Saturday 22 March 2008

जब कभी गुजरा जमाना याद आता है



जब कभी गुजरा जमाना याद आता है,


बना मिटटी का अपना घर पुराना याद आता है।


वो पापा से चवन्नी रोज मिलती जेब खरचे को,


वो अम्मा से मिला एक आध-आना याद आता है।


वो छोटे भाई का लडना,वो दीदी से मिली झिङकी,


शाम को फिर भूल जाना याद आता है।


वो घर के सामने की अधखुली खिङकी अभी भी है,


वहाँ पर छिप कर किसी का मुस्कुराना याद आता है।


वो उसका रोज मिलना,न मिलना फिर कभी कहाँ

अब तो उसका बिछड़ जाना याद आता है।


जब कभी गुजरा ज़माना याद आता है।

Thursday 20 March 2008

नींद


नींद उस बच्चे की

जिसे परियां खिला रहीं हैं

मुस्कान उसके चेहरे पर

सुबह के क्षितिज की तरह फैली हुई


नींद उस किशोर की

जिसकी प्रेमिका सपने में भी नहीं आती

हर सपने में वह साक्षात्कार देता

और असफल लौटता घर


नींद उस नौजवान की

जिसकी आँखों में करवट बदल रही है

एक सूखती हुई नदी

बेवाई की तरह फटे खेतों में

वह रात भर

हल जोतता रहता है


नींद उस युवती की

जिसके भीतर

सपनों का समुन्द्र पछाड़ खा रहा है

लहरे लगातार शर्मिंदा हो रही हैं


नींद उस बूढे की

जिसकी आँखों में

एक भुतहा खँडहर बचा है

खँडहर की ईंटों की रखवाली में

वह रात भर खांसता रहता है

किसी भूत के अट्टहास की तरह


किसिम - किसिम की होती है नींद

हर नींद के बाद जागना होता है

जिस नींद के बाद

जागने की गुन्जाईस नहीं होती है

वह मौत होती है

-मनीष .....नींदों पर शोध ....

सफर


सफर ज़िन्दगी का

कुछ नहीं कह सकते

इसके बारे में

केवल महसूस होता है आनंद

सफर का


ज़िन्दगी के इस सफर में

किया मैंने एक सफर

बस से

बैठा ऊँघ रहा था

खिड़की के पास


अचानक ध्यान गया

बाहर दूर एक जलते दिए पर

दूर - दूर तक अँधेरा

और उसके बीच

वह जलता दिया


घने जंगलों को चीरता हुआ आ रहा था

उसका प्रकाश !
लगा जैसे युद्ध हुआ है

इस घने अँधेरे और दीपकों के बीच

इकलौता बचा दीपक डटा हो

मोर्चे पर


शहीद हुए दीपकों की चीखें

शायद गूँज रहीं हो इस वातावरण में

सांय -सांय के रूप में

शमां के बुझाने पर जैसे परवाने

करते हैं शोर ग़मगीन


चिल्ला रहे थे झींगुर वैसे

खडे पेड़ों पर

उनका साथी छिन गया हो जैसे

कुछ पल क्रंदन करने करने के बाद

चुप हो जाते झींगुर

शायद कोई वयोवृद्ध झींगुर

समझाता उन्हें कि

एक साथी और बचा है

मैदान - ए - जंग में


अचानक फिर चीखते कि

बचा लाओ मेरे साथी को

एक बार फिर ग़मगीन हो जाता

वातावरण


'बस' चलती रहती ,वह दीप

ओझल होता मेरी आँखों से ,जैसे

ले रहा हो अन्तिम सांस

अपने जीवन की

खडे पेड़ों पर बैठे झींगुरों की आवाज

एकाएक बढ़ने लगी

मैं समझा एक और वीर सिपाही शहीद हो गया


पर खिड़की से पीछे देखने पर

मैंने देखा

जल रहा था दीप

हिल रहा था ऐसे मानो मुझे 'अलविदा' कह रहा हो
---- मनीष (रात में बस से आजमगढ़ जाते समय सुदूर अँधेरे में जलते एक दीप से ली गयी प्रेरणा ! उस सन्नाटे में हम दोनों ने एक दूसरे को समझा ..... जीवन के किनारे पर खडे होकर ....)

बदलाव


रात का समय

दुनिया सो रही होगी

सोच रहा मैं


अचानक गुल हुई बिजली
पहुंचा छत पर लिए बिस्तर

लेट गया खुले आसमान की ओर मुह किये

चारों ओर सन्नाटा

और उसको तोड़ते हुए

कुत्तों और सियारों की आवाज

शायद आपस में अन्ताक्षरी खेल रहे हैं

सोचता मैं

फिर ख़याल आता अपने अस्तित्व का

उन टिमटिमाते तारों को देख कर

मैं खो जाता उन सितारों में

कितने खुश हैं वो

कितने चमक दार

शायद अपने जीवन साथी को आकर्षित कर रहे होंगे ...

