अभी कुछ दिन पहले हमारे एक मित्र अपनी अनदेखी प्रेमिका की शादी में शामिल होने गये थे। आजकल क्या है कि संचार माध्यम के द्वारा भी प्रेम फल फूल रहा है, इसी में हमारे मित्र भी अटक गये। अटकना स्वाभाविक ही है उमर भी तो वही है। 16 बरस की बाली उमर…
पिछले एक वर्ष से ये ज़नाब हर रोज शाम को 100 रुपये का टाक वैल्यू अपने फोन में डालते और रात भर न जाने क्या क्या बतियाते और सुबह से दोपहर तक बाकायदा चद्दर तान कर सोते। रोज की यही स्थिति थी, कालेज का एक दो क्लास ज़रूर मिस हो जाता लेकिन वहाँ भी प्राक्सी सुविधा के चलते इन्हें सुकून था।
दशहरा की छुट्टियाँ थीं। ये भाई फोन से चिपके हुए थे कि अनदेखी प्रेमिका ने अपनी बहन की शादी में आने का न्योता इन्हें दे डाला। दीदार की चाहत में इन्हें और कुछ नहीं सूझा फटाफट तैयारी कर ली।
इन्हें यूँ तैयार होते देख इनके पड़ोस के मित्र भी ललचायी आँखों से देखे और बोले – अंकित! टूर पर जा रहे हो?
अंकित – मत पूछिये, एडवेंचरस घूमाई घूमने जा रहे हैं। आप भी चलेंगे?
उनके मित्र - हाँ यार क्यों नही! कब तक लौटना होगा?
अंकित – कल सुबह तक…
फिर वे भी जोशिया गये। फटाफट दौड़ते हुए अन्दर गये और परफ्यूम छिड़कने लगे।
कुछ ही देर बाद दोनों शूर वीर शर्ट खोंस कर, पैरों में नये जूते बाँधे और कंधे पर कोट लटकाये अपने गंतव्य की तरफ रवाना हुए। जो कि 60 किमी दूर था, जाते जाते शाम हो गयी थी।
अब ये उनकी नियति थी या सौभाग्य था की जिस गाँव की बात उनकी प्रेमिका ने किया था उस नाम के तीन गाँव 15 किमी के दायरे में स्थित थे। जो कि चित्रकूट क्षेत्र से लगा था।
पहले पहल तो ये बिना जाने समझे एक व्यक्ति से उस नाम के गाँव की लोकेशन पता कर ली और पैदल ही निकल लिये जो कि मुख्य सड़क से 7 किमी दूर था।
पैदल चलते चलते रात के 8 बज गये कि तभी गाँव से दूर एक जोरदार रोशनी इन्हें नज़र आयी। इन्हें लगा कि शादी वाला तम्बू वही है। रास्ते में मिले एक व्यक्ति से उन्होंने पूछा – भाई साहब वो जो दूर तम्बू लगा है वो किसका है और उनका घर कहाँ है? लेकिन राहगीर को कुछ समझ में नही आया कि ये क्या कह रहे हैं।..........................
यह सोचकर कि इस समय बाराती रसगुल्ले, गुलाबजामुन गपक रहे होंगे, ये दोनों द्रुत गति से उस तरफ दौड़ पड़े।
करीब जाकर देखा तो रामलीला हो रही थी। राम – रावण युद्ध चल रहा था और रावण जोरदार हँसी हँस रहा था, मानो इन्ही बेवकूफों पर हँस रहा हो।
इन्हें सूटबूट में लिपटा देख रामलीला कमेटी वाले इनकी तरफ दौड़ पड़े कि शायद कोई गणमान्य अतिथि आये हों।
रावण और राम भी युद्ध करना छोड़कर इन दो नमूनों को देखने लगे कि देखें तो कौन सूटबूटधारी आया है जो हमारी कला से खुश होकर 500-500 का नोट देगा। इन दोनों सज्जनों को अपनी ओर देखते हुए रावण खुश होकर जोर जोर से हँसने लगा मानो ये राम को चिढ़ा रहा है कि वो 500 मुझे मिलने वाले हैं।
मुफ्त में मिली इज्जत बचाने हेतु 200 रुपये इनकी जेब से निकले और राम रावण पर न्यौछावर हो गये।
कुछ देर तक वे दोनों रामलीला में लगी ए-क्लास कुर्सी पर बैठ कर विचार करते रहे कि अब क्या किया जाय।
दोस्त ने कहा – यार, आज रात रामलीला में गुजार दो कल सुबह जायेंगे।
अंकित – अबे! रामलीला खतम होने वाली है, सब अपने अपने घर जायेंगे तो तू इस सीवान में बैठकर भूतों का भांगड़ा देखेगा?
