Wednesday 14 May 2008

फोकट के शेर ...न मंहगे न सस्ते ...

                   1

ऐ मरीज-ए-इश्क ये जुर्रत कहाँ से आ गयी
अब और रूठ जाने की आदत कहाँ से आ गयी
कल तक तो कहता था बिस्तर से उठा जाता नहीं
उठ गया इस दुनिया से,ये ताकत कहाँ से आ गयी 

                     2

हर जज्बात को जुबाँ नहीं मिलती
हर आरजू को दुआ नहीं मिलती 
मुस्कान बनाए रखोगे तो दुनिया है साथ
आंसुओं को तो आँखों में जगह नहीं मिलती

ये अवकाश के दौरान ओवर टाइम है ! और ये मेरे अजीज दोस्त अंकित के शब्द हैं .पता नहीं खुद के हैं कि झटके हुए लेकिन जो है सामने है ....उनकी जिद ने ओवर टाइम करा दिया ...:)

नोट - अगर रचना पसंद आये तो उनको साधुवाद देना न भूलें ....बेचारे नए हैं .अभी दूसरे के सिर पर चढ़ कर नाच रहे हैं ...:)

Monday 12 May 2008

अवकाश सूचना !!!

                 confused

     सर्व साधारण को सूचित किया जाता है कि मेरी परीक्षा की तिथियाँ नजदीक आ चुकी हैं , इसके मद्देनज़र मुझे कुछ दिनों के लिए ब्लॉग समूह से इस्तीफा देना पड़ रहा है . आशा है कि बाकी सदस्य मेरी गैर मौजूदगी में ज्यादा उथल पुथल नही मचाएंगे . ख़ास रूप से समीर जी का ध्यान रखेंगे क्योंकि उन्हें पकाऊ रचनाएं पढ़ने की आदत हो चुकी है ,उनकी यह आदत आप सभी बरकरार रखेंगे . वापस आते ही मैं अपना मोर्चा संभाल लूंगा तब तक आप सभी संभाले रहिये .ही ही ही .


      अवकाश समाप्त होते ही आप सभी को सूचना भेज दी जायेगी  ..तब तक इंतजार करिये ...हें हें हें ...


   अक्सर इसी भाषा शैली में सूचनाएं दी जाती रही हैं . मैंने भी कोशिश की ..एक अवकाश सूचना देने की . सोचता हूँ कोशिश पसंद आई होगी .ही ही ही


       और ये "ही ही ही " शब्दांश , बांकेलाल कामिक के लेखन शैली से प्रेरित है ..ही ही ही .


साथ ही योग बाबा की ,हंसते रहने की सलाह से भी ...:)


         चलता हूँ ...आशीर्वाद दीजिये ..ताकि परीक्षाएं अच्छी हों .....ही ही ही

Sunday 11 May 2008

पानी की एक बूँद !

  PA244190 Hellhole Trailhead

  चिलचिलाती धूप
  दूर तलक झिलमिलाते
  सूखे पेड़
  और फैली वीरानियां 


  सूखे तिनके भी
  तड़प उठते हैं
  कड़कते हुए
  इस झुलसती लू से 

  कटीली झाड़ियों से
  निहारता गिरगिट
  सिर को ऊपर नीचे
  करते हुए


  गोबर के बीच
  छिपा गुबरैला
  मल की गोलाइयां
  बना रहा है

  एक भटका पंक्षी
  तलाश रहा है
  हरे पत्तों की
  छाँव  

  palo santo tree

  इसी दौरान मेरा
  हलक सूख जाता है
  और
  मचल उठता है


  पानी की
  एक बूँद के लिए !

Saturday 10 May 2008

एक और चमत्कारिक घटना !!!

                                     images


        दुनिया अजीब है .यहाँ रहने वाले अजीब हैं , मेरी तरह फालतू बातों को तवज्जो देने वाले भी अजीब हैं . और इन अजीबोगरीब लोगों के बीच कोई अजीबोगरीब घटना घट जाए तो उसे इन अजीब लोगों की भाषा में चमत्कार कहा जाता है .


      एक बार सुना था कि आजमगढ़ के एक गाँव में एक भैस ने नरसिंह रुपी बच्चे को जन्म दिया जिसका सिर आदमी जैसा था बाकी शरीर भैस का . मेरी बड़ी इच्छा हुई कि जाकर देख लें लेकिन उम्र बहुत छोटी थी और मेरे बाप बहुत बड़े थे ...हाव भाव के कड़े थे  . सो इच्छा अधूरी रह गयी .


    इसके बाद रह रह कर ऐसी घटनाएँ सुनने को मिलती रही . लेकिन देखने को नहीं . आज जब अखबार का एक टुकड़ा उठाया . जो पढ़ा ,जो देखा उससे लगा कि रहस्यों की कोई निश्चित सीमा नहीं है . पेश है उस अखबार के टुकड़े का हिस्सा ....


          काश स्कैनर होता तो लाइव दिखा सकता ! चित्र भी , खबर भी .


"             पैदा होते ही थाम लिया आसन               "


     भरवारी , कौशाम्बी : मंगलवार का दिन करारी के भैला गाँव के लोगों के लिए काफी चमत्कारिक रहा . यहाँ एक घर में दोपहर को एक अजीबो - गरीब बच्ची ने जन्म लिया . बच्ची की खासियत यह थी कि वह पैदा होते ही ऊँचे आसन पर पालथी मरने के बाद हाथ जोड़ कर बैठ गयी . उसे यूँ बैठा देख लोगों ने दांतों तले उंगलियाँ दबा ली . खबर फैलते ही इलाके के लोगों का वहाँ तांता लग गया .पल भर में ही पूजा पाठ और चढावा चढ़ने लगा .लेकिन १५ मिनट के भीतर  मौत के बाद भी वह उसी तरह बैठी रही और लोग भजन कीर्तन करते रहे . यह कार्यक्रम बुद्धवार की दोपहर उसके अन्तिम संस्कार के बाद थम गया .संतोष कुमार वर्मा की पत्नी चम्पा देवी ने दोपहर लगभग दो बजे एक अद्भुत बच्ची को जन्म दिया .


