Saturday 28 June 2008

बारिश हो रही है

  15_78_19---Storm-Clouds_web

बारिश हो रही है

कई दिनों से

कुछ पल आसमान को

देख लेने की मोहलत देकर

बादलों का जत्था

उमड़ता हुआ

आकाश को घेरे है,और

बारिश हो रही है

 

 

नन्हें नन्हों का एक दल

बारिश मे भीगता हुआ

मछलियाँ पकड़ने की असफल

कोशिश करता हुआ

हाथ में आ रही हैं केवल

बारिश की बूँदें

इनके अन्दर बाल उमंग की

जोरदार

बारिश हो रही है

 

 

असंख्य गिरती बूँदों से

भीग उठे हैं गुलशन

सर्द हवाएँ मन को

गुदगुदा रही हैं

नए जोड़े तलाश रहे हैं एकांत

प्रेमियों की भाँति

उनके रग-रग से

प्रेम रूपी वासना की

बारिश हो रही है

 

 

टूटी झोपड़ी में दुबके

बच्चे

खाने की बाट जोहते

और माँ

पानी से भर चुके चूल्हे को

सूनी आँखो से एकटक

निहार रही है

टपकते छप्पर को देख

पिता के मुँह से ,खीस भरी

गालियों की

बारिश हो रही है

 

 

मृत देह

नीम तले रखी हुई

जलता हुआ दीप बुझकर

पानी में तैरता हुआ

एक अजीब सी खामोशी

घेरे है , इस रोने गाने के

शोर के बीच

भीगते परिजनों की आँखो से

बारिश की बूँदों मे घुले

आंसुओं की

बारिश हो रही है

Thursday 26 June 2008

गुरु के बचन

 

पिछली बार आपने गुरु बानी का रस लिया । अब पेश है उससे आगे एक और कविता जो कि पिछली बार के प्रसंग पर ही आधारित है ।

 

आ बचवा , चल चिलम लगा दे !

 

रात भई , जी अकुलाता है

कैसा तो होता जाता है

ऊ ससुरा रमदसवा सरवा

अब तक रामचरित गाता है

रमदसवा जल्दी सो जाए

ऐसा कोई इलम लगा दे !

 

आ बचवा , अन्दरवा आजा

हौले से जड़ दे दरवाजा

रामझरोखे पे लटका दे

तब तक यह बजरंगी धाजा ।

 

हाँ , अब , सब कुछ बहुत सही है

फट से ‘फायर फिलम’ लगा दे !

 

अंत मे जिस ओर इशारा है वह साफ़ है - 'फट से फायर फिलम लगा दे' ।

धार्मिक चीजों पर गंभीर व्याख्यान देना , सम्प्रदायवाद आदि के बारे में लेख आदि लिखने के समानांतर ये कविताएं साधुओं - महंतों के भ्रष्टाचार उजागर करती हैं ।

 

ये सारी रचनाएं 'परिकथा' नामक पत्रिका से ली गयीं हैं ।

आप सब तक पहुँचाने का माध्यम बन कर आपके बीच मुस्कुरा रहा हूँ ।

गुरु बानी

 

खैनी चूना बिन दुःख दूना

सब जग सूना लागे है

मैं तो मैं ना ही हूँ , बचवा !

तू भी तू ना लागे है।

 

राम - नाम से जी उचटे है

जब से डिबिया खतम भई

आकुल मनवाँ सिमरन – पथ से

किधरो – किधरो भागे है ।

 

तू तो, बचवा ! दया धरम का

बड़ा धनी है , कर्मठ है

नेम – जोग व्रत – संजय में भी

सब भगतन से आगे है ।

 

जा बचवा , चुपके से लइहो

चमटोली से चुटकी भर

मेरा नाम न लीहो, कइहो –

नया भगतवा मांगे है ।

 

साधु महात्माओं के कितने चरित्र भ्रष्ट होते हैं “गुरु बानी” बतलाती है।

भ्रष्ट ---- शब्द आगामी प्रस्तुति के लिये है । :)

नोट - अध्ययन के दौरान मिली कुछ नायाब कृतियाँ ।

आगे जारी है ……………

Wednesday 25 June 2008

महानगर मे बकरी

goat 

महानगर के जग - मग करते व्यस्त
राजपथ के इस पार
जाने कब से ताक रही हैं टुकुर - टुकुर
बकरी लाचार
उसको क्या मालूम कि यह हैं
बधिकों की नगरी खूंखार

उसके सिर पर स्वार्थ लोभ की लटक रही
चम् - चम् तलवार
उसके भूचुम्बी थन घिस - घिस छिल
छिल जाते बारम्बार
दूध भरे थन से रह रहकर बह पड़ती
लोहू की धार

उसके लिए नहीं रूक सकती पलभर
ट्रैफिक की रफ़्तार
माँ - माँ करते उसके बच्चे आस देखते
हैं उस पार .

ये कविता आल्ह छंद मे हैं .इसके लेखक कौन हैं ये तो पता नहीं . लेकिन नामवर सिंह ने अपने एक इंटरव्यू मे इस कविता को पढा था . मैंने जब इसे पढा तो बहुत ही प्रभावित हुआ .....और सोचा कि इसे आप सभी को चुसकाऊं . इस रसीली कविता के रस को ...........

कुछ और कवितायेँ हैं ........

जो कि अगली बार ....

Monday 23 June 2008

अनुरोध का सिलसिला

वैसे अनुरोध तो हर 'आम' इन्सान कर सकता है लेकिन पिछले कुछ दिनों से "अनुरोध" की बाढ़ सी आ गयी है । जिसमे अनुरोध का सिलसिला ऐसे चला मानो चींटीयों की कतार ।
आपसे विशेष अनुरोध है कि इस अनुरोध के सिलसिले को पढ़ कर अपने बाल न नोचियेगा ।
दरअसल इस सिलसिले की शुरुआत तो बहुत पहले ही हो चुकी थी । लेकिन अंत शायद कभी न हो । शुरुआत में एक सज्जन ने अनुरोध किया कि भाई साहब एक गिलास पानी है क्या? मैनें हामी भरते हुए कहा - हाँ ……बस सिलसिला चल निकला । वे मेरे कमरे मे आये और देखा कि मैं कुछ लिख रहा हूँ । बड़ी उत्सुकता से उन्होनें उस पर नज़र दौड़ाई और बोले भाई कैसे लिखते है वो भी हिन्दी में !!


