक्षण आज भी होते हैं

प्रयोगशालाओं में, अफसोस

इन्सानी आँसू अब बाहर नहीं आते………

 

परीक्षण

छुटपन में

सुना था, बुजुर्गों की

महफ़िल में

खैनी चूना आँख में डालने से

आँखें अन्धी हो जाती हैं

चंचल मन प्रयोग कर

वास्तविकता को

निहारना

चाहता था

इन्सान की आँखें

दर्द महसूस करती हैं, सो

एक कुत्ते की आँख में, मैनें

मिश्रण झोंक दिया

उसकी तड़प और

दर्द की अभिव्यक्तियॉ,

मेरे अन्तर्मन को

आत्मग्लानि से भर दिया था

उसके नेत्र से बह रहे

मवाद

उसके आँसुओं को

समेटे थे, कहीं न कहीं

इतने बरस बाद, पुनः

वे आँसू

मेरे नेत्रों से फिसल पड़ते हैं

 

परीक्षण आज भी होते हैं

प्रयोगशालाओं में, अफसोस

इन्सानी आँसू अब बाहर नहीं आते………

 

Friday 11 September 2009

पहचान




संध्या के चरणों को


चूमते हुए


एक


रौशनी गुजर गयी




आसमान में, मनमोहक


चित्र उकेरते, पंक्षी


सुदूर


अन्धकार में खो गए



जीवन की रहस्यपूर्ण


संवेदना, इस


अन्धकार में महसूस होती हैं



आइना पुकारता हैं


ज़रा सी रोशनी तो ले आ


तुझे तेरा


बिम्ब दिखाता हूँ




एक आवाज सी


गूंजती हैं


दीपक की


झूमती लौ से




आईने में क्या ढूँढते हो


वह तो झूठा हैं


दूसरों की आँखों में


देखो कि तुम्हारा अक्स क्या हैं



- मनीष

दुःख और दर्द


चिलचिलाती धूप में
एक बिलखता
बच्चा
माँ की उंगली पकड़े
घिसटता हुआ

उसके नर्म तलवे
धरातल के ताप से
झुलस रहे हैं


नन्हें कदम
एक लंबा फासला
तय करते हुए
लड़खडा रहे हैं

उसे उम्मीद हैं, कि
वह माँ की गोंद तक
पहुँच जाएगा

परन्तु माँ,
उसके पिता की डांट से
क्षुब्ध हैं
उपज आये क्रोध ने
ममता पर
ग्रहण लगा दिया हैं
और तेज क़दमों से चलती
माँ,
अपने बच्चे को
घसीट रही हैं


नियति दुःख देती हैं
लेकिन
सुख का कारण भी हैं


नन्हें हाथ, फिसलकर
माँ के हाथ से
अलग हो जाते हैं, और
बह पड़ती है, रक्त धार
उसके माथे से

शायद रक्त ने
क्रोध को धुल दिया

और माँ ने उसे
लपक कर, उठाते हुए
सीने से लगा लिया


और बच्चे ने
बिलखना छोड़ दिया .............


क्या वाकई "दर्द"
दुःख देता हैं?
गम देता हैं?


--- मनीष