            बताते हैं कि पैदाइश के समय बच्ची ज़रा भी नहीं रोई . पैदा होते ही वह उठ बैठी और अपने पैरों पर चलते हुए सामने बने एक आसन पर बैठ गयी . यह सब देख परिजन हतप्रभ रह गए . फौरन आसन के पास लाल रंग का एक कपडा बिछाया गया . तब वह बच्ची इसके ऊपर पालथी मारकर बैठ गयी . खबर फैलते ही इलाके के लोग वहाँ पहुंचे . उसे इस तरह बैठा देख लोग हैरतजदा थे . जल्द ही वहाँ पूजन अर्चन और भजन कीर्तन शुरू हो गया . लोगों ने मन्नतें मांगनी शुरू कर दी . लेकिन १० मिनट बाद ही बच्ची परलोक सिधार गयी . इसके बाद लोगों ने उसे नहलाया और आसन के पास लिटा दिया . लेकिन चमत्कारिक रूप से वह फिर पालथी मारकर हाथ जोड़े बैठ गयी .

 


    उसके हाथ पैर में भी कहीं कडापन नहीं था .पीठ की तरफ बाल की चोटी लटक रही थी . प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि पहले रोज़ उसके चहरे से बचपना झलक रहा था . जबकि दूसरे दिन यही बच्ची उम्रदराज़ लगने लगी. यही नहीं ,एक और अजूबा हुआ . बताते हैं कि जन्म के वक्त इसकी ऊंचाई डेढ़ फिट थी ,लेकिन दूसरे रोज़ यह घटकर एक फिट हो गयी . लोगों ने इसे प्राकृतिक करिश्मा मानकर उस पर फल-फूल और प्रसाद चढाये . घर वालों का कहना है कि इस देवी स्वरूप बच्ची ने जन्म लेकर उन्हें धन्य कर दिया . गौरतलब है कि चम्पा देवी का नसबंदी आपरेशन दो साल पहले मंझान पुर पीएचसी में हुआ था . इसके बावजूद उसने अपनी छठवीं संतान को जन्म दिया ."  --- दैनिक जागरण

 

       कई दिन बाद अखबार का पन्ना सामने आ गया था . खाते वक्त नज़र इस खबर पर पड़ी थी . ससुरे अखबार वालों की भाषा भी ऐसी होती है कि एक बात को पचास बार दोहराएँगे अलग अलग अंदाज में . भरोसा नहीं होता तो एक बार फिर पढ़ लीजिये . कभी १० मिनट में बच्ची को मार दिए तो कभी बच्ची को मरने में १५ मिनट का समय लगा . ये जो आकड़ों का उलट गणित  है इसे मैं नहीं झेल पाता . आखिर विज्ञान का छात्र हूँ एकुरेसी का ध्यान रखना पड़ता है .

    किसिम किसिम की अलौकिक घटनाएं केवल भारतवर्ष में घटने के लिए पेटेंट हैं , ऐसा लगता है . और जो घटना घटती भी है उसकी समयसीमा केवल कुछ दिन है इसके बाद लोग उसे भूल जाते हैं . ऐसी घटनाओं के दौरान माला फूल लेकर दौड़ना भारतीयों की ख़ास रूचि रहीं है , ससुरे खुद तो भूखे मरते हैं (जार्ज बुश पेटू कहते हैं ) और नए पैदा हुए बच्चे को अगरबत्ती का धुआं सुंघा सुंघा कर मार डालते हैं . माला फूल की कब्र बना डालते हैं , मन्नतें माँगते हैं (भिखारी साले ).....


    खैर घटना जब घट गयी तो क्या गला फाड़ना ,सत्यता साबित करने के लिए  अखबार में चित्र भी छाप दिया है .

 


   लेकिन एक बात सोचनीय है कि जब भी कोई ऐसा तथाकथित महापुरुष या देवी जन्म लेते हैं तो १० - १५ मिनट बाद दांत काहे चियार देते हैं ??? अरे भाई काहे का महापुरुष जो कलयुग का कुछ पल भी नहीं झेल सका  !!!?

 


        खैर घटना घट ही गई , अब भारतीयों को दूसरी अजीबोगरीब घटना घटने का इन्तजार है , और मन्नते मांगने वाले अगरबत्ती लिए खड़े होंगे इसी इंतज़ार में ........

Friday 9 May 2008

एकाग्रता भंग होने से ब्लाग की दुर्दशा !!

      काफी उत्साहजनक मूड था , कुछ नए विषय पर लिखने का . लेकिन एक हल्की सी खलल ने सब बंटाधार कर दिया .


    विषय था भूतों पर कुछ रहस्यमई बाते उजागर करने का . लेकिन शायद भूतों को यह बात गंवारा नहीं हुई कि कोई लम्पट छाप हमारे बारे में लोगों को समझाए .


    आखिर वही हुआ . जो होना था


  अक्सर आधी रात को मैं अपने विचार ब्लाग में लपेटकर आपको सुपुर्द करता हूँ  .ताकि कोई बाधा इसमे मिर्च न झोंक दे और आपकी आँखें इसे देखकर जल न उठें .