हमने कहा - उसके लिये कम्प्यूटर की ज़रूरत पड़ती है । वे पहले खिसियाये फ़िर तैश मे आकर बोले दो दिन मे लेंगे आप दिलायेंगे । उन्होने विशेष अनुरोध किया । मैने कहा - क्यों नहीं !

दो दिनों बाद वे फ़िर हाज़िर हुए और कहे चलते हैं मैने उनके इस अनुरोध को माना और चल दिये इन्दिरा भवन । अच्छे खासे दाम को देख कर पहले वे घबड़ाये फ़िर कहे क्रेडिट कार्ड चलेगा । मैने एक नज़र इनकी पतलून पर दौड़ाई । फ़टी जेब से एक चमचमाता क्रेडिट कार्ड बाहर निकला और मेज पर धराशायी हो गया । दुकानदार ने पहली बार इस वाहियात चीज को देखा और दाँत निपोरते हुए बोला - हें हें हें भाई यहाँ तो कैश चलता है । इतना सुन कर भाई बोले भिखारी हो क्या ? जबकि अभी तक दुकानदार इन्हें समझ रहा था ।
मैने उन्हें किसी और दुकान मे चलने का अनुरोध किया । 10 - 15 दुकाने घूमने के बाद एक जगह क्रेडिट कार्ड की सुविधा मिली , और मेरी जान को छुटकारा मिला । संगणक यंत्र खरीद लेने के पश्चात हमसे अनुरोध किया कि हिन्दी वाला साफ़्ट्वेयर दे दीजिये । हमने दिया । 10 घंटे अभी बीते नही कि दौड़ते आये बोले - " वायरस आ गया है जल्दी चलिए "

ऐसी बातें लगभग रोज होती । जो चीज समझ मे नही आती वह उनके लिये वायरस होती । मेरा जीना हराम कर दिया । मैनें उनसे अनुरोध करने उनके कमरे पर जा पहुँचा कि भई रोज - रोज वायरस आता है तो आप किसी डिप्लोमा कोर्स के लिये आवेदन कर दीजिये । लेकिन वहाँ देखा एक और भाई कम्पूटर लेने को उत्सुक थे बोले भाई मुझे लैपटाप चाहिये दिला देंगे ? हमने कहा भाई लैपटाप बहुत खराब होता है "नाजुक" चीज होती है बलिष्ठ हाथों मे ज्यादा दिन तक नहीं टिक पायेगी । वे कहे - मेरे मामा चाचा फूफा सब लिये हैं लेकिन आज तक खराब हुआ । मैने मन मसोस कर कहा - ठीक है लैपटाप चलाने का खानदानी रोग है तो ठीक है । कल ले लेंगे वे बोले नहीं अभी चाहिये । हमने एक बारगी सोचा कि कहां से मैने लैपटाप ले लिया और आफ़त मुफ़्त आ गयी । मैने अपने जीजू से अनुरोध किया कि आज का खाना वे बना दे खाने के वक्त आ सकेंगे । इतना सुन कर वे लाल पीले होने लगे बोले - ठेकेदार हो गये हो ???

मैनें उन्हें भी इस कमीनी चीज को दिलाया और घर आकर लेट गया । एक - दो दिन तक विशेष राहत मुझे दिया गया लेकिन अगले दिन हाँफ़ते हुए आये बोले - हैंग हो गया , हैंग हो गया । हमने पूछा - क्या ? वे बोले दो बेवकूफ़ फ़ार्मेटिंग कर रहे हैं ……चार घंटे हो गये अभी तक हुआ नहीं । अभी कुछ देर पहले एक विस्फोट हुआ और अब लैपटाप स्टार्ट ही नहीं हो रहा है । मैने एक गहरी सांस ली और कहा चलिये - वहाँ जाकर देखा कि दो बहादुर सीडी डीवीडी अन्दर बाहर कर रहे हैं कोई पावर बटन को मरोड़ रहा है । मुझे देख लोगों ने मुझे स्थान दिया और बोले आप भी तोड़ लीजिये ……बड़ा मजा आ रहा है नया नया लैपटाप चलाने में ,लेकिन पता नही क्या दिक्कत आ गयी चल नहीं रहा है । मैनें अनुरोध किया कि आप लोग मुझे अकेला छोड़े तो कुछ सोच पाउं । दोनो वीर खीस निपोरते हुए रफ़्फ़ूचक्कर हो गये ।मानो कहीं नेवता खाने आये हों ।

दो दिन की कठिन मशक्कत के बाद उनका लैपटाप सही हुआ और मैने कहा भाई अब देखना खराब न हो , आपसे अनुरोध है । उन्होने फ़िर अनुरोध किया कि मुझे भी ब्लाग के बारे मे बताईए मैने एक ब्लाग बना कर दिखाया तो वे 5-6 ब्लाग बना कर बैठ गये और लिखे कुछ नहीं । कुछ दिन बाद कहे कोई कमेंट नही आया मैने कहा ब्लाग्वाणी पर चले आईये । बहुत खलिहर बैठे हैं आपको देखने के लिये । आपकी कालजयी रचनाओं को पढ़ने के लिये । तो कहे ये क्या होता है ? मैने कहा - ब्लाग का अखबार !!