दूर-दूर तक फैला इनका संसार

एक तारा बहुत चमक दार

शायद चिढा रहा हो अन्य तारों को

अपनी चमक से

काश मैं वहाँ होता

खेलता उनसे चोर सिपाही

और छिप जाता किसी बड़े की ओट में

सोचता मैं

मेरा ध्यान टूटा

कुत्तों की बढ़ती आवाज से

सियार भी बुलंद थे
शायद कोई चोर आया होगा

भूखा होगा ! नहीं

चोर भूखे नहीं होते

मैं लेटा यही सोच रहा होता

फिर सोचता किसी सुंदरी का आशिक होगा

चोरों की तरह आया होगा

और उसके कमरे में घुसने के लिए

सोई हुई प्रेमिका को जगा रहा होगा
कैसे अरमान होंगे उसके

पर ये कुत्ते उसके अरमानों पर पानी फेर रहे होते

कुत्तों की आवाज धीमी पड़ गयी

शायद वह सफल हो गया होगा

या फिर प्रेमिका के लिए लाया हुआ केक

कुत्तों को खिला रहा होगा

सोचता मैं

अचानक बिजली आई

और मेरा ध्यान टूटा

नीचे से मम्मी ने पुकारा

चले आओ

अपने कमरे में जाने के लिए मैं उठा

और देखा रोशनी बिखरी है चारों तरफ

कमरे में लगे बिस्तर पर

निढाल सा लेट गया

पंखे की आवाज , कानों को लगातार सुनाई दे रही थी

और कमरे के कोने में लगा मकडी का झाला

जिस पर मकडी टहल रही थी , सुबह सैर की तरह


मेरा मष्तिष्क कल्पना शून्य हो चुका था

नींद जैसी लग रही थी ..

लेकिन सपने गायब थे


बेचैनी में मैं बिस्तर से उठा

और छत की तरफ बढा
छत पर देखा , उन तारों को

उन तारों को जो अभी कुछ देर पहले

अपनी टिम टिमा हट से विचलित कर दे रहे थे

अब चेतना शून्य से दिख रहे हैं

कुत्ते कभी कभी रोने जैसी आवाजे निकालते

..सियार खामोश थे


सब बदल गया एक झटके में

क्या

मैं भी बदल गया

सोचता मैं ......

Monday 3 March 2008

पहाडों के बीच एक सांझ .........


दिन भर की चहल - पहल समेटकर

सूरज जा चुका है क्षितिज के पार

थनों में मिटटी का दूध भरकर

खूंटों तक लौट चुकी हें गायें


पंक्षियों की यह अन्तिम कतार भी वक्राकर

ओझल हो रही आँखों से

आसमान में बच रहे तो केवल बादल

आरे बादल कारे बादल

और श्रृंगार के आईने पर बिखरे

सिन्दूर सा सिन्दूरी रंग


चाँद दबे पाँव आ रहा इसे पोछने

और जंगलों की चकत्तेदार हरियाली को

अपनी जद में ले रहा अँधेरा ....



काम से लौट रही आदिवासी स्त्रियाँ

समवेत गुनगुना रहीं संताली में कोई गीत

उनके हंसने - खिलखिलाने - गाने की लय

टूट जाने में भी है एक लय



मैं नहीं समझ पा रहा इन गीतों का मर्म

पर यह पहाड़ समझता होगा यकीनन

वे हर रोज सौपती होंगी

इसी तरह अपनी थकान

जिसे पहाड़ अपना अर्ध्य समझकर

पी लेता होगा अमृत की तरह !



और यह जो इसकी छाती से फूटकर

बह रही कागज़ से भी पतली धार

जिसे हथेलियों से चाट - चाट कर पी रहा मैं

अहा !कितना मीठा कितना शुद्ध !



पानी की धार और पहाड़ की छाती के बीच

प्यार बन उग आया शैवाल

मुझसे पूछ रहा -

इतनी ही शुद्धता और इतनी ही मिठास क्या

दे पाती है तुम्हारी जीरो -बी वाली सुरक्षा



मैं पूछ रहा स्वयं से -

समय चाहे जितना ही क्रूर हो

और ज़िन्दगी हादसों भरी

क्या हम नहीं बचा पाएंगे

पहाडों पर ऐसी ही सांझ

और दुनिया में

शैवाल जितनी भी कोमलता ?


-------- मनीष ( चित्रकूट की एक शाम से प्रेरित )

काश ! सपने पूरे होते .........