     बहुत विचार करने के बाद मैंने भूतों से पंगा लेने का रिस्क उठाया था . लेकिन ......


  आधी रात को जब इन अदृश्य चूतियों के बारे में जब लिखना शुरू किया तो एक महापुरुष अपनी तन्द्रा मिटाने मेरे सामने प्रगट हुए .

        बोले यार नींद नहीं आ रही थी तो सोचा आपके यहाँ चलूँ ....ओह तो आप कुछ नया लिख रहे हैं ...अरे भूतों के बारे में ......वाह शुरुआत तो अच्छी है  ....ज़रा गाने लगा दीजिये ...शकीरा के ....आप लिखिए ...... मैं बस देखूंगा ....नहीं ये लाइन ठीक नहीं है .......मेरी भी एक कहानी जोड़ दीजिये ......ऐसा ऐसा .....हाँ सही है......नहीं ये .......हाँ अब ठीक है ............


    जब मैंने लेखन कार्य पूरा किया तो मुस्कुराए  और कहे अब चलता हूँ नींद आ रही है .


और मैंने अपनी इस अनोखी कृति पर नज़र दौड़ाई तो नज़र दौड़ते दौड़ते थक गयी लेकिन कृति समाप्त नहीं हुई ...बीच बीच में झपकी भी आ जाती ..... मैंने सोचा कि ससुरे को नींद नहीं आ रही थी तो मेरी खोपडी पे मूत के चला गया . अब सब डीलीट करना होगा . इतने  में फिर आकर  बोले  पोस्ट किया ...ज़रा देंखूं तो .....ज़रा पेशाब लग गयी थी ......अरे अभी तक पोस्ट नहीं किया ......कीजिए ....जल्दी कीजिए .....


     मैंने किया . और जवाब मिला हाँ अब सही है ....अब चलता हूँ .....मैं मन ही मन ससुरे को गालियों से नवाज़ रहा था लेकिन वह अपनी मुस्कान से मुझे लज्जित कर रहा था .


   मैंने हारकर इस मिलीजुली कोशिश से रचित रचना को आपके बीच रख दिया और आपने वही टिप्पणियाँ की जिसकी मुझे आशा थी .


    आखिरकार भूतों ने सफलता पाई .....मेरी एकाग्रता भंग कर . और चिढ़ाते हुए कहा भी होगा .. कि हे मूर्ख ! दुबारा हम लोगों की दुनिया को दूसरे के बीच उजागर किया तो तेरी खैर नहीं...वैसे अब कोई तेरी बात सुनेगा भी नहीं ...ही ही ही ....

     और उस अनोखी रात के बाद कुछ नया लिखने की बात भी नहीं सोच पाया . इतने दिनों बाद आज मौका मिला तो सोचा उसी दिन की एक झलक पेश की जाए .


     लेखन कार्य में एकाग्रता कितनी महत्वपूर्ण है इसका एहसास है मुझे . शायद आपको भी हो .

  आखिर दिमाग चाटू ब्लाग लिखकर दूसरे का कीमती समय क्यों बर्बाद किया जाय  !!!

Friday 2 May 2008

भूतों ने कभी खेतों में हल चलाया था ....

                  Common-ghost

     काफी रोचक लग रहा होगा कि भूतों ने हल चलाया ! अब भूतों को कसरत करने की सूझी तो इसमे रोचक लगने वाली क्या बात !? यहाँ तो किसान हल चला कर और उसके हीरा- मोती हल खींच कर थक चुके हैं . चाहे जो भी हो ,बात है तो आप भी सुन लीजिये !


        "बहुत साल पहले की बात है तब लोगों के पास खेती करना ही इकलौता जरिया था जीविकोपार्जन करने का ." ये हमारे नहीं हमारे रजई नाना के शब्द थे , अभी कुछ साल पहले बेचारे स्वर्ग सिधार गए .गांजा पीना उनका खानदानी शौक था , रात में ज्यादातर यहाँ वहाँ  घूमते थे , कई सांप बिच्छू उन्हें काटे लेकिन उनका बाल भी बांका नहीं हुआ लेकिन जो उन्हें काटे उनका बाल बांका भी हुआ और चील कौवों द्वारा फाके भी गए . वे इंसान जैसे भी हो लेकिन  एक सच्चे इंसान थे , मन में करूणा का वास था . शायद ही कभी उनकी लड़ाई हुई हो किसी इंसान से , अलबत्ता सियारों और कुत्तों से रोज ही उनकी नोक झोंक होती थी .


       कई बीघे खेत के मालिक थे लेकिन कभी घर में रात नहीं गुजारी . रोज रात में अपने खेतों  की रखवाली करते . जाड़ा , गर्मी ,बरसात. सारे मौसम की राते ,खेत में लगी झोपडी में ही गुजारी . रात रात भर सियारों और लीलगायों से "चोर - पुलिस" का खेल खेलते .


       गर्मी में जब हम लोग(मैं और दीदी ) नानी के यहाँ आते , तो इनकी दिनचर्या काफी बदल जाती . काफी लगाव था हम लोगों से . हम लोगों के लिए पहले से ही खरबूज और तरबूज बो  देते और उनकी रखवाली में सियारों से दो दो हाथ भी कर लेते .


     हमारे सगे नाना , रजई नाना के बारे में कहते थे कि ससुरा बड़ा जानकार है लेकिन पागल बनता है सबके  सामने .