कुछ देर तक अतिथि बनकर बैठे रहे फिर चल दिये, लोग इनके सम्मान में जमीन से उठ कर खड़े हो गये।
सभी जानते हैं चित्रकूट क्षेत्र डाकुओं का इलाका है, लेकिन ये बेवकूफ़ नही समझे। सीता खोज में निकले ये दोनों पगले रात में वो गाँव ढूँढ रहे थे जिसमें शादी हो।
एक सुनसान रास्ते में, जो कि चारों तरफ घनें पेड़ों से घिरा था, इन्हें कुछ लोग दिखाई दिये। ये उछलते हुए गाँव का पता पूछने के इरादे से उनके पास गये और बोले – भाई साहब आस पास कहीं कोई शादी है क्या?
वे डाकू लोग थे।
बस होना क्या था, सूट बूट देखकर उन लोगों ने इन्हें डरा धमका कर, चाकू और तमंचे सटाकर इनका सब उतार लिये। बस जांघिया छोड़ दी।
किसी तरह ठिठुर कर इन लोगों ने रातें बितायी और भूख के कारण तड़पते रहे।
सुबह हुई और कुछ ग्रामीणों ने इन्हें इस हाल में देखा तो समझे कि साले पीकर घूम रहे हैं। लेकिन इन सबने दुखड़ा रोया तो कुछ हृदयवान लोगों ने फटे पुराने कपड़े दिये और कुछ रुपये इस शर्त पर कि वापस आकर दे जाना।
और दीदार के प्यासे बिना दीदार के लेकिन समझदार हो कर वापस लौटे।
दूसरे दिन ये लोग गाँव वालों के द्वारा की गयी बेइज्जती उतारने, एक सभ्य नागरिक बनकर वापस उस गाँव गये और उधार लिये पैसे चुका दिये साथ ही वो फटे पुराने कपड़े भी……
बाद में उन्होनें ये आप बीती मुझे सुनायी। ज़वाब में मैने कहा – चलो अच्छा हुआ कि तुम्हारे द्वारा दान किये गये 200 रुपये पुण्य में गये बाकी तो डाकू ले गये।
रामलीला में अपनी इज्जत बचाने के लिये तुमने दान किया और तुम्हारी इज्जत बच गयी।मुफ्त में जान भी बच गयी। ज्यादातर तो हत्या करके ससुरे लूटते हैं ताकि किसी को पता न चले।
शायद वही दान, गाँव वालों की मदद के रूप में तुम लोगों को मिला। वरना आजकल कौन, किसको पूछता है?
मेरी बातें सुनकर वे अपने इस कृत्य पर मुस्कुराने लगे।



11 comments:
afsos, fir bhee ham aapke sath hain
जांघिया महान है। बचा लिया।
राम लीला की वानर सेना में कुच वानरों की कमी थी क्या?
चलो अब 100 रुपया रोज़ का खर्च तो नही होगा।लूटे हुए रुपयों की भरपाई उससे हो ही जायेगी।
शुक्र है डाकुओं ने थोड़ी शराफत दिखायी और जांघियाँ छोड़ दिया
आए थे हरी भजन को लौटन लगे कपास, बोले तो.. लड़की के चक्कर में क्या-क्या होता है.
waah ! majedaar sansmaran hai
बहुत ही मजेदार किस्सा सुनाया आप ने , अच्छा है साथी को साथ ले गया, अकेला होता तो अब तक राम नाम सत्य....
धन्यवाद
good enough
दीपावली की हार्दिक शुबकामनाएं
दीपावली की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं
waah bhai...kya bat hai...bahut umda rachana hai...well done!
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