एक छोटा सा गाँव था। उसमें माधव नामक एक बुजुर्ग अपने बेटे सुधीर और बहू लक्ष्मी के साथ रहता था। उसकी बहू बहुत सीधी और समझदार थी जबकि उसका बेटा कुछ अकड़बाज था। दोनों की कुछ साल पहले शादी हुई थी। शादी के कुछ दिन बाद लक्ष्मी ने घर के सामने एक नीम का पौधा लगाया। वह प्रकृति प्रेमी थी और साथ ही एक सधी विचार वाली गृहणी भी। उसका विचार था कि नीम के पौधे से घर की हवा कीटाणु रहित और स्वच्छ बनी रहेगी।
नीम का छोटा पौधा अच्छी मिट्टी और लक्ष्मी जैसा संरक्षक पाकर लहलहाते हुए बड़ा होने लगा, लेकिन कभी कभी उस छोटे पेड़ की सुकोमल शाखा को सुधीर तोड़ कर दातुन करने लगता। लक्ष्मी ने उसे बहुत समझाया कि अभी दातुन के लिये नीम से शाखायें न तोड़ा करे क्योंकि अभी यह विकसित हो रहा है, परन्तु सुधीर लक्ष्मी को डांट कर चुप करा देता।
अपने आप को कटता, छिलता नीम का पेड़ दुखी होता लेकिन लक्ष्मी का स्नेह देखकर सब कुछ भूल जाता और अपना सिर आसमान की ओर किये उसकी तरफ निरन्तर बढ़ता जाता। नीम के पौधे को इस तरह बढ़ता देख लक्ष्मी फूली न समाती।
एक दिन माधव के पास उसका पड़ोसी आया और उससे नीम की कुछ लकड़ियाँ मागने लगा। माधव ने उसे लकड़ियाँ काटने की छूट दे दी। लक्ष्मी उस समय खेतों में काम कर रही थी, जब तक वह वापस लौटती तब तक पड़ोसी ने नीम की दुर्गति बना दी।
नीम की ऐसी दशा देख लक्ष्मी रो पड़ी और अपने ससुर माधव से रुष्ट हो गयी और बहस कर ली। ज़वाब में उसके ससुर ने कहा कि घर उसका है नीम का पेड़ उसके घर में है वह नीम के साथ चाहे जो करे, वह बोलने वाली कौन होती है। शाम को सुधीर वापस आया, अपने पिता से लक्ष्मी के खिलाफ बातें सुनते ही घर में घुसकर काम कर रही लक्ष्मी को मारने पीटने लगा। यह देख नीम का पेड़ पीड़ा से कराह उठा। स्वयं कटने की पीड़ा उतनी कष्टदायक नही थी।
नीम की देखभाल के चलते लक्ष्मी कई बार अपमानित हुई। उसने यह निश्चय किया कि अब से वह नीम की कोई रखवाली नही करेगी। जिसको जो चाहे सो करे, काटे पीटे, तोड़े मरोड़े चाहे जो करे अब वह किसी को उलाहना नही देगी।
पतझड़ का मौसम आया और नीम की पत्तियाँ जमीन पर गिरने लगीं। नीम की इन पत्तियों को देख माधव बिफर पड़ता और लक्ष्मी से पत्तियाँ बटोरने को कहता। लक्ष्मी - कहती घर आपका है नीम भी आपका है, आप ही नीम के मालिक हैं मैं कौन होती हूँ!!