    एक दिन रात में हम लोग खा पीकर नानी की कहानी सुन रहे थे तभी इनकी लाठी की आवाज सुनाई दी . अँधेरा काफी घना था ...आजकल वैसे अँधेरे नहीं होते , काफी गाढा स्याह अँधेरा होता था , अमावस को . बिजली हर गाँव में फ़ैल चुकी है आजकल . पहले तो लोग दूर जलते दिए को देखकर ही रास्ते का अनुमान लगाते थे कि गाँव का रास्ता किधर से है .

    लाठी की आवाज सुनकर हम लोग बैठ गए और मैं चिल्लाता गया और उनकी लाठी छीन ली.


  "नाना नमकीन दो , नाना नमकीन दो ..नहीं तो लाठी नहीं दूंगा " 


    उनकी लाठी में तरह तरह के धातु लगे थे, कहीं तांबा तो कहीं पीतल . काफी सजी धजी लाठी थी उनकी .


  " अरे हमार नाती ! तू लोगन त हमार जान बाटा . इ ला तोहार नमकीन "


कभी भी वह नमकीन लाना नहीं भूलते थे और वैसी नमकीन आजतक कभी खाई भी नहीं .


   उस दिन मैंने पूछ लिया था कि नाना आपको भूतों से डर नहीं लगता ,रात में क्यों घूमते हैं !?


  मेरी बात सुनते ही बड़ी जोर से हँसे थे उस दिन . नानी ने बीच में बोलते हुए कहा था कि बेटा  इनके यार दोस्त भूत ही तो हैं .


      " हमार नाती भूतन के बारे में जानै चाहत है . ठीक है , कल दुपहरिया के आइब त बताइब ." ..." अभी रात है डेराय जैबा ....".


         नानी ने उस रात बताया था कि रजई नाना के पूर्वज गुप्तज्ञान के बड़े जानकार थे , और पीढ़ी दर पीढ़ी ये ज्ञान रजई नाना तक आ पहुंचा है .


     मुझे बड़ी जिज्ञासा हुई कि कैसा गुप्तज्ञान ?!


  अगले दिन दोपहर में हम लोग आम खा रहे थे .दूर से मस्त चाल में रजई नाना आते दिखाई दिए . उनकी चाल में भी एक अजीब सा आकर्षण था  . बागीचे में प्रवेश करते बोले -- का नाती , आम खा खा के पेट भर लेबा त हमार इ खरबूज के खाई ?? और अपने गमछे से बड़ा सा खरबूज निकाल कर दे दिए .


   उस दिन हम लोगों को भूतों के बारे में उन्होने विस्तार से बताया . जिसका सारांश इस प्रकार है ....


    " पहले के जमाने में खेती बहुत मेहनत से होती थी , आजकल की तरह ट्यूबवेल नहीं थे ट्रैक्टर नहीं था . एक बार ऐसा हुआ कि हम लोग रात में खेत जोतने की बात सोचे क्योंकि धूप बहुत तेज होती थी दोपहर में और उस दिन  उजियारी रात थी .तब मैं जवान था  मैं हल लेकर अपने खेत में गया और भैया बैल खोलकर पीछे पीछे आ रहे थे . खेत में आ जाने के बाद भैया को ख़याल आया कि सुरती की चुनौटी घर भूल आये हैं . बिना सुरती खाए काम का जोश ही नहीं आता था . भैया घर चले गए , और मैं बैलों को तैयार करने लगा . तभी भैया आ गए , मैंने पूछा कि घर नहीं गए , सुरती नहीं ले आये तो वे बोले कि मन नहीं किया जाने का . और बैलों को लेकर खेत में घुस गए और रात भर जोतते रहे ...मैंने बार बार आग्रह किया कि भैया सुस्ता लो लेकिन वे कहे अरे नहीं .तुम्हें नींद आ रही हो तो घर जाओ .... मैंने कहा ठीक है और घर लौट आया , यहाँ आकर देखा तो भैया सोये पड़े हैं . मैं चौंका कि फिर वहाँ कौन था , भैया को जगाया . तो वे बोले कि अरे बैलों को वहीं छोड़ आया और कहे कि यार ज़रा सा लेट गया नींद आ गयी थी . मैंने उनसे आप बीती बताई और खेतों की तरफ दौड़े , जाकर देखा तो सारे खेत जुत गए थे और बैल खुले थे और घास चर रहे थे . तब से हम लोग कभी रात में खेत में नहीं घुसे ."

भूत ऐसे होते हैं भूत वैसे होते है ...काफी बातें बताई उन्होने ...


    हमने उनसे पूछा कि बस इतना ही , भूत क्या होता है पता ही नहीं चला  . आप कहानी सुना रहे हैं न !


    वे मौन रहे . शायद बच्चे के सामने उनको ऐसी बाते नहीं करनी चाहिए थी . मैंने पूछा कि नाना ये गुप्तज्ञान क्या है .

तो वे चिढे हुए बोले - बच्चा ! तुम लोगों को शहर में रहना है , जानकर क्या करोगे ? ये कोई किताब नहीं है कि पढ़ लिया और सीख गए . एक बोझ होता है जिसे दूसरे को एक न एक दिन सौपना पड़ता है .  अचानक उठे और चल दिए .


    फिर से उनसे कभी भूतों के बारे में पूछने की हिम्मत नहीं हुई . हाँ नानी से कभी कभी उनके बारे में सुन लिया करते .


  बचपन से आज तक कई बातें सुनी भूतों के बारे में कि .....


    "भूत ने रात में ,खेत में आकर बोझ उठवाया " " नहर से पानी खेतो में डाला (उदहा ) जा रहा था तो एक अनजान आदमी आकर रात भर लगातार पानी डालता रहा " और सुबह गायब हो गया . " एक आदमी ने भूत का बाल काट कर रख लिया और उसे नौकर बनाया , और उस भूत ने कुठिला में अपने बाल पाया और लेकर भाग गया ".


