काफी रोचक लग रहा होगा कि भूतों ने हल चलाया ! अब भूतों को कसरत करने की सूझी तो इसमे रोचक लगने वाली क्या बात !? यहाँ तो किसान हल चला कर और उसके हीरा- मोती हल खींच कर थक चुके हैं . चाहे जो भी हो ,बात है तो आप भी सुन लीजिये !
"बहुत साल पहले की बात है तब लोगों के पास खेती करना ही इकलौता जरिया था जीविकोपार्जन करने का ." ये हमारे नहीं हमारे रजई नाना के शब्द थे , अभी कुछ साल पहले बेचारे स्वर्ग सिधार गए .गांजा पीना उनका खानदानी शौक था , रात में ज्यादातर यहाँ वहाँ घूमते थे , कई सांप बिच्छू उन्हें काटे लेकिन उनका बाल भी बांका नहीं हुआ लेकिन जो उन्हें काटे उनका बाल बांका भी हुआ और चील कौवों द्वारा फाके भी गए . वे इंसान जैसे भी हो लेकिन एक सच्चे इंसान थे , मन में करूणा का वास था . शायद ही कभी उनकी लड़ाई हुई हो किसी इंसान से , अलबत्ता सियारों और कुत्तों से रोज ही उनकी नोक झोंक होती थी .
कई बीघे खेत के मालिक थे लेकिन कभी घर में रात नहीं गुजारी . रोज रात में अपने खेतों की रखवाली करते . जाड़ा , गर्मी ,बरसात. सारे मौसम की राते ,खेत में लगी झोपडी में ही गुजारी . रात रात भर सियारों और लीलगायों से "चोर - पुलिस" का खेल खेलते .
गर्मी में जब हम लोग(मैं और दीदी ) नानी के यहाँ आते , तो इनकी दिनचर्या काफी बदल जाती . काफी लगाव था हम लोगों से . हम लोगों के लिए पहले से ही खरबूज और तरबूज बो देते और उनकी रखवाली में सियारों से दो दो हाथ भी कर लेते .
हमारे सगे नाना , रजई नाना के बारे में कहते थे कि ससुरा बड़ा जानकार है लेकिन पागल बनता है सबके सामने .
एक दिन रात में हम लोग खा पीकर नानी की कहानी सुन रहे थे तभी इनकी लाठी की आवाज सुनाई दी . अँधेरा काफी घना था ...आजकल वैसे अँधेरे नहीं होते , काफी गाढा स्याह अँधेरा होता था , अमावस को . बिजली हर गाँव में फ़ैल चुकी है आजकल . पहले तो लोग दूर जलते दिए को देखकर ही रास्ते का अनुमान लगाते थे कि गाँव का रास्ता किधर से है .
लाठी की आवाज सुनकर हम लोग बैठ गए और मैं चिल्लाता गया और उनकी लाठी छीन ली.
"नाना नमकीन दो , नाना नमकीन दो ..नहीं तो लाठी नहीं दूंगा "
उनकी लाठी में तरह तरह के धातु लगे थे, कहीं तांबा तो कहीं पीतल . काफी सजी धजी लाठी थी उनकी .
" अरे हमार नाती ! तू लोगन त हमार जान बाटा . इ ला तोहार नमकीन "
कभी भी वह नमकीन लाना नहीं भूलते थे और वैसी नमकीन आजतक कभी खाई भी नहीं .
उस दिन मैंने पूछ लिया था कि नाना आपको भूतों से डर नहीं लगता ,रात में क्यों घूमते हैं !?
मेरी बात सुनते ही बड़ी जोर से हँसे थे उस दिन . नानी ने बीच में बोलते हुए कहा था कि बेटा इनके यार दोस्त भूत ही तो हैं .
" हमार नाती भूतन के बारे में जानै चाहत है . ठीक है , कल दुपहरिया के आइब त बताइब ." ..." अभी रात है डेराय जैबा ....".
नानी ने उस रात बताया था कि रजई नाना के पूर्वज गुप्तज्ञान के बड़े जानकार थे , और पीढ़ी दर पीढ़ी ये ज्ञान रजई नाना तक आ पहुंचा है .
मुझे बड़ी जिज्ञासा हुई कि कैसा गुप्तज्ञान ?!
अगले दिन दोपहर में हम लोग आम खा रहे थे .दूर से मस्त चाल में रजई नाना आते दिखाई दिए . उनकी चाल में भी एक अजीब सा आकर्षण था . बागीचे में प्रवेश करते बोले -- का नाती , आम खा खा के पेट भर लेबा त हमार इ खरबूज के खाई ?? और अपने गमछे से बड़ा सा खरबूज निकाल कर दे दिए .