हमसे कहे कैसे नामांकन कराये …………मैनें कहा - यार पता नही । मुझे तो समीर जी ने घसीटा इस 'दलदल' में । मुझे भी घसीटवाइये । मैने कहा -- ठीक है । समीर जी से अनुरोध करूंगा ।

मैने समीर जी से अनुरोध किया , उन्होने मैथिली जी से अनुरोध किया , मैथिली जी ने किसी सहायक से अनुरोध किया होगा । लेकिन सहायक ने एक बार ब्लाग देख कर अनुरोध को लात मार दी होगी । बेचारे आज भी अनुरोध करते हैं कि एक बार फ़िर से अनुरोध करूं लेकिन डर लगता है कि कहीं मुझे न लात पड़ जाये । सो आज तक यही बहाना मार रहा हूँ कि भाई ब्लागवाणी पर कुछ काम चल रहा है । काम पूरा होते ही आप भी 'दलदल' के सदस्य होंगे । लेकिन अनुरोध का सिलसिला आज तक नहीं रूका ।

मैनें उन्हें बहुत चिरकुट टाइप का घोषित कर दिया है लेकिन हैं बड़े अच्छे इन्सान ! अध्यात्म , नैतिकता , सदाचार से ओतप्रोत हैं बस मेरी जान के पीछे पड़े रहते हैं और अनुरोध पर अनुरोध करते ही रहते हैं ।
कभी इस काम के लिये कभी उस काम के लिये ………………

अनुरोध का सिलसिला

वैसे अनुरोध तो हर 'आम' इन्सान कर सकता है लेकिन पिछले कुछ दिनों से "अनुरोध" की बाढ़ सी आ गयी है । जिसमे अनुरोध का सिलसिला ऐसे चला मानो चींटीयों की कतार ।

आपसे विशेष अनुरोध है कि इस अनुरोध के सिलसिले को पढ़ कर अपने बाल न नोचियेगा ।

दरअसल इस सिलसिले की शुरुआत तो बहुत पहले ही हो चुकी थी । लेकिन अंत शायद कभी न हो । शुरुआत में एक सज्जन ने अनुरोध किया कि भाई साहब एक गिलास पानी है क्या? मैनें हामी भरते हुए कहा - हाँ ……बस सिलसिला चल निकला । वे मेरे कमरे मे आये और देखा कि मैं कुछ लिख रहा हूँ । बड़ी उत्सुकता से उन्होनें उस पर नज़र दौड़ाई और बोले भाई कैसे लिखते है वो भी हिन्दी में !!
हमने कहा - उसके लिये कम्प्यूटर की ज़रूरत पड़ती है । वे पहले खिसियाये फ़िर तैश मे आकर बोले दो दिन मे लेंगे आप दिलायेंगे । उन्होने विशेष अनुरोध किया । मैने कहा - क्यों नहीं !

दो दिनों बाद वे फ़िर हाज़िर हुए और कहे चलते हैं मैने उनके इस अनुरोध को माना और चल दिये इन्दिरा भवन । अच्छे खासे दाम को देख कर पहले वे घबड़ाये फ़िर कहे क्रेडिट कार्ड चलेगा । मैने एक नज़र इनकी पतलून पर दौड़ाई । फ़टी जेब से एक चमचमाता क्रेडिट कार्ड बाहर निकला और मेज पर धराशायी हो गया । दुकानदार ने पहली बार इस वाहियात चीज को देखा और दाँत निपोरते हुए बोला - हें हें हें भाई यहाँ तो कैश चलता है । इतना सुन कर भाई बोले भिखारी हो क्या ? जबकि अभी तक दुकानदार इन्हें समझ रहा था ।

मैने उन्हें किसी और दुकान मे चलने का अनुरोध किया । 10 - 15 दुकाने घूमने के बाद एक जगह क्रेडिट कार्ड की सुविधा मिली , और मेरी जान को छुटकारा मिला । संगणक यंत्र खरीद लेने के पश्चात हमसे अनुरोध किया कि हिन्दी वाला साफ़्ट्वेयर दे दीजिये । हमने दिया । 10 घंटे अभी बीते नही कि दौड़ते आये बोले - " वायरस आ गया है जल्दी चलिए "

ऐसी बातें लगभग रोज होती । जो चीज समझ मे नही आती वह उनके लिये वायरस होती । मेरा जीना हराम कर दिया । मैनें उनसे अनुरोध करने उनके कमरे पर जा पहुँचा कि भई रोज - रोज वायरस आता है तो आप किसी डिप्लोमा कोर्स के लिये आवेदन कर दीजिये । लेकिन वहाँ देखा एक और भाई कम्पूटर लेने को उत्सुक थे बोले भाई मुझे लैपटाप चाहिये दिला देंगे ? हमने कहा भाई लैपटाप बहुत खराब होता है "नाजुक" चीज होती है बलिष्ठ हाथों मे ज्यादा दिन तक नहीं टिक पायेगी । वे कहे - मेरे मामा चाचा फूफा सब लिये हैं लेकिन आज तक खराब हुआ । मैने मन मसोस कर कहा - ठीक है लैपटाप चलाने का खानदानी रोग है तो ठीक है । कल ले लेंगे वे बोले नहीं अभी चाहिये । हमने एक बारगी सोचा कि कहां से मैने लैपटाप ले लिया और आफ़त मुफ़्त आ गयी । मैने अपने जीजू से अनुरोध किया कि आज का खाना वे बना दे खाने के वक्त आ सकेंगे । इतना सुन कर वे लाल पीले होने लगे बोले - ठेकेदार हो गये हो ???

मैनें उन्हें भी इस कमीनी चीज को दिलाया और घर आकर लेट गया । एक - दो दिन तक विशेष राहत मुझे दिया गया लेकिन अगले दिन हाँफ़ते हुए आये बोले - हैंग हो गया , हैंग हो गया । हमने पूछा - क्या ? वे बोले दो बेवकूफ़ फ़ार्मेटिंग कर रहे हैं ……चार घंटे हो गये अभी तक हुआ नहीं । अभी कुछ देर पहले एक विस्फोट हुआ और अब लैपटाप स्टार्ट ही नहीं हो रहा है । मैने एक गहरी सांस ली और कहा चलिये - वहाँ जाकर देखा कि दो बहादुर सीडी डीवीडी अन्दर बाहर कर रहे हैं कोई पावर बटन को मरोड़ रहा है । मुझे देख लोगों ने मुझे स्थान दिया और बोले आप भी तोड़ लीजिये ……बड़ा मजा आ रहा है नया नया लैपटाप चलाने में ,लेकिन पता नही क्या दिक्कत आ गयी चल नहीं रहा है । मैनें अनुरोध किया कि आप लोग मुझे अकेला छोड़े तो कुछ सोच पाउं । दोनो वीर खीस निपोरते हुए रफ़्फ़ूचक्कर हो गये ।मानो कहीं नेवता खाने आये हों ।