कई तरह की बाते , जितने मुंह उतनी बाते ......


    भूत तो भूत कभी कभी गाँव के देवता लोगों की भी बाते छिड़ जाती कि एक भैसा खेत में घूम रहा था मैंने मारा तो उसने दौड़ लिया और पीछे से गायब होकर मेरे सामने आ गया . तभी मैंने डीह बाबा (गाँव के कुलदेवता )को पुकारा तो एक और भैसा आया और दोनों में मार होने लगी ,एक भाग गया एक अदृश्य हो गया .


    हर एक तरह की बाते सुनने को मिली ,कभी कभी चुडैलों की बातें   कि छन छन करती  आती हैं , और गू (मल ) पोत कर भाग जाती हैं . जब भी नया बच्चा पैदा होते तो चुडैले आती इसलिए बच्चे को लालर झालर लोहा ताबीज पहना दिया जाता .

भूतों की इतनी कहानियां है कि अगर लिखना शुरू भी कर दिया जाए तो रामचरितमानस से मोटी काव्यरचना निर्मित हो जाए .


   भूतों के बाप होते हैं जिन्न , अक्सर सुना है कि जिन्न मनुष्य को बना भी देते हैं और तबाह भी कर देते हैं . अभी जल्द ही एक घटना सामने आई है कि एक आदमी ने जिन्न के निवास स्थान पर पान खाकर थूक दिया और जिन्न महाशय ने इनके शरीर को निवास स्थान बना लिया  और उस आदमी ने सारे दांत अपने ही हाथों तोड़ कर खा गया , दो बार छत से कूदा और सारा शरीर तोड़ लिया लेकिन मरा नहीं .ओझा लोग आते हैं तो जिन्न की आवाज सुनने को मिल जाती है , ये आदमी और कोई नहीं मेरा दूधवाला है .

 

     अब आती है विश्वास करने की बात कि आखिर ये सब है क्या ?! यहाँ तो लोग भगवान् पर विश्वास करते नहीं भूतों पर कौन विश्वास करेगा . विश्वास करने के बीच में हमारा विज्ञान रोड़ा बन कर खड़ा है जो अभी अपनी शैशव अवस्था में है .


    ज़रा किसी पढेलिखे नौजवान से पूछ कर देखिये कि भाई आप भूतो पर विश्वास करते हैं उत्तर देने के बजाय आपके ऊपर चढ़ बैठेगा और कहेगा कि साले भगवान् पर तो विश्वास करता नहीं  ये भूत क्या है बे ! दुनिया २१ वीं शताब्दी में पहुँच गयी है और तू हजार साल पीछे की बात करता है . गंवार !


        विज्ञान की धुन में इतने अंधे होते जा रहे हैं कि सामने पड़ी चीज भी नहीं दिख रही है , डिस्कवरी चैनल भी रात में घोस्ट हंटर दिखाता है , और लोगों की जागरूकता बढ़ा कर दो तीन वैज्ञानिक औजार दिखाता है , टेढ़े मेढे तस्वीर को भूत की तस्वीर घोषित करता है , कि यही है जो आपके घर में रह कर आपको तंग किया करता है .

   अभी एक देश के राष्ट्रपति को भूतों से तंग आकर राष्ट्रपति भवन छोड़ना पड़ा था . मतलब ये कि भूत विश्वव्यापी हैं और हम लोग उन पर ध्यान ही नहीं देते .


     वैज्ञानिक भूत भगाऊ संस्थान ये कहती है कि जब इंसान ज्यादा सोचता है ,  कल्पनाएँ करता है  , डरता है  . इससे दिमाग एक प्रतिकृति बना कर विजुअली दिखाता है और उसी को लोग भूत मानते हैं , यह एक रूप से मानसिक रोग है .... सब दिमाग का खेल है .


       क्या बात है , भारत में ज्यादातर मानसिक रोगी भरे हैं , ये जानकर बहुत ख़ुशी हुई थी मुझे . सारे मनोरोगियों के साथ हेल्पिंग नेचर के भूत जुडे थे . एक ही कहानी सारे मनोरोगी सोचते हैं .

       अभी अखबार में ये लेख निकला था कि भूत महज एक कल्पना हैं आपकी सोच का प्रतिरूप है आपका डर है वास्तव में भूत जैसी कोई चीज नहीं होती बस एक वहम है .
     मैं सोचता हूँ कि वहम भी क्या चीज है ससुरी खेत जोत देती है पानी भर देती है ..........


     चैनलों की टी आर पी बढ़ा देती है ..... कमाई के लिए वहम बहुत उपयोगी है भाई .

   एक फिल्म भी आ गयी थी " भूलभुलैया " देखी कि नहीं आपने .... देखिये आपका  भूतों पर से विश्वास उठ जायेगा , मात्र तीन घंटे लगेंगे बस .

        ये न्यूज वाले भी दलबदलू टाइप के है  अभी कहीं किसी भूत की खबर मिल जाए , तो दिन रात चिन्घाडेंगे कि भूत देखा गया भूत का प्रकोप पूरे गाँव में फैला है , तब ये साले लोगों को ये नहीं समझायेंगे कि भूत वहम है आपका डर है आप विश्वास न करें .... लेकिन नहीं देश विदेश में डंका बजा देंगे कि भारत के एक गाँव में भूत मिला .


