अधुनिकता ने बड़ी जल्दी ही जन समुदाय को अपने चपेट में ले लिया है। लेकिन इस जन समुदाय की लीला बड़ी विचित्र है।
उस दिन स्टेट बैंक वालों ने बाकायदा फूल माला सजाकर, स्टाफ़ को मिठाई खिलाकर, पब्लिक को ललचाकर एक छोटे से कमरे में एक डिब्बा रख गये जो अद्भुत तरीके से नये नये नोट उगलती थी।
वे लोग खुश हो गये जिनके पास नोट उगलवाने का मन्त्र था या फ़िर वे जो बैंकों से विशेष प्रकार की मन्त्र दीक्षा ले रखी थी जिससे नोट उगलवाना आसान होता है। इन सबके बीच कुछ ऐसे लोग थे जो मात्र इतना जानते थे कि उनके इलाके में अब अइटीअम लग गया है।
वह क्षेत्र मूल रूप से गरीबों का इलाका था। जहाँ एक सुविख्यात मन्दिर है जिसके कारण संभ्रान्त परिवार के लोग भी उस क्षेत्र का अक्सर दौरा करते थे। साथ ही बैंकों की यह पालिसी रही है कि वह अपने कष्ट-मर को हर सम्भव सहायता (विपत्ति) पहुंचाये। सो बैंकों ने कष्टमरों का साथ वहाँ तक भी नहीं छोड़ा कि वे शान्ति के साथ हरि भजन कर सकें। अमूमन अगर भिखारियों को पैसे बाँटते वक्त पैसे खतम हो जाये तो ये आपके लिये …… विशेष सुविधा, बच्चे रो धो कर खिलौने, गुब्बारे माँगने लगे तो आपके मुँह से ये न निकलने पाये कि बेटा पैसे नही हैं … उस पल के लिये …… विशेष सुविधा, बीवी मुँह फुला कर बैठी है कि उसे चुनरी, सिन्दूर, चिमटा, बेलन वगैरह वगैरह चाहिये तो आपके पास कोई बहाना न हो, उस खीझ के लिये …… विशेष सुविधा।
इन बैंक वालों का क्या है, पैसे तो हमें भरने पड़ते हैं और ये हैं कि जब देखो तब पैसा लुटवाने को आतुर रहते हैं। पहले आदमी के पास कुछ रुपये होते थे तो वह बैंक में डाल देता था कि बचे रहेंगे लेकिन आज स्थिति उलट है, पचास रुपये की जरूरत हुई तो आदमी पाँच सौ की एक पीली पत्ती निकाल लाता है और शाम होते होते पचास रुपये ही बचते हैं। बुजुर्गों ने भी कहा है कि पैसे हाथ में लेकर नहीं चलते ……… बल्कि लंगोट में खोंस कर चलना चाहिये ताकि निकालने में झिझक हो …
ए टी एम लग गया था जैसा कि बैंकों की पालिसी रही है कि आपको तनिक मात्र भी दुख-कष्ट न पहुँचे, उस पालिसी के अनुसार ए सी बोले तो वातानुकूलित कमरे का इन्तजाम हुआ था। ताकि अगर एक आध सौ की नोट कम निकले तो भी आप चिर शान्ति की अनुभूति करें और खुशी खुशी घर चले जाय। घर जाकर बीवी को हिसाब देते समय गड़बड़ी सामने आ जाय तो बीवी द्वारा दिये गये लात घूँसों का जिम्मेवार बैंक नही है।
वातानुकूलित कमरे से अनभिज्ञ गरीब बच्चे अक्सर अन्दर बाहर होते और आश्चर्य प्रकट करते कि अन्दर जाड़ा है बाहर गर्मी है …… कुछ दार्शनिक टाइप के बोलते – बरसात भी है क्योंकि वातानुकूलक यन्त्र से पानी टपक कर फर्श पर फैलता रहता। जिससे पता चलता है कि सरकारी चीज ही घटिया होती है।
मशीन लग गयी थी। मन्त्रधारी लोग अपना अपना मन्त्र हाथ में लिये पहुँचने लगे, कुछ दिनों में वहाँ इतनी भीड़ होने लगी कि वातानुकूलित कमरा भी आग उगलने लगा। सभी अपना अपना खुरपेंच लिये मशीन में डालते और निकालते रहते, दूसरे हाथ से पसीना पोछ कर कहते बड़ी गर्मी है भाई……… और दस – बीस गाली बैंक को जड़ देते।
इस बात से बेखबर कि गाली उन्हीं को मिलनी चाहिये। हमारे इलाहाबाद के अल्लापुर की यह परम्परा रही है कि पैसे निकालते वक्त एक आदमी एक समय पर ए टी एम रूम में नही घुसता बल्कि सभी कुकुरमुत्ते की भाँति मशीन को घेरकर खड़े हो जाते हैं, जब सभी लोग लदे रहेंगे तो कमरा क्योंकर ठंडा हो। जन समुदाय गाली गलौज में ही समझदार है मानो गाली विषय में गोल्डमेडल से नवाजा गया है।