उस दिन हम लोगों को भूतों के बारे में उन्होने विस्तार से बताया . जिसका सारांश इस प्रकार है ....
" पहले के जमाने में खेती बहुत मेहनत से होती थी , आजकल की तरह ट्यूबवेल नहीं थे ट्रैक्टर नहीं था . एक बार ऐसा हुआ कि हम लोग रात में खेत जोतने की बात सोचे क्योंकि धूप बहुत तेज होती थी दोपहर में और उस दिन उजियारी रात थी .तब मैं जवान था मैं हल लेकर अपने खेत में गया और भैया बैल खोलकर पीछे पीछे आ रहे थे . खेत में आ जाने के बाद भैया को ख़याल आया कि सुरती की चुनौटी घर भूल आये हैं . बिना सुरती खाए काम का जोश ही नहीं आता था . भैया घर चले गए , और मैं बैलों को तैयार करने लगा . तभी भैया आ गए , मैंने पूछा कि घर नहीं गए , सुरती नहीं ले आये तो वे बोले कि मन नहीं किया जाने का . और बैलों को लेकर खेत में घुस गए और रात भर जोतते रहे ...मैंने बार बार आग्रह किया कि भैया सुस्ता लो लेकिन वे कहे अरे नहीं .तुम्हें नींद आ रही हो तो घर जाओ .... मैंने कहा ठीक है और घर लौट आया , यहाँ आकर देखा तो भैया सोये पड़े हैं . मैं चौंका कि फिर वहाँ कौन था , भैया को जगाया . तो वे बोले कि अरे बैलों को वहीं छोड़ आया और कहे कि यार ज़रा सा लेट गया नींद आ गयी थी . मैंने उनसे आप बीती बताई और खेतों की तरफ दौड़े , जाकर देखा तो सारे खेत जुत गए थे और बैल खुले थे और घास चर रहे थे . तब से हम लोग कभी रात में खेत में नहीं घुसे ."
भूत ऐसे होते हैं भूत वैसे होते है ...काफी बातें बताई उन्होने ...
हमने उनसे पूछा कि बस इतना ही , भूत क्या होता है पता ही नहीं चला . आप कहानी सुना रहे हैं न !
वे मौन रहे . शायद बच्चे के सामने उनको ऐसी बाते नहीं करनी चाहिए थी . मैंने पूछा कि नाना ये गुप्तज्ञान क्या है .
तो वे चिढे हुए बोले - बच्चा ! तुम लोगों को शहर में रहना है , जानकर क्या करोगे ? ये कोई किताब नहीं है कि पढ़ लिया और सीख गए . एक बोझ होता है जिसे दूसरे को एक न एक दिन सौपना पड़ता है . अचानक उठे और चल दिए .
फिर से उनसे कभी भूतों के बारे में पूछने की हिम्मत नहीं हुई . हाँ नानी से कभी कभी उनके बारे में सुन लिया करते .
बचपन से आज तक कई बातें सुनी भूतों के बारे में कि .....
"भूत ने रात में ,खेत में आकर बोझ उठवाया " " नहर से पानी खेतो में डाला (उदहा ) जा रहा था तो एक अनजान आदमी आकर रात भर लगातार पानी डालता रहा " और सुबह गायब हो गया . " एक आदमी ने भूत का बाल काट कर रख लिया और उसे नौकर बनाया , और उस भूत ने कुठिला में अपने बाल पाया और लेकर भाग गया ".
कई तरह की बाते , जितने मुंह उतनी बाते ......
भूत तो भूत कभी कभी गाँव के देवता लोगों की भी बाते छिड़ जाती कि एक भैसा खेत में घूम रहा था मैंने मारा तो उसने दौड़ लिया और पीछे से गायब होकर मेरे सामने आ गया . तभी मैंने डीह बाबा (गाँव के कुलदेवता )को पुकारा तो एक और भैसा आया और दोनों में मार होने लगी ,एक भाग गया एक अदृश्य हो गया .
हर एक तरह की बाते सुनने को मिली ,कभी कभी चुडैलों की बातें कि छन छन करती आती हैं , और गू (मल ) पोत कर भाग जाती हैं . जब भी नया बच्चा पैदा होते तो चुडैले आती इसलिए बच्चे को लालर झालर लोहा ताबीज पहना दिया जाता .
भूतों की इतनी कहानियां है कि अगर लिखना शुरू भी कर दिया जाए तो रामचरितमानस से मोटी काव्यरचना निर्मित हो जाए .