दो दिन की कठिन मशक्कत के बाद उनका लैपटाप सही हुआ और मैने कहा भाई अब देखना खराब न हो , आपसे अनुरोध है । उन्होने फ़िर अनुरोध किया कि मुझे भी ब्लाग के बारे मे बताईए मैने एक ब्लाग बना कर दिखाया तो वे 5-6 ब्लाग बना कर बैठ गये और लिखे कुछ नहीं । कुछ दिन बाद कहे कोई कमेंट नही आया मैने कहा ब्लाग्वाणी पर चले आईये । बहुत खलिहर बैठे हैं आपको देखने के लिये । आपकी कालजयी रचनाओं को पढ़ने के लिये । तो कहे ये क्या होता है ? मैने कहा - ब्लाग का अखबार !!

हमसे कहे कैसे नामांकन कराये …………मैनें कहा - यार पता नही । मुझे तो समीर जी ने घसीटा इस 'दलदल' में । मुझे भी घसीटवाइये । मैने कहा -- ठीक है । समीर जी से अनुरोध करूंगा ।

मैने समीर जी से अनुरोध किया , उन्होने मैथिली जी से अनुरोध किया , मैथिली जी ने किसी सहायक से अनुरोध किया होगा । लेकिन सहायक ने एक बार ब्लाग देख कर अनुरोध को लात मार दी होगी । बेचारे आज भी अनुरोध करते हैं कि एक बार फ़िर से अनुरोध करूं लेकिन डर लगता है कि कहीं मुझे न लात पड़ जाये । सो आज तक यही बहाना मार रहा हूँ कि भाई ब्लागवाणी पर कुछ काम चल रहा है । काम पूरा होते ही आप भी 'दलदल' के सदस्य होंगे । लेकिन अनुरोध का सिलसिला आज तक नहीं रूका ।

मैनें उन्हें बहुत चिरकुट टाइप का घोषित कर दिया है लेकिन हैं बड़े अच्छे इन्सान ! अध्यात्म , नैतिकता , सदाचार से ओतप्रोत हैं बस मेरी जान के पीछे पड़े रहते हैं और अनुरोध पर अनुरोध करते ही रहते हैं ।
कभी इस काम के लिये कभी उस काम के लिये ………………

Saturday 21 June 2008

पशु ज्ञान

               dog

एक दिन एक भूखा लड़का एक दुकान से रोटी चुराकर भागने लगा । आगे - आगे लड़का पीछे - पीछे दुकानदार । इतने मे एक कुत्ते ने झपट्टा मारकर रोटी लड़के से छीन ली और एक तरफ़ रवाना हो गया । रोटी के यूँ छिन जाने से लड़का हताश होकर रूक गया । इतने मे दुकानदार ने आकर लड़के की धुनाई शुरु कर दी । यह देख रोटी ले जाता कुत्ता ठिठक गया । उसने रोटी छोड़ कर दुकानदार पर छलांग लगा दी । मौका देख लड़का वहाँ से निकल गया । लस्त पस्त दुकानदार ने भाग लेने मे अपनी भलाई समझी ।

भूखे लड़के की सहायता कर कुत्ते की आँखों से संतोष की अविरल धारा बह रही थी ।

नोट – उपरोक्त लघुकथा पुरानी है । आजकल के कुत्ते , कुत्ते ही होते हैं । बिना बात के बिगड़ पड़ते हैं ।

अभी कल मैं सब्जी लेकर घर आ रहा था बीच मे एक कुत्ते से नोंक झोंक हो गयी । तभी उपर दो मंजिले मकान से आवाज आयी कि बंटी बंटी कहो तो कुत्ता मान जायेगा । मैने कहा – भाई आपका क्या नाम है , वे बोले – राहुल !

मैनें कहा – तब राहुल – राहुल बोलना पड़ेगा । तब इ ससुरा मानेगा ।

वे बोले – क्यों ।

मैनें कहा – छोटों को समझाने के लिए बड़े को बुलाते हैं ।

इतना सुन कर उपर से वे भी भौकने लगे । मैने एक ईट उठाई और कुत्ते को दिखाई । कुत्ते ने समझ लिया कि अब उसकी खैर नही और भाग गया ।

लेकिन उपर से भौकने की आवाज बंद नही हुई । मैने ईट उपर भी दिखाई और कहा – ये तेरे लिये ही उठाई हैं ।

मैनें जैसे ही सामाजिक औकात दिखाई तो वे भौकना छोड़ कर बतियाने लगे बोले – वो कुत्ता सबको ऐसे ही परेशान करता है । लेकिन काटता नहीं है …………………

मैनें मन ही मन कहा – आपके जैसा होगा ।

और आगे बढ़ चला ।

Wednesday 11 June 2008

बचपन की यादें

 

वो बचपन की यादें कहानी बड़ी सी

कहानी में राजा और रानी खड़ी सी

वो राजा और रानी के महलों का डेरा

वो महलों की भी एक कहानी बड़ी सी

वो बचपन की …………

 

कोमल परों से वो ऊँची उड़ानें

कहाँ खो गये , अब मेरे वो ज़माने

सारे जहाँ में भी जागीर अपनी

जहाँ हर घड़ी मन में महफ़िल सजी सी

वो बचपन की …………

 

हमारे लिए हर था वादा अधूरा

अधूरी थी रातें या सपना अधूरा

कभी खुद सजाते थे सपनों का आंगन

वो आंगन में खुद की परछायी बड़ी सी

वो बचपन की …………

 

वो पोखर के पानी में कश्ती का डेरा

कश्ती का मालिक था , मैं एक अकेला

कश्ती में बस्ती का घर-घर समाया

कोई मुस्कुराया वो कैसी खुशी थी

वो बचपन की …………

 

वो चलते हुए टिमटिमाते सितारे

जिन्हें छत पे लेटे हम रातो निहारे

कभी हम पुकारें चले और तारें

तारों बेचारों की छोटी दरी सी

वो बचपन की …………

 