लक्ष्मी के इस व्यंग्य से माधव चिढ़ जाता और कहता – ‘नीम कटवा कर फेकवा दूंगा’। फिर वह सुधीर से पत्तियाँ साफ करने को कहता। सुधीर बेमन से पत्तियाँ बटोरने लगता और नीम के पेड़ को कोसता।
घर में उपजे इस तनाव और ईर्ष्या के कारण नीम के पेड़ का विकास रूक गया और वह दुर्बल होता चला गया। पतझड़ समाप्त होते होते वह सूख कर मात्र एक ठूंठ रह गया। कुछ दिन बाद माधव ने उस नीम के पेड़ को कटवा दिया। लक्ष्मी उस दिन बहुत रोई थी। अब नीम का पेड़ नहीं रहा।
कुछ महीने गुजर जाने के बाद माधव को चोट लगने से एक बड़ा घाव हो गया। डाक्टर ने कुछ दवाईयाँ दी साथ ही नीम की पत्ती से घाव साफ करने की हिदायत भी दी। माधव ने नीम की पत्ती गाँव में खोजनी शुरु कर दी लेकिन कही भी नीम का पेड़ नही दिखा। नीम की पत्तियों से घाव न धुलने के कारण घाव और बड़ा होता जा रहा था।
एक दिन सुधीर के साथ माधव दूसरे गाँव में जाकर वह नीम की पत्तियाँ खोजने लगा। एक घर के सामने नीम का पेड़ दिखा और माधव ने बिना घर के मालिक से पूछे सुधीर को नीम के पेड़ पर चढ़ा दिया। सुधीर नीम की पत्तियाँ तोड़ तोड़ कर नीचे गिरा रहा था कि अचानक गृहस्वामी ने देख लिया और लाठी लेकर दौड़ पड़ा।
उसे ऐसे आते देख माधव की सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी, घाव के चलते वह भाग भी न सका कि एक लाठी उसके सिर पर आ पड़ी। माधव एक ही लाठी में चित्त हो गया। सुधीर डर के मारे पेड़ पर ही बैठा रहा लेकिन घर के और सदस्यों ने मिट्टी का गोला फेक फेक कर उसे नीचे गिरा दिया फिर जम कर धुनाई की। उन लोगों ने मार मार कर दोनों की हड्डी पसली एक कर दी। फिर इस तरफ न दिखने की चेतावनी देकर उन्हें छोड़ दिया गया।
वे रोते कराहते घर आये। लक्ष्मी उनकी यह दुर्दशा देख जल्दी से घावों पर मरहम पट्टी की। उनकी पूरी बात सुनने के बाद उसने एक गहरी साँस ली और आँख में आँसू लाते हुए उसने कटे हुए नीम के जड़ वाले हिस्से को देखा और बोली – ‘काश अपना नीम होता!!!’
माधव के मुँह से रूंआसा सा स्वर निकला – ‘तो नीम की पत्तियाँ भी होती!’
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और हम कहते है कि ससुरे यूँ लात न खाते और न ही लतियाये जाते। :)
(आंशिक सत्य घटना पर आधारित)
नोट - इस लघुकथा से क्या शिक्षा मिलती है? इस प्रश्न को लेकर मैं असमंजस में हूँ। पता नही शिक्षा मिलती भी है या नहीं!!



4 comments:
आप जो कहना चाहते थे ,बहुत अच्छी तरह और सार्थकता से कह गए.
अच्छी चीजों को देखने का नजरिया यदि सही न हो,अंहकार वस् उसकी उपेक्षा करे तो व्यक्ति पानी ही हनी करता है.पर कभी न कभी उसे अहसास होता है कि उसने क्या ग़लत किया या क्या खोया.
भाई बिन सोचे जो करे फ़िर पाछे पश्च्ताये, अगर वाप बेटा नीम के गुण जानते तो क्यो देखने पडते यह दिन.
बहुत ही सुंदर लगी यह कहानी.
धन्यवाद,
आप का लिंक मेरे से खो गया था, ओर मेरी लिंक लिस्त मै नही था, आईंदा जरुर हाजिर रहुगां
सच में यही है ज़िन्दगी ..प्रेरक है यह। एक बार सांस भर कर जद्दोजहद का यत्न किया जाय!
मनीष आपकी यह कहानी मुझे मेरी कहानी जैसी लगी ..सुंदर लिखा आपने धन्यवाद इसे यहाँ छपने का
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