भूतों के बाप होते हैं जिन्न , अक्सर सुना है कि जिन्न मनुष्य को बना भी देते हैं और तबाह भी कर देते हैं . अभी जल्द ही एक घटना सामने आई है कि एक आदमी ने जिन्न के निवास स्थान पर पान खाकर थूक दिया और जिन्न महाशय ने इनके शरीर को निवास स्थान बना लिया और उस आदमी ने सारे दांत अपने ही हाथों तोड़ कर खा गया , दो बार छत से कूदा और सारा शरीर तोड़ लिया लेकिन मरा नहीं .ओझा लोग आते हैं तो जिन्न की आवाज सुनने को मिल जाती है , ये आदमी और कोई नहीं मेरा दूधवाला है .
अब आती है विश्वास करने की बात कि आखिर ये सब है क्या ?! यहाँ तो लोग भगवान् पर विश्वास करते नहीं भूतों पर कौन विश्वास करेगा . विश्वास करने के बीच में हमारा विज्ञान रोड़ा बन कर खड़ा है जो अभी अपनी शैशव अवस्था में है .
ज़रा किसी पढेलिखे नौजवान से पूछ कर देखिये कि भाई आप भूतो पर विश्वास करते हैं उत्तर देने के बजाय आपके ऊपर चढ़ बैठेगा और कहेगा कि साले भगवान् पर तो विश्वास करता नहीं ये भूत क्या है बे ! दुनिया २१ वीं शताब्दी में पहुँच गयी है और तू हजार साल पीछे की बात करता है . गंवार !
विज्ञान की धुन में इतने अंधे होते जा रहे हैं कि सामने पड़ी चीज भी नहीं दिख रही है , डिस्कवरी चैनल भी रात में घोस्ट हंटर दिखाता है , और लोगों की जागरूकता बढ़ा कर दो तीन वैज्ञानिक औजार दिखाता है , टेढ़े मेढे तस्वीर को भूत की तस्वीर घोषित करता है , कि यही है जो आपके घर में रह कर आपको तंग किया करता है .
अभी एक देश के राष्ट्रपति को भूतों से तंग आकर राष्ट्रपति भवन छोड़ना पड़ा था . मतलब ये कि भूत विश्वव्यापी हैं और हम लोग उन पर ध्यान ही नहीं देते .
वैज्ञानिक भूत भगाऊ संस्थान ये कहती है कि जब इंसान ज्यादा सोचता है , कल्पनाएँ करता है , डरता है . इससे दिमाग एक प्रतिकृति बना कर विजुअली दिखाता है और उसी को लोग भूत मानते हैं , यह एक रूप से मानसिक रोग है .... सब दिमाग का खेल है .
क्या बात है , भारत में ज्यादातर मानसिक रोगी भरे हैं , ये जानकर बहुत ख़ुशी हुई थी मुझे . सारे मनोरोगियों के साथ हेल्पिंग नेचर के भूत जुडे थे . एक ही कहानी सारे मनोरोगी सोचते हैं .
अभी अखबार में ये लेख निकला था कि भूत महज एक कल्पना हैं आपकी सोच का प्रतिरूप है आपका डर है वास्तव में भूत जैसी कोई चीज नहीं होती बस एक वहम है .
मैं सोचता हूँ कि वहम भी क्या चीज है ससुरी खेत जोत देती है पानी भर देती है ..........
चैनलों की टी आर पी बढ़ा देती है ..... कमाई के लिए वहम बहुत उपयोगी है भाई .
एक फिल्म भी आ गयी थी " भूलभुलैया " देखी कि नहीं आपने .... देखिये आपका भूतों पर से विश्वास उठ जायेगा , मात्र तीन घंटे लगेंगे बस .
ये न्यूज वाले भी दलबदलू टाइप के है अभी कहीं किसी भूत की खबर मिल जाए , तो दिन रात चिन्घाडेंगे कि भूत देखा गया भूत का प्रकोप पूरे गाँव में फैला है , तब ये साले लोगों को ये नहीं समझायेंगे कि भूत वहम है आपका डर है आप विश्वास न करें .... लेकिन नहीं देश विदेश में डंका बजा देंगे कि भारत के एक गाँव में भूत मिला .
अभी सन् २००३ में मुंह नोचवा का प्रकोप पूरे उत्तर भारत में फैला था , हर रोज टीवी पर गला फाड़ फाड़ कर चिल्लाए कि मुंह नोचवा ...मुंह नोचवा.....मुंह नोचवा! . साथ में लोग भी यही राग अलाप रहे थे .और हथियारों से लैस होकर दर दर की ख़ाक छानते , मुंह नोचवा के बहाने कई जगह लूट भी हो गयी थी , औरतों के जेवर चहरे से नोच लिए गए और नाम लगा मुंह नोचवा का ...
कई बन्दर बेचारे मारे गए उस दौरान , कई सियारों कई भालुओं को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था .
जिला मिर्जापुर के डी एम् साहब ने अपनी आँखों से साक्षात देखा था मुंह नोचवा को ..बोले कि एक यन्त्र है और हमारे देश की शोध शाला ने मुंह नोचवा के आतंक समाप्ति के बाद घोषणा की कि ये ज्वालामुखी की राख थी जो रात में चमकती थी .......