    अभी सन् २००३ में मुंह नोचवा  का प्रकोप पूरे उत्तर भारत में फैला था , हर रोज टीवी पर गला फाड़ फाड़ कर चिल्लाए कि मुंह नोचवा ...मुंह नोचवा.....मुंह नोचवा! . साथ में लोग भी यही राग अलाप रहे थे .और हथियारों से लैस होकर दर दर की ख़ाक छानते , मुंह नोचवा के बहाने कई जगह लूट भी हो गयी थी , औरतों के जेवर चहरे से नोच लिए गए और नाम लगा मुंह नोचवा का ...

     कई बन्दर बेचारे मारे गए उस दौरान , कई सियारों कई भालुओं को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था .


      जिला मिर्जापुर के डी एम्  साहब ने अपनी आँखों से साक्षात देखा था मुंह नोचवा को ..बोले कि एक यन्त्र है और हमारे देश की शोध शाला ने मुंह नोचवा के आतंक समाप्ति के बाद घोषणा की कि ये ज्वालामुखी की राख थी जो रात में चमकती थी .......


मतलब ये कि अखबार में छप रही घायल चेहरों के पीछे ज्वालामुखी की राख थी ...बहुत खूब .
        ये तो दशा है हमारे देश की !  

 

अब ऐसे देश में, जिसे चमत्कारों का देश कहा जाता है जहाँ गणेश जी दूध पी जाते हैं , वहाँ एक छोटी सी मुंह नोचवा की घटना हो जाए तो कौन सी आफत आ गयी ,हाँ अगर  मुंह नोचवा संसद भवन पर हमला किया होता तो कायदे से विचार होता कि आखिर ये क्या बला है  .

      अब रही भूत की बात तो वो कभी दिखता नहीं , उसके बारे में सोचना तो मूर्खता ही है . जब दिखेगा तो सोचेंगे ....जनता जाए तांत्रिकों के पास और अपनी बहू बेटियों की इज्जत लुट्वाये . हमारा क्या जाता है .........

 

     असल में पहले के लोग कुछ निराली विद्या जानते थे एकाध लोग आज भी हैं जो इमानदार है . बाकी सब ढोंगी हैं आजकल के नेताओं की तरह .....


      परिवर्तन में सब बदल गया . शब्दों के अर्थ बदल गए , नाम बदल गए .१९४९ में नेता शब्द कुछ मायने रखता था और आज हर बड़ा बूढा नेताओं पर बड़ा बड़ा लेख लिखता है कि साले सब चोर हैं असली आतंक वादी हैं , लेकिन एकाध नेता हैं जो अच्छी छवि के हैं .


     आजकल के नेताओं के चलते लोग वोट देने में कम रुचि लेने लगे हैं और ठीक इसी प्रकार ढोंगी तांत्रिको के चलते लोग मान चुके है कि साला भूत भूत कह के ये हम लोगो को डराता है . भूत नहीं होते .


          आजकल  भूत दिखते नहीं , चुडैले भी गायब हैं आखिर क्यों न हों , कल के भूत खेत जोत रहे थे आज के भूत इंसान में घुस कर देश जोत रहे हैं , चुडैले कम कपड़े पहन कर यहाँ वहाँ शांति से विचरण कर रही हैं . एक sms भेजा था हमारे एक मित्र ने .....
  G-> Ghost
  I -> In
  R-> Real
  L->  Life  
so avoid girls !!!.
From..
" MEN AWARENESS ASSOCIATION "
"save men,save world".

    आजकल ये हालत हो गयी है भूतों की .कमेन्ट बाजी शुरू हो गयी है भूतों के साथ .


चाहे जो भी हो मैं सोचता हूँ कि हर घर ,हर गाँव ,हर जिले ,हर देश में ये भूत रुपी अनजान शख्स  घूम रहा है .

  कई प्रश्न आज भी जेहन में उमड़ते हैं कि पहले के भूतों को इंसान से इतनी हमदर्दी क्यों होती थी .और आज सर पर बैठ गए हैं. क्यों ?.


        भूतों से सब परिचित होते हैं , बस कोई देखा होता है कोई महसूस किया होता है और कोई सुना होता है . लेकिन कोई इस पर विचार नहीं करता कि आखिर रहस्य क्या है , शोधकर्ता लैब में बैठ कर इंसान के दिमाग पर शोध करेंगे .

भूतों के पास जाने में तो उनकी भी फटती है .


   सही रिजल्ट कैसे दे सकते हैं भला ....


   खैर ये सब बातें वास्तविकता से परे हैं जो कभी कभी वास्तविक दुनिया में दिख जाती हैं .


  इंसान खुद को तो जान नहीं पाता  दुनिया को क्या जानेगा ....चमत्कार तो होते ही रहते हैं .

 

  शिक्षा के साथ , कुछ अलौकिक ज्ञान की भी आवश्यकता पड़ सकती है  ..क्या पता भविष्य में क्या होने वाला है , पहले के बुजुर्ग लोग अपने ज्ञान अपने वारिसों को देकर स्वर्ग सिधार जाते थे लेकिन आज के बुजुर्ग केवल यही ज्ञान दे सकते हैं कि लोगों पर अपनी धाक कैसे जमाएं अपनी बात सुनवाने का मेथड क्या है, सफलता कैसे पायें  ,नाम रोशन कैसे करवाएं , पैसे ज्यादा कैसे कमाए .........और अध्यात्मिक और अलौकिक ज्ञान जाए तेल लेने .

   ज्ञानी लोग आये और अपने ज्ञान दिए और चले गए , भूत आये खेत जोते और गए और अब विज्ञान कहता है कि परग्रही आयेंगे .देखें वे क्या जोत के जाते हैं ...........