                  लेखक - प्रिय मित्र शत्रुधन दूबे

जगजीत सिंह के बाद इन्हीं का नबंर आएगा , ऐसा लगता है।

शब्दों मे जगजीत सिंह की एक ग़ज़ल की मिलावट नज़र आ रही है ।

लेकिन कभी कभार मेलजोल बढ़ाना अच्छा लगता है ।

Sunday 8 June 2008

जहाँ देखो वहाँ मौत

 

अखबार मे जीने मरने की ख़बरें होती ही हैं । लेकिन अगर पूरा पेज़ ही ऐसी खबरों से भरा पड़ा हो तो अफ़सोस नहीं होता बल्कि हँसी आती है । उदाहरण के तौर पर आज छपी कुछ खबरें पेश हैं ---

 

दिमागी बुखार से युवक की मौत

 

जहरीला पदार्थ खाने से विवाहिता कि मौत

 

झोलाछाप डाक्टर की लापरवाही से दो मरे

 

हादसे मे किशोर व बालिका की गई जान

 

कुएं में गिरकर बालक की मौत

 

ट्रक की टक्कर से वृद्ध कि मौत

 

रहस्यमय हालात में विवाहिता की मौत

 

दीवार गिरने से युवती की मौत

 

सीमा की मौजूदगी में हुआ शशि का कत्ल

 

हादसों मे छह की मौत

 

पति की दुकान के सामने आग का शोला बनी महिला की मौत

 

रास्ते के विवाद मे वृद्ध की हत्या

 

युवक को तमंचे से मारी गोली , मौत

 

पुलिस के भय से युवक ने फांसी लगाकर जान दी

 

नैनी ब्रिज से कूद कर नवयुवती ने जान दी

 

प्रेमी को प्रेमिका के घर रंगे हाथों पकड़ा गया पिटाई के दौरान मौत

 

और भी न जाने क्या क्या । मैं सोचता हूँ कि आखिर ऐसी खबरें किसके लिये छापी जाती हैं । शहरी तो विज्ञापन देखते हैं कि आज बिग बाजार में आज नई स्कीम क्या है ,कौन सा नया मोबाइल हैंड्सेट आया है , कौन सी नई फ़िल्म लगी है आदि आदि । बुजुर्ग तो राजनीति वाली खबरों में घुसे रहते हैं और नौजवान तो रंगीन पृष्ठ पर ही नज़रें गड़ाए रहते हैं ।

 

ऐसे समाज मे ये मौत वाली खबरें कौन पढ़ता है । हाँ मम्मी दादी को सुनाती है कि यहाँ आज ऐसा हुआ तो दादी कुछ उदास हो जाती हैं । अगर नन्हें बच्चे को संडास की ज़रूरत पड़ती है तो अखबार का वही पेज नीचे लगा दिया जाता है ।

 

ये मौत से रूबरू कराने वाली खबर का आखिरी अन्जाम है । हमारे जैसे कुछ मनचले कभी मौत पर हँस लेते हैं तो कभी ऐसी खबरों पर ।

 

हँसी और मौत का क्या ठिकाना ,कि कब आ जाये ।

रेल चली

   train1

भारतीय रेल की
जनरल बोगी
पता नहीं
आपने भोगी कि नहीं भोगी

एक बार
हम भी कर रहे थे यात्रा
प्लेटफार्म पर देखकर
सवारियों की मात्रा
हमारे पसीने छूटने लगे
हम झोला उठाकर
घर की ओर फूटने लगे
तभी एक कुली आया
मुस्कुरा कर बोला -
        ' अन्दर जाओगे ?'
हमने कहा -
        'तुम पहुँचाओगे !'
वो बोला -
         बड़े बड़े पार्सल पहुँचाये हैं
         आपको भी पहुंचा दूंगा
         मगर रुपये
         पूरे पचास लूंगा .
हमने कहा -
         पचास रूपैया ?
वो बोला -
         हाँ भैया
         दो रूपये आपके
         बाकी सामान के

हमने कहा -
         सामान नहीं हैं
         अकेले हम हैं
वो बोला -
          बाबू जी ,
          आप किस सामान से कम् हैं !
          भीड़ देख रहे हैं
          कंधे पर उठाना पड़ेगा
          वैसे तो

          हमारे लिए

          बाएँ हाथ का खेल हैं

          मगर आपके लिए 

          दायाँ भी

          लगाना पड़ेगा

          हो सकता हैं

          लात भी लगानी पड़े !

          मंज़ूर हो तो बताओ
हमने कहा -

          देखा जायेगा

          तुम उठाओ !
          कुली ने 

          बजरंग बली का 

          नारा लगाया 

         और पूरी ताकत लगाकर 

         हमें जैसे ही उठाया 

         कि खुद बैठ गया

         दूसरी बार कोशिश की

        तो लेट गया
हाथ जोड़ कर बोला -

          बाबू जी 

         पचास रुपये तो कम् हैं 

         हमें क्या मालूम था

         कि आप 

         आदमी नहीं, बम हैं

         भगवान ही

         आपको उठा सकता हैं

         हम

         क्या खाकर उठाएंगे

         आपको उठाते उठाते

         खुद दुनिया से उठ जायेंगे !


हमने कहा - 

         बातें मत बनाओ 

        जब ठेका लिया हैं

        तो उठाओ

         कुली ने 

        अपने

       चार साथियों को बुलाया

       और पता नहीं

        आँखों ही आँखों मे

        क्या समझाया

        कि चारो ने

        लपक कर हमें उठाया

       और हवा मे झुला कर

        ऐसे निशाने से

        अन्दर फेंका

        कि हम

         जैसे ही

       खिड़की से अन्दर पहुंचे

       दो यात्री

       हमसे टकरा कर

       दूसरी खिड़की से बाहर !

       जाते जाते

        एक बोला -

                     बधाई !

        दूसरा बोला -

                     सर्कस मे

                    काम करते हो क्या भाई ?