मतलब ये कि अखबार में छप रही घायल चेहरों के पीछे ज्वालामुखी की राख थी ...बहुत खूब .
ये तो दशा है हमारे देश की !
अब ऐसे देश में, जिसे चमत्कारों का देश कहा जाता है जहाँ गणेश जी दूध पी जाते हैं , वहाँ एक छोटी सी मुंह नोचवा की घटना हो जाए तो कौन सी आफत आ गयी ,हाँ अगर मुंह नोचवा संसद भवन पर हमला किया होता तो कायदे से विचार होता कि आखिर ये क्या बला है .
अब रही भूत की बात तो वो कभी दिखता नहीं , उसके बारे में सोचना तो मूर्खता ही है . जब दिखेगा तो सोचेंगे ....जनता जाए तांत्रिकों के पास और अपनी बहू बेटियों की इज्जत लुट्वाये . हमारा क्या जाता है .........
असल में पहले के लोग कुछ निराली विद्या जानते थे एकाध लोग आज भी हैं जो इमानदार है . बाकी सब ढोंगी हैं आजकल के नेताओं की तरह .....
परिवर्तन में सब बदल गया . शब्दों के अर्थ बदल गए , नाम बदल गए .१९४९ में नेता शब्द कुछ मायने रखता था और आज हर बड़ा बूढा नेताओं पर बड़ा बड़ा लेख लिखता है कि साले सब चोर हैं असली आतंक वादी हैं , लेकिन एकाध नेता हैं जो अच्छी छवि के हैं .
आजकल के नेताओं के चलते लोग वोट देने में कम रुचि लेने लगे हैं और ठीक इसी प्रकार ढोंगी तांत्रिको के चलते लोग मान चुके है कि साला भूत भूत कह के ये हम लोगो को डराता है . भूत नहीं होते .
आजकल भूत दिखते नहीं , चुडैले भी गायब हैं आखिर क्यों न हों , कल के भूत खेत जोत रहे थे आज के भूत इंसान में घुस कर देश जोत रहे हैं , चुडैले कम कपड़े पहन कर यहाँ वहाँ शांति से विचरण कर रही हैं . एक sms भेजा था हमारे एक मित्र ने .....
G-> Ghost
I -> In
R-> Real
L-> Life
so avoid girls !!!.
From..
" MEN AWARENESS ASSOCIATION "
"save men,save world".
आजकल ये हालत हो गयी है भूतों की .कमेन्ट बाजी शुरू हो गयी है भूतों के साथ .
चाहे जो भी हो मैं सोचता हूँ कि हर घर ,हर गाँव ,हर जिले ,हर देश में ये भूत रुपी अनजान शख्स घूम रहा है .
कई प्रश्न आज भी जेहन में उमड़ते हैं कि पहले के भूतों को इंसान से इतनी हमदर्दी क्यों होती थी .और आज सर पर बैठ गए हैं. क्यों ?.
भूतों से सब परिचित होते हैं , बस कोई देखा होता है कोई महसूस किया होता है और कोई सुना होता है . लेकिन कोई इस पर विचार नहीं करता कि आखिर रहस्य क्या है , शोधकर्ता लैब में बैठ कर इंसान के दिमाग पर शोध करेंगे .
भूतों के पास जाने में तो उनकी भी फटती है .
सही रिजल्ट कैसे दे सकते हैं भला ....
खैर ये सब बातें वास्तविकता से परे हैं जो कभी कभी वास्तविक दुनिया में दिख जाती हैं .
इंसान खुद को तो जान नहीं पाता दुनिया को क्या जानेगा ....चमत्कार तो होते ही रहते हैं .
शिक्षा के साथ , कुछ अलौकिक ज्ञान की भी आवश्यकता पड़ सकती है ..क्या पता भविष्य में क्या होने वाला है , पहले के बुजुर्ग लोग अपने ज्ञान अपने वारिसों को देकर स्वर्ग सिधार जाते थे लेकिन आज के बुजुर्ग केवल यही ज्ञान दे सकते हैं कि लोगों पर अपनी धाक कैसे जमाएं अपनी बात सुनवाने का मेथड क्या है, सफलता कैसे पायें ,नाम रोशन कैसे करवाएं , पैसे ज्यादा कैसे कमाए .........और अध्यात्मिक और अलौकिक ज्ञान जाए तेल लेने .
ज्ञानी लोग आये और अपने ज्ञान दिए और चले गए , भूत आये खेत जोते और गए और अब विज्ञान कहता है कि परग्रही आयेंगे .देखें वे क्या जोत के जाते हैं ...........