काश !मुझे मिल जाती वो
चमत्कारी अंगूठी
जिसे पहनने पर हम आ
जातेस्वप्न लोक में अपनी प्रेमिका के साथ

ऐसा हुआ एक बार मेरे साथ
मोड़ पर खड़ी वो अकेले
देख रही थी मुझे ,अचानक
मुझे दिखी वो अंगूठी ,मैंने उसे
पहन लिया अपनी उंगली में

अहा ! क्या छटा ,सुहानी शाम
सूर्य छिप रहा था
पहाडों की ओट में
मैं और वो खडे फूलों के खेत में
देख रहे एक दूसरे को

अचानक वो चौंकी ,बोलते हुए
मैं कहाँ आ गयी , मैं भी शरारत भरी
आँखों से किया इशारा
उसकी तरफ

रूठ कर जाने लगी वो
पर देखा उसने दूर - दूर तक
फैली खूबसूरत छटा
न ही कोई घर न ही कोई मुहल्ला
बस दूर दूर तक फैले रहे
फूलों से भरे खेत
और उनकी रखवाली करते
सुन्दर और हरियाली भरे ये
खामोश पहाड़

घूम कर पीछे देखा उसने
मैं लेटा फूलों पर
खामोश निगाहों से
देख रहा था उसे

विवश होकर लौटी मेरे पास
बोली घर जाना है
मेरा ये आशियाना अच्छा नहीं लगा तुम्हे
बोला मैं
शर्म से झुकाकर सिर
एक मद्धिम सी मुस्कान आई
उसके सुर्ख गुलाबी होठों पर
लगा जैसे किसी भवरे ने
चुम्बन ले लिया हो किसी
फूल का ,और फूल की
पंखुडियां खिल गयीं
उसका यह स्पर्श पाकर

बोली हम रहेंगे कहाँ
एक संगीतमय वाणी में
"हम रहेंगे " शब्द सुनकर आया चैन दिल में
पास आकर बोला मैं
चलो ढूँढते हें कोई आशियाना

पास आई वो मेरे
मैंने भर लिया उसे अपनी आगोश में
जैसे उस पर्वत ने अपनी आगोश में
सूर्य को छिपा लिया ,बस रह गयी
उसकी लालिमा
उड़ा उसका रेशमी दुपट्टा ,लालिमा की कमी को
करने के लिए पूरा

ध्यान टूटा उसका चिडियों की चहचहाहट से
अलग हो गयी मेरे सीने से
शर्माते हुए
मैंने पकड़ना चाहा उसका हाथ
दिया उसने सकुचाते हुए
हाथो को हाथों में लिए
चल दिए एक तरफ
उस मखमली शाम में
दिखा एक खूबसूरत घर
उजाड़ सा ,कोई नहीं
वहाँ पर
अन्दर गए , खुशबू से भर गया अंतरंग
ख़ुशी से उछली वो
लिपट गयी मेरे जिस्म से
लगा जैसे फूल ने भवरे को दावत दी अपने
घर आने की
पहली बार स्पर्श किया उसके नर्म होठों को
अपने होठों से
महसूस किया कोमल छुअन
उसके धड़कते हुए ह्रदय का
लगा उसकी छाती शाबाशी दे रही हो
मुझे , मेरे सीने को मेरी पीठ समझकर
भींच लिया उसे ,मैंने
हम कभी जुदा न होंगे
यह सोच कर
परन्तु उसने मेरी आँखों में झाँका
प्यार भरी नाराजगी दिखाते हुए

मेरी जिह्वा सहला दी उसके होठों की
पंखुडियों को
क्षमा मागने के लिए

उसके होठों के फूल मुझसे अलविदा कहते हुए
हिले ,कि मुझे भूख लगी है
मैंने सोचा ,कमबख्त ! भूख ......
अच्छी होती है
लेकिन ऐसी भूख जो उसे लगी
बड़ी बेशर्म है ऐसे समय आ गयी ....
उसने मुझे छोडा और कोने में
लगे मखमली बिस्तर पर
लेट गयी ,कुछ सोचते हुए

मैंने देखा ,खुश थी वो बहुत
मैं निकला भोजन की तलाश में
ले आया कुछ फल तोड़कर
बाहर लगे पेड़ों से

धोया उनको चट्टानों से निकलते
निर्मल जल से

जलाया एक दीपक ,खाए फल
अँधेरा पाव पसार चुका था
उन्हें नीद आ रही थी शायद
या बहाना था उनका
मेरी बाहों में आने का

मेरे सीने पर रखकर सिर ,पकड़ लिया ऐसे
मानो ! मैं उन्हें छोड़कर जा रहा हूँ
मैं भी सांत्वना देना चाहा उन्हें
अपनी बाहों में भरकर ......

अचानक मैं बिस्तर से गिरा
घडी का एलार्म बज उठा
नींद टूटी ,
मैं ,फिर से सोना चाहा कि जाकर
उनसे कह दे कि मैं तुम्हे छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगा
परन्तु .......

वह चमत्कारी अंगूठी कहीं नहीं थी !

-------- मनीष ( सन् २००५ में रचित, सत्य स्वप्न पर आधारित )