       अब ज़रा

       डिब्बे के अन्दर

       झाँकिए श्रीमान

       भगवान जाने

        डिब्बा था

        या हल्दी घाटी का मैदान

        लोग

        लेटे थे ,बैठे थे ,खड़े थे

        कुछ ऐसे भी थे

        जो न बैठे थे

         न खड़े थे

         सिर्फ थे

         कुछ

         हनुमान जी के वंशज

         एक दूसरे के

          कन्धों पर चढ़े थे

          एक कन्धा

         खाली पड़ा था

          शायद

          हमारे लिए रखा था

          हम उस पर चढ़ने लगे

          तो कंधे के स्वामी 

         बिगड़ने लगे

         बोले-

                    किधर?

         हमने कहा -

                    आपके कंधे पर !

         वे बोले -

                     दया आती हैं

                     तुम जैसे अंधे पर

                     देखते नहीं

                     मैं खुद दूसरे के कंधे पर बैठा हूँ .


         उन्होने

         अपना कंधा हिला दिया

         हम

        पुनः धरती पर लौट आये

        सामने बैठे

         एक गंजे यात्री से 

       गिडगिडाये  -

                  भाई साहब

                 थोडी - सी जगह 

                 हमारे लिए भी

                 बनाइये

        वो बोला -

                 आइये

                 हमारी

                 खोपडी पर बैठ जाइए

                 आप ही के लिए

                 साफ की हैं

                 केवल

                 दो रुपये देना

                 मगर फिसल जाओ

                तो

                हमसे मत कहना !

     

     तभी एक बोरा

     खिड़की के रास्ते चढ़ा

      आगे बढ़ा

      और गंजे के सिर पर गिर पड़ा

     गंजा चिल्लाया -

                       किसका बोरा हैं ?

     बोरा

     फौरन खडा हो गया

     और उसमे से

      एक लड़का

     निकल कर बोला -

                     अकेला बोरा नहीं हैं अंकल

                    बोरे के भीतर

                    बारह साल का छोरा हैं 

                    अन्दर आने का

                    यही एक तरीक़ा है

                    हमने अपने

                    माँ – बाप से सीखा है

                    आप तो

                    एक बोरे में ही

                    घबरा रहे हैं

                    ज़रा ठ्हर तो जाओ

                    अभी गद्दे मे लिपट कर

                    हमारे

                    बाप जी अन्दर आ रहे हैं

                    उनको आप

                   कैसे समझाएंगे

                   हम तो खड़े भी हैं

                   वो तो आपकी

                   गोद मे ही

                   लेट जायेंगे

 

एक अखन्ड सोऊ

चादर ओढ़ कर सो रहा था

एकदम

कुम्भकर्ण का

बाप हो रहा था

हमने जैसे ही

उसे हिलाया

उसकी बगल वाला चिल्लाया –

                    खबरदार

                    हाथ मत लगाना

                    वरना पछताओगे

                    हत्या के ज़ुर्म मे

                   अन्दर हो जाओगे

हमने पूछा –

                   भाई साहब

                   क्या लफ़ड़ा है ?

वो बोला –

                  बेचारा आठ घन्टे से

                 एक टांग पर खड़ा है

                 और खड़े-खड़े

                  इस हालत में पहुँच गया

                 कि अब पड़ा है

                 आपका हाथ लगते ही

                ऊपर पहुँच जायेगा

                 इस भीड़ में

                 ज़मानत कराने

                 क्या तुम्हारा बाप आयेगा ?

 

एक नौजवान

खिड़की से

अन्दर आने लगा

तो पूरा डिब्बा मिल कर

उसे बाहर धकियाने लगा

नौजवान बोला –

                  भाइयों,भाइयों

                  सिर्फ़ खड़े रहने को

                  जगह चाहिये

एक अन्दर वाला बोला –

                  क्या?

                  खड़े रहने को जगह चाहिये

                 तो प्लेट्फ़ार्म पर

                  खड़े हो जाइये

                  ज़िन्दगी भर

                 खड़े रहिये

                 कोई हटाए तो कहिये

                 जिसे देखो

                 घुसा चला आ रहा है

                 रेल का डिब्बा

                 साला

                 जेल हुआ जा रहा है !

 

इतना सुनते ही

एक अपराधी चिल्लाया –

                चुप रहो ,

                  रेल को जेल मत कहो

                मेरी आत्मा रोती है

                यार

               जेल के अन्दर

               कम से कम

               चलने फ़िरने की

               जगह तो होती है!

              

एक सज्जन

फ़र्श पर बैठे हुए थे

आँखें मूंदे

उनके सिर पर

अचानक गिरीं

पानी की गरम – गरम बूंदें

तो वे सिर उठा कर चिल्लाए –

                  कौन है, कौन है

                  साला

                  पानी गिरा कर मौन है

                  दिखता नहीं

                  नीचे

                 तुम्हारा बाप बैठा है !

उपर से आवाज़ आई –

                  क्षमा करना बड़े भाई

                 पानी नहीं है

                 हमारा

                 छः महीने का बच्चा लेटा है

                 कृपया माफ़ कर दीजिए

                और अपना

                मुँह भी नीचे कर लीजिए

               वरना बच्चे का

               क्या भरोसा !

 

एक साहब बहादुर

बैठे थे सपरिवार

हमने पूछा –

         कहाँ जा रहे हैं सरकार ?

वे झल्लाकर बोले -

                जह्न्नुम में !

हमने पूछ लिया -

               विथ फ़ैमिली ?

वे बोले –

               आपको भी

               मज़ाक़ करने के लिए

               यही जगह मिली ?

 

अचानक डिब्बे में

बड़ी ज़ोर का हल्ला हुआ

एक सज्जन

दहाड़ मार कर चिल्लाए –

                पकड़ो-पकड़ो

                जाने न पाए

हमने पूछा –

               क्या हुआ क्या हुआ ?

 

वे बोले –

                हाय – हाय मेरा बटुआ

               किसी ने

               भीड़ मे मार दिया

               पूरे तीन सौ रूपये से उतार दिया

               टिकट भी उसी में था !

कोई बोला –

               रहने दो यार

               भूमिका मत बनाओ

               टिकट न लिया हो

               तो हाथ मिलाओ

               हमने भी नहीं लिया है

               आप इस तरह चिल्लायेंगे

                तो आपके साथ

               हम भी नहीं पकड़ लिए जाएंगे …

 

वे सज्जन रोकर बोले –

                  नहीं भाई साहब

                  विश्वास कीजिये

                   मैं झूठ नहीं बोलता

                   मैं एक टीचर हूँ …

 

कोई बोला –

                    तभी तो झूठ है

                     टीचर के पास और बटुआ ?

                     इससे अच्छा मज़ाक़

                    इतिहास में

                    आज तक नहीं हुआ !

 

टीचर बोला –

                    कैसा इतिहास

                   मेरा विषय तो भूगोल है

 

तभी एक विद्यार्थी चिल्लाया –

                    बेटा

                    इसीलिए

                   तुम्हारा बटुआ गोल है !

 

बाहर से आवाज़ आई –

                    ‘गरम समोसे वाला’

 

अन्दर से

फ़ौरन बोले एक लाला –

                   दो हमको भी देना भाई

सुनते ही

ललाइन ने डाँट लगाई –

                   बड़े चटोरे हो!

                   क्या पाँच साल के छोरे हो ?

                   इतनी गर्मी में खाओगे ?

                   फ़िर पानी को तो नहीं चिल्लाओगे ?

                    अभी मुँह में आ रहा है

                   समोसे खाते ही

                   आँखों मे आ जायेगा

                    इस भीड़ में पानी

                     क्या रेल मंत्री दे जायेगा ?

 

तभी डिब्बे में हुआ

हल्का उजाला

किसी ने जुमला उछाला

                      ये किसने बीड़ी जलाई है ?

 

कोई बोला –

                    बीड़ी नहीं है

                    स्वागत करो

                    डिब्बे मे

                   पहली बार बिजली आई है

 

दूसरा बोला –

                    पंखे कहाँ हैं ?

 

उत्तर मिला –

                  जहाँ नहीं होना चाहिए

                  वहाँ हैं

                  पंखों पर

                  आपको क्या आपत्ति है ?

                   जानते नहीं

                   रेल हमारी राष्ट्रीय सम्पत्ति है

                  कोई राष्ट्रीय चोर

                  हमें घिस्सा दे गया है

                  सम्पत्ति में से

                  अपना हिस्सा ले गया है

                  आपको लेना हो

                   तो आप भी ले जाओ

                    मगर जेब में

                   जो बल्ब रख लिए हैं

                    उनमें से

                    एकाध तो हम्को दे जाओ !

 

एक यात्री

बर्थ के नीचे से निकलता हुआ

अपनी आँखें मलता हुआ

फ़िल्मी अंदाज़ में बोला –

                      मैं कौन हूँ ?

उसका पड़ोसी बोला –

                     शुक्र करो बेटा कि हो

                     वरना कल रेलवे कर्मचारी पूछते

                      ‘ये कौन था’

 

इतना सुनते ही

पूछने वाला मौन था

 

अचानक गाड़ी

बड़ी ज़ोर से हिली

एक यात्री

ख़ुशी के मारे चिल्लाया –

                    ‘अरे चली ,चली ‘

कोई बोला –

                  जय बजरंग बली

कोई बोला –

                     या अली

 

हमने कहा –

                 काहे के अली

                  और काहे के बली !

 

               गाड़ी तो

              बगल वाली जा रही है

               और तुमको

              अपनी चलती नज़र आ रही है ?

 

प्यारे !

सब नज़र का धोखा है

दरअसल ये

रेलगाड़ी नहीं

हमारी ज़िन्दगी है

और ज़िन्दगी मे

धोखे के अलावा

और क्या होता है ?

 

-------    *********     --------

 

नोट – उपरोक्त हास्य रचना मशहूर हास्य कवि ‘प्रदीप चौबे’ द्वारा रचित है इनके लिखने की शैली ज़रा हट के है ।

 

कुछ दिन पहले

मैने इनकी एक

किताब पाई

उस पर

नज़र दौड़ाई

लिखा था ‘बाप रे बाप’

पढ़ते ही हँसी आई

 

सोचा कि

न जानने वालों को भी

हंसाया जाये

सभी को

रेल मे चढ़ाया जाये

 

 

------- मनीष यादव____ एक नादान परिन्दा …

Sunday 1 June 2008

झिनकू काका की याद में ......

OldMan1

एक हमारे ही गाँव के झिनकू काका थे .थे तो बुजुर्ग लेकिन गाँव की नजर में बच्चे ही थे .जैसा सब जानते हैं कि पहले कैसे कैसे नाम रखे जाते थे ..कुछ नमूने पेश हैं ...

टेढ़ई ,भगनू ,खरपत्तू ,लुरझुर,मेटा,गड़ारी,आँखमुन्नन,रजई,झोलई.....और भी कई टाइप के नाम होते ..जिसे सुनते ही होंठ अपने आप ही फ़ैल जाते . गलती से अगर बुलाने की ध्वनि सुन ली तो फिर हँसे बगैर रहा ही नहीं जाता .


झिनकू केवल नाम ही था ,थे बड़े लम्बे तम्बे.हाँ दिमाग के कुछ पैदल थे . उम्र के साथ केवल शरीर में वृद्धि हुई ,अकल वहीं की वहीं रह गयी जैसी छुटपन में थी .


दिन उगते ही में गाँव के ६० चक्कर लगाना उनकी आदत में शुमार था . कभी इस घर कभी उस घर एलार्म घड़ी की तरह आवाज करते और उनका वही हाल होता जो एलार्म घड़ी का होता है .वापस आते आते दोपहर हो जाती ..और कुछ खाने के बाद चमरौटी की तरफ रूख करते . कुछ चमारजादी इनकी प्रेयसी थी . कुछ था नहीं बस दर्शन करने चले जाते थे .दर्शन के अलावा और कुछ उन्होने सोचा नहीं या फिर ऐसा भी हो सकता कि वहाँ तक सोचने की इनकी सोच ही न रही हो .


