हम कौन हैं, क्या हैं, कहाँ हैं? कभी कभी दुनिया के शोरगुल के बीच ये प्रश्न हमारे जेहन में आ खड़े होते हैं। बाल्यावस्था, किशोरावस्था पार कर हम यहाँ तक आ पहुँचे हैं जहाँ हमारी महत्वाकांक्षाओं और अपनों की अपेक्षाओं के बोझ तले हमारा अस्तित्व चरमरा रहा है।
हममें कुछ खास करने की चाहत है, हम कुछ खास बनना चहते हैं। पर किस तरह? इसका उत्तर बताने वाला कोई नहीं।
माँ बाप हमें आसमान की बुलंदियों पर देखना चाहते है लेकिन हमारे दिल का हाल जानने के लिये उनके पास वक्त नहीं है। पढ़ाई या अन्य खरचों के लिये धन जुटा देना यही उनके लिये सब कुछ है। समय समय पर हमें चेताते और जताते भी रहते हैं कि मैनें तुम्हारे लिये क्या क्या नहीं किया। तुम्हारे लिये क्या सुविधाएँ और सहूलियतें जुटाईं। उनकी इन बातों के बोझ से उनके लाडले का मन कितना दबा जा रहा है, इसकी उन्हें खबर भी नहीं होती।
हम उस दहलीज पर हैं जहाँ शरीर और मन में परिवर्तनों का दौर होता है। परिवर्तन आकृति में आते हैं और प्रकृति में भी। परिवर्तनों के साथ मन की चाहते भी बदलती रहती हैं। कल्पनाओं और आकांक्षाओं का नया संसार शुरु होता है। हम इसे बताना तो चाहते हैं पर कोई सुनने को तैयार ही नही होता।
हाँ, बात बात में अपने माँ बाप से झिड़कियाँ ज़रूर सुनने को मिल जाती हैं। जैसे – अब तुम छोटे नही रहे बड़े हो गये हो, तुम्हें सोचना चाहिये, समझना चाहिये, कम से कम अपनी जिम्मेदारियों का एहसास होना चाहिये, बहुत खेल लिये अब तो सुधरो।
ज़वाब में हम भी कुछ कहना चाहतें हैं परन्तु हमारी आवाज़ मन के कोनों में ही गूँज कर रह जाती है।
इसी आयु में पढ़ाई और कैरियर की दिशा तय होती है। इंजीनियरी, डाक्टरी, प्रबंधन, कम्प्यूटर या अन्य कोई राह। इस दिशा एवं विषयों के चयन में बहुत कम माता पिता ऐसे होते हैं जो बेटे या बेटी की रुचि अथवा उसकी आंतरिक संभावनाओं का खयाल रखते हैं। प्राय: इस संबंध में अभिभावकों की दमित आकांक्षाएं ही उजागर होती हैं। फलाने का लड़का इन्जीनियर या डाक्टर बन गया तो इन्हें भी अपना लड़का इन्जीनियर या डाक्टर नज़र आता है। इसी आधार पर तय होता है कि क्या पढ़ना है और हम उनकी बात स्वीकार कर लेते हैं। आखिर उन्हीं के पैसों पर उनको ज़िन्दगी जो जीनी है।
यहीं से शुरु होता है बेमेल जीवन का दर्द। रुचि, प्रकृति एवं संभावनाओं के विपरीत पढ़ाई का चयन कुंठा को जन्म देता है। मन का मेल न होने से इस पढ़ाई में स्वाभाविक रूप से कम अंक मिलते हैं।
तब हमें सुननी पड़ती है अभिभावक से कड़ी फटकार। सुनने को मिलते हैं अपने नाकारा होने के किस्से। लगभग रोज ही प्राप्त होते हैं अपने निकम्मेपन के प्रमाणपत्र। बार बार की जाती है स्फल लोगो से तुलना। किसी गणितीय समीकरण की तरह यह विविध रूप से सिद्ध किया जाता है कि हम कितने गए-गुज़रे हैं।
कभी कभी हमारे मन में अपने अभिभावक के प्रति गहरा डर समा जाता है जिससे हम उनसे कटते हैं कतराते हैं। साथ ही निराशा और चिंता मन में गहरी होती जाती है। मन चीखता है पर यह चीख अंदर ही रह जाती है। इस अवस्था में हम भावनात्मक रूप से अपने को बहुत अकेला पाते हैं। हमें तलाश होती है अपनेपन की। इसी तलाश का फायदा कुछ स्वार्थी जन अपने लाभ के लिये उठा लेते हैं तथा और भी गहरे गर्त में धकेल कर निकल लेते हैं।
घर में हमारी खुद की भावनाओं से कोई सरोकार नहीं रखता और विश्वविद्यालय में शिक्षा व्यवस्था का हमारी निजी ज़िन्दगी, स्वास्थय या हमारे मन की उलझनों से कोई मतलब नहीं होता। मरो चाहे जीयो लेकिन परीक्षा दो। कुछ कहने – बताने