तुम उसे ढूँढ न पाओगे
उस रहस्य को
जिसकी छाया तले तुम
तिलमिला रहे हो
बने एक लाचार
वह कहता है
तुम देख नहीं सकते
तुम सुन नहीं सकते
तुम महसूस नहीं कर सकते
हर स्थिति से, तुम
अपंग कर दिये गये हो
वह कहता है
तुम धोखे में हो
अपने आप में कैद
एक कैदी हो
खूबसूरत कैदखानों में रखा है तुमको
हाँ तुम कैद हो, चीखकर
वह कहता है
एकाएक चुप होकर
वह निहारता है
इस संसार के रंग भरे
दृश्यों को
पल भर की मुस्कान बिखेर
फफक कर रो पड़ता है
मैं कौन हूँ, मैं कौन हूँ
मुझे आज़ाद कर दो, आज़ाद ……
करूण स्वर में
वह कहता है



12 comments:
बहुत गहरी अभिव्यक्ति है-सुन्दर एवं गंभीर भाव.
बहुत अन्तराल रहा. आशा है, सब ठीक है.
बहुत सुंदर रचना....
गहन arth लिए है आपकी रचना ।
सुंदर भाव....कुछ याद आ गया---
भेजते हो अपने प्रहरी
देकर सुनहरे पाश
बाँध कर मुझको वे कर देते हैं सुप्त
नही देखने देते
मुझको अपने ही घाव
पिलाकर मुझे मेरा ही रक्त
कर देते हैं मदहोश
भूल जाता हूँ आलोक
करता हूँ निशा से अभिसार
अंतर्मन की व्यथा को गहराई से उतारा है,लेखनी में जादू है......
किसने कहा है
लाचार
ला अचार
या खा अचार
कविता में लाचार
कविता में सब कुछ
है संभव
नहीं कोई लाचारी
।
Nice One...!!
पतंगा बार-बार जलता है
दिये के पास जाकर
फिर भी वो जाता है
क्योंकि प्यार
मर-मिटना भी सिखाता है !
.....मदनोत्सव की इस सुखद बेला पर शुभकामनायें !!
'शब्द सृजन की ओर' पर मेरी कविता "प्रेम" पर गौर फरमाइयेगा !!
सुन्दर कविता ...
......उबंटू की खूब खोज -खबर चल रही है आजकल.
मैंने भी एक मंगवाई है इसकी सि. डी. देखिये कब आती है
सुन्दर कविता !
बहुत सुंदर !
मैं कौन हूँ, मैं कौन हूँ
मुझे आज़ाद कर दो, आज़ाद ……
करूण स्वर में
वह कहता है
हमेशा की तरह से अति सुंदर
धन्यवाद
सुंदर भाव पूर्ण रचना ....अपने अन्दर कई सवाल और कई जवाब समेटे .....!!
रचना बहुत अच्छी लगी....बहुत बहुत बधाई....
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