Thursday 1 May 2008

कंडोम की दास्ताँ

                    condom

    कंडोम, आज से तकरीबन ५-६ साल पहले इसका नाम जबान पर कोई सरेआम नहीं लेता था . लेकिन आजकल जब भी विविध भारती लगाओ , समाचार चैनल लगाओ ...तब एक लम्बी सी सीटी के उपरांत ये वाक्य सुनने को मिलता है  , "कंडोम एक फायदे अनेक " . " एड्स से सुरक्षा के लिए अपनाएं कंडोम ". " साथी से वफादारी इसी में है आपकी समझदारी ". जैसे एक से एक वाक्य हमारे कानों को सौप दिए जाते हैं.


      बगल में एक फेमिली वाले पांडे साहब रहते हैं , समाचार सुनने के बहुत शौकीन हैं .वो भी अच्छी खासी आवाज में , मैं तो मुफ्त में समाचार सुन लेता हूँ . चूँकि घर में छोटे छोटे बाल बच्चे हैं , इसलिए ज्यों ही विज्ञापन वाली सीटी बजती है रेडियों धीमे कर लेते हैं . हालांकि पहले ऐसा नहीं करते थे परन्तु उनकी बहू गरम मिजाज की है , एक दिन धमका दिया अच्छे से  , कि  रेडियों कम आवाज में सुना कीजिए और ख़ास रूप से उसके विज्ञापन . पांडे जी समझ गए कि बहू क्या कहना चाहती है .

 

     खैर विज्ञापनों से क्या शर्माना ? यहाँ तो शर्म हया सब बेच के खा गए हैं लोग . अभी कल की बात ले लीजिये . हमारे एक मित्र मुझे अपने घर भोज के लिए आमंत्रित करने आये और मैंने   स्वीकारते हुए उनके साथ चल दिया . वे मुझे अपने घर ले जाने के लिए संकरी गलियों का इस्तेमाल कर रहे थे , चलते समय मेरी नज़र अक्सर नीचे ही होती है ताकि पैर गोबर जैसी चीज पर न पड़े , वैसे भी इलाहबाद की गलियाँ (ख़ास रूप से अल्लापुर की गलियाँ ) गोबर से पटी न रहे तो लगता ही नहीं कि हम लोग अपने क्षेत्र में हैं . गली में घुसते ही दो तीन कंडोम छितराए पड़े थे .मैंने सोचा कि क्या करते हैं लोग कम से कम सही जगह तो फेके .
अभी यही सोच ही रहा था कि ....


    गली के बीचों बीच पहुँचने पर एक कंडोम लहराता हुआ आगे चल रहे ५० वर्षीय बुजुर्ग के ऊपर आ टपका . बुजुर्ग जी ने पहले कायदे से गौर फरमाया , फिर तैश में आकर बोले ... मादर ...... ( ऊपर खुली खिड़की की तरफ मुंह करके )  . खिड़की अचानक बंद हो गयी .


    और अपने स्वर्ण शब्द एक के बाद एक निकालने लगे . सारी गली सुनसान हो गयी . वैसे भी बुजुर्गों को अपनी बाते सुनाने के लिए कोई सुनने वाले चाहिए होते हैं . उन्होने हम लोगों की तरफ मुखातिब होकर अपना भाषण शुरू किया .


  "बताइये भला !! साला कोई लाज शर्म नहीं है . राह चलते लोगों के ऊपर ये लोग फेक देंगे ?!!


"अरे बाहर निकल !!तेरी माँ का ........." (खिड़की की तरफ )


" देख रहे हो बेटा .. साले सब इस समय गुलछर्रे उड़ा रहे हैं!!"


" अरे सालों ! कोई समय होता है ... कमीनों चुप क्यों हो ..निकल बाहर . आज तेरी मैया ...." ( खिड़की की तरफ ) .


" देखो ! देखो ज़रा ( मुझसे मुखातिब होकर ) साले सब गली भर दिए हैं , देखो यहाँ वहाँ फेके हैं साले सब . राम राम !!"


" अरे जानवर भी इतना नहीं करते सालों , कुछ तो शर्म करो . करना हो तो चाहे जो करो लेकिन सालों !! ये फेकने के लिए मेरा सर ही बचा था . कुत्तों !!! निकल बाहर .. निकल साले आज तेरा जोश ठंडा किये देता हूँ ."

अब भीतर बैठा युवक क्या सोच रहा होगा ये तो भगवान् ही जाने , बाहर निकल कर सामना भी तो नहीं कर सकता . और बुजुर्ग महाशय उसकी इस कमजोरी का फायदा उठा रहे थे .

और हम लोगों को सुनाये जा रहे थे ....

" साले नीच ! अन्दर क्यों छिपा बैठा है बे , निकल बाहर ..."


" बेटा ! एक बात बताऊँ , जब से साले की शादी हुई है इस गली से आना जाना दुर्भर हो गया है , यही एक बाहर जाने का रास्ता है और साला ये .....ये ..साला....."


" अभी कल मिश्रा जी से बात हो रही थी वो कह रहे थे कि इस साले को समझाना होगा . मैंने ही उन्हें रोक दिया था कि बच्चे हैं जाने दीजिये ... अरे साला मुझे क्या पता था कि साले मुझे नहला देंगे . मिश्र जी बेचारे सुबह सुबह आकर गली साफ करते हैं ... घर परिवार वाले हैं भाई .पोते पोतियाँ स्कूल इसी रास्ते से जाते है . उन्होने बताया कि रोज अँधेरे में उठ के  ४-५ कंडोम लकड़ी से उठा के बगल के कूड़ेदान में डालते हैं . क्योंकि राह चलते सड़क पर पड़ी वस्तुओं के बारे में पूछने की आदत होती है बच्चों में . कई बार तो उनके पोतों ने उस चीज को गुब्बारा समझकर उठाना भी  चाहा था . .......