शाम होने तक स्कूल के पकड़ी के पेड़ के नीचे चहुंप (पहुँच) आते थे .जहाँ पर बुजुर्गों की नायाब सभा बैठती थी .बूढ़ों की बाते गौर से सुनते और शाम को किसी छोटे बच्चे को पकड़ कर उसकी (सभा की ) समीक्षा करते हुए कहते कि मिसरा जी बहुत अच्छा बोलते हैं ....दूबे जी तो बकचोद हैं खाली हूँ हूँ करते रहते हैं ...आज बनियवा भी आय गया रहा ...बहिनचोद ...तेल पेरे वाले बकैती पे उतर आये हैं .


जी भर कर बोल लेने के बाद एक गहरी सांस लेते हुए बच्चे को छोड़ देते ....और बच्चा आँख मूँद कर घर के अन्दर भागता ....जैसे ये खुद अपनी या अपने से बड़ी उम्र वालों को देख कर घर के अन्दर भागते .


हांलाकि ये भी कभी कभी शाम वाली सभा में अपना मत दे देते थे ....लेकिन कोई गौर नहीं करता . ये खुद बकते खुद सुनते . जब कभी जोर देकर अपनी बात रखते तो सभा से एक आवाज आती " का रे सारे ! कहिया क हगले बाटे " (का रे साले ! मल उत्सर्जन किये कितने दिन हुए ).


अब ये चुप ....... उठ कर चल देते तो पीछे से आवाज आती ---भुला गयल रहले का !!?? अब याद आइल ! (भूल गए थे क्या !? अब याद आया ) दरिद्र सारे !!

इनके हगने वाली बात पूरे गाँव में मशहूर थी . सब जानते थे कि ये हफ्ते में एक बार हगने जाते हैं . सुबह जाते तो फिर दोपहर को आते ...अगर दोपहर में गए तो शाम तो हो ही जाती थी . एक बड़ा जानदार वाक़या है इनके हगने को लेकर ...


गाँव में पहले प्रौढ़ शिक्षा अभियान चलता था ये भी कभी कभी पढ़ लिया करते . एक दिन वर्णमाला के कुछ अक्षर सिखाये जा रहे थे. ये अभी क से कबूतर ही पढ़ पाए थे कि इनको हगवास लग गयी. ये दूर उसर में गए और हगना शुरू किये . और हग हग कर इन्होने क से कबूतर लिख दिया ....लिखने में इनको शाम हो गयी और कुछ चरवाहे इनको देख रहे थे कि एक बूढा काफी देर से यहाँ वहाँ उठ बैठ कर मल त्याग कर रहा है ...इनके चले आने के बाद चरवाहों ने मुआयना किया तो यह बात सामने आई . तब से सारा गाँव इनको क से कबूतर कह कर छेड़ता . और जब ये लोटा पर राख लगा कर जाने की तैयारी में होते तो आवाज आती कि आज क्या लिखने का इरादा है .इतना सुनकर ये गालियों की बौछार कर देते . कई बार तो इनको लोटा लेकर जाते देख बच्चों का एक झुंड इनके पीछे लग जाता और इनके हगने की स्टाइल चोरी छिपे देखता कि कैसे ये २०० मीटर के दायरे में हगते हैं और हगने के बाद क्या आकृति नजर आती है ..कुछ खास होता तो पूरे गाँव में हो हल्ला हो जाता .

इसी डर से कि कहीं कोई हगते न देख ले ये गाँव से १५ किमी दूर हगने जाते थे .लौटते समय पूरे गाँव को एक तरफ से गरियाते आते .


एक दिन इनके पोते का हाई स्कूल का रिजल्ट आया ...बेचारा फेल था . उसके पिता जी उसे डंडो से (कई किस्म के थे )पीट रहे थे .इतने में वे आये और बोले - काहे मारत हे रे (क्यों मार रहे हो )
-साला फेल हो गया.
-ई का होत है .....
-मतलब फेल ..म म म नाक कटा दिया साले ने .
ये अपने पोते की ओर देखे और कहे -चल चल बाग में चल . बाग़ में जाकर बड़े प्रेम से पूछे कि कौन चमाइन के .......
पोता कहा - नाहीं दादा ,हम फेल हो गए ...(और चीख चीख कर रोने लगा )
--अरे सारे ई फेल का होत है
--दादा स्कूल में हम पढ़त रहे न ...तो हम फेल हो गए .
--तब ...अब का होई ?
--एक साल बाद फिर परीक्षा होई तब जाके हम पास होइब (रोना शुरू ..)
-- चुप सारे ! तब का रोवत हे..कहाँ कुम्भ के मेला ऐसन १२ साल अगोरे के है ...एक साल बाद न ....फिर दे दिहे .......पागल सारे ..कुल पागल हमारे खानदान में पैदा हो गए हैं .

अजब गजब झिनकू काका के कारनामे थे .यहाँ पूरा बयान कर पाना मुश्किल है ..लेकिन हाँ जिस दिन वो इस दुनिया को छोड़ गए उस दिन पूरा गाँव रो रहा था ...शायद वो उसर की जमीन भी .जहाँ इन्होने इतिहास रचा था . चमरौटी की गलियाँ , गाँव के घरों की दालान , उबड़ खाबड़ रस्ते ..सभी ने शोक मनाया था .


आज भी स्कूल वाले पकड़ी के पेड़ के नीचे बैठे कुछ बचे बुजुर्ग झिनकू काका को याद कर लिया करते हैं ..........

फिर चले आये मुंह उठाये ..........

 

    काफी दिनों की अनुपस्थिति के बाद फिर ब्लॉग की गलियों में झांकने का मन कर रहा है .


दो तीन जगह तो झाँक भी लिया . काफी बदलाव आ गया है .....


    कई जगह "आंधी" आई ....बंदरों ने करामात दिखाई .... किसी ने मुंह की खाई ...और कुछ ने खोपडी खाई .

वैसे खोपड़ी खाने का चलन बहुत पुराना है
  मैं हूँ न !!...  :)

लेकिन काफी वीर भरे पड़े हैं ...जो मुझसे कई गुना असर डालते हैं खोपड़ी पर ...


खैर इसे छोड़ते हैं ...और अब हम लगते हैं अपने काम पर ...

भई  !  कई खोपड़ी खानी बाकी है  ......आप की भी खा सकते हैं ..अगर हो तो !!