स्टेट बैंक के सुशिक्षित गार्ड ने उन सबको बात यह बात समझाई कि श्रीमान एक समय पर एक ही जन अन्दर जायें …… इतनी सी बात बोलते ही उसे लतिया दिया गया।
वह भी खीझ कर ए टी एम की रखवाली करना छोड़ दिया। नतीजन नोंटों का जखीरा अकेला पड़ गया और छोटे बच्चे आकर उसमें लकड़ी से खुरपेंच करने लगे इस आशय से कि इसमें कुछ डाला जाता है तभी पैसे आते हैं। कुछ बड़े खुरपेंची शीशा तोड़कर ट्यूबलाइट ही निकाल कर चलते बनें, और एक दिन तो नोटों की देवी, मशीन पर ही हमला हो गया लेकिन भाग्यवश वह बच गयी लेकिन पूरी साज सज्जा तहस नहस हो गयी।
तब से आज तक उसी स्वरूप में वह कमरा पड़ा है। भीड़ इकट्ठी होती है तो झगड़ा होना तय है क्योंकि लकड़ी से खुरपेंच करने के कारण स्वैपिंग प्रक्रिया ठीक प्रकार से नही हो पाती और पीछे खड़ा व्यक्ति आगे वाले को जल्दी करने को कहता है और बात बढ़ती है और अच्छे से खुरपेंच हो जाती है।
बीच बचाव में पीछे से आये कुछ भद्रेश उन सबको समझा कर कहते हैं - देखो ! ऐसे डालते हैं फ़िर धीरे धीरे हौले से खींचते हैं फ़िर ये आता है फ़िर ये …… पैसे निकालते हैं और निकल लेते हैं। भाड़ में जाये दुनिया अपना तो काम हो गया……
महौल शान्त होता है तो फ़िर से खुरपेंच होती है, स्वैपिंग कायदे से हो गयी तो टच स्क्रीन को ऐसे दबाया जाता है मानो कोई बटन …… कोई अंगूठे से दाबता है तो कोई पूरा हाथ ही लगा देता है……
टेक्नोलॉजी की देवी अगर उस धरती पर अवतरित हो जाये तो उनका भी तियाँ पाँचा एक कर दिया जायेगा।
धीरे धीरे एक एक लोग निकलते जाते हैं कि तभी ज़लालत झेल रहे मशीन से आवाज आती है
Sorry, temporarily Unable to process. Please visit another SBI ATM.
लोगों का चेहरा अचानक ही लटक जाता है और अब तक धक्कापेल कर रहे लोग आपस में पूछते हैं भाई साहब आसपास कोई दूसरा है। कुछ निर्दयी प्रजाति के प्राणी मशीन पर लात मारकर गाली बकने लगते हैं।
धन्य है कि मशीन है कोई बाबूजी (कलर्क) होते तो उनका क्रिया करम हो जाना निश्चित है, इस बात को शायद वे भी जानते हैं तभी तो बैंक में जालीदार खिड़कियों के भीतर दुबके रहते हैं।
ए टी एम कथा निराली है इसका नित पान करने से आफत से छुटकारा मिलता है, कोई तुलसीदास का वंशज या प्रशंसक हो तो वह इस पर ए टी एम चालीसा भी लिख सकता है।
--- मनीष



5 comments:
ए.टी.एम की कहानी मजेदार रही. हम याद कर रहे हैं उन दिनों को जब हम उन्हें इनस्टॉल कराया करते थे. ऐसी दुर्गति हहामारे प्रदेश में कहीं नहीं हुई. वहाँ के लोग तो महान हैं. आभार.
बहुत बढ़िया लिखे हैं भाई..
पढ़कर मजा आ गया.. :)
अरे भाई कई साल बाद आये, कहां रहे, ओर आते है एक धोसूं लेख लिख मारा, बहुत ध्यान से पढा, आप की लेखनी मे सच मै कोई जादू है, बहुत सुंदर लिखते हो, वो तो आप ने बता दिया वरना इलहबाद के अल्लापुर मे हम भी २० रुप्ये निकलबाने आ रहे थे ( सभी कुकुरमुत्ते की भाँति मशीन को घेरकर खड़े हो जाते ) चलिये अब नही जायेगे.
आप का धन्यवाद
बहुत अच्छा लिखा है....सचमुच हुआ है क्या ऐसा वहां पे।
bahut bariya. garmi ke dino mai University road, allahabad ke ATM mai log hawa lene jaate hai....
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