    इ साले आदमी हैं कि राक्षस !! अरे निकलता क्यों नहीं साले ...... दरवाजा तोड़ के अन्दर आऊंगा नीच !!!"

इनका हंगामा सुनकर कई लोग आये और इकठ्ठे हो गए . कोई मसखरी करता कि चाचा क्या हुआ और चाचा फिर शुरू हो जाते कि सर पे फेक दिया सालों ने ...........

मैंने सोचा कि ये सठिया गए हैं क्या !! अपनी तो अपनी ,उसकी भी इज्जत धो रहे हैं .


     खैर मेरे मित्र बोले यार ये तो होता ही रहता है ..चलो नहीं तो खाना ठंडा हो जायेगा .

आज इतनी बार इस कंडोम नामुराद का नाम सुन लिया कि खाया नहीं जा रहा था . बार बार कंडोम से पहला परिचय याद आ रहा था .


        सन् १९९१ की बात होंगी तब कंडोम का इतना नालेज किसी के पास नहीं था . मैं ५ साल का था , और उस समय नई नई चीजों के खोजने का जज्बा रहता था . कभी बालू से शिवलिंग की खोज , कभी रेलवे लाइन से  अद्भुत पत्थर की खोज . कई खोजे हुआ करती थी उस दौरान , और हमारे बीच एक नायब खोजकर्ता था , कोई नई चीज मिलते ही हम लोगों को सूचित करता .घर की खाक छानने में माहिर था जिसके घर में जाता बस ये सामन वो सामन छूता रहता .
उसके घर में कोई समान कितना भी छुपा के रख दो ,ससुरा सूंघ के निकाल लेता था , कितनी बार मार खाया इसके चलते लेकिन सुधरा नहीं .


    एक दिन हम लोग बागीचे में तितलियाँ पकड़ रहे थे , इतने में मेरे खोजकर्ता भाई कंधे पर कंडोम की लडिया लटकाए आते नज़र आये . हम लोग दौड़ कर उसके पास गए बोले यार ये क्या है , उसने खुश होते  हुए कहा था - " पता है पापा से मैंने कितनी बार गुब्बारा माँगा था लेकिन नहीं दिए आज उनके सूटकेस की तलाशी ली तो इतने ढेर सारे गुब्बारे मिले , लगता है मेरे जन्मदिन की तैयारी कर रहे हैं "

  हम लोगों ने ललचाती नज़रों से कहा था यार एक हमें भी दो न ! लेकिन वह आज का राजा था . बोला -सब बैठो , बहुत महंगा गुब्बारा है बहुत बड़ा फूलता है , कोई टच नहीं करेगा ,फूट जाता है  .


  और उस दिन तरह तरह के प्रयोग हुए थे कंडोम पर कौन कितना बड़ा फुला लेता है इस पर प्रतियोगिता हुई थी , पानी भर भर के फुलाना , बाजार के गुब्बारों में कुछ डाला होता है जिससे आवाज होती है , यही सोच बालू भर भर के फुलाते , लेकिन वे जल्द ही फूट जाते .

अभी प्रतियोगिता समाप्त भी नहीं हुई थी कि एक अंकल जी आये और डांटते हुए पूछे ये क्या हो रहा है , खोजकर्ता बोला अंकल गुब्बारे फुला रहे हैं ... मेरे हैं ( बड़ी शान से बोला ).
   अंकल कहे - सब लोग अपने अपने घर जाओ . .. जाओ .....चलो यहाँ से .


उस दिन हम लोगों को कुछ समझ में नहीं आया था कि क्यों बच्चों की हंसती खेलती दुनिया उस अंकल ने उजाड़ी .

   उसी दिन रात में सारे बड़े लोगों की सभा हुई थी कि कम से कम बच्चों के हाथ में ऐसी चीजें नहीं पदनी चाहिए , कई लोगों के घर से प्लास्टिक जलने की बू आ रही थी .

   उसी रात उस खोजकर्ता की बहुत पिटाई हुई थी कि घर का सामन बाहर ले जाते हो . बहुत चूलचाल करने लगे हो .


दूसरे दिन बड़े भैया आकर सभी को इस नई चीज के बारे में विस्तार से बताये .
तब जाकर हम सभी को उस मंहगे गुब्बारे का राज़ पता चला .

खैर , समय काफी गुजर चुका है ....

आजकल क्या हो रहा है जग जाहिर है , अर्धकुम्भ के दौरान इलाहबाद में कंडोम की बिक्री काफी बढ़ गयी थी , सबसे बड़ा बाज़ार रहा था संगम मेला क्षेत्र .


पापों का प्रायश्चित करने में ये कंडोम अपनी भागेदारी निभा रहा है . और आज कल की कंडोम कंपनिया , उत्तेजक विज्ञापन दिखासुना कर , एड्स की रोकथाम में अपनी भागीदारी निभा रही हैं .

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय , दिल्ली में भी कंडोम की जरूरत महसूस की जाने लगी है , मशीने भी स्थापित कर दी गयी हैं . सिक्का डालो कंडोम पाओ .

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   गुरुकुल काफी पीछे छूट चुका है जहाँ विद्या ग्रहण के दौरान ब्रहमचर्य का पालन जरूरी था .


ऐसा लगता है कि कुछ दिनों में इंटर कालेज में भी ऐसी मशीने लगा दी जायेंगी , आखिर शुरुआत तो यही से होती है . 


कंडोम की दास्ताँ तो शुरू हो चुकी है देखिये कब कहाँ कैसे क्या परिवर्तन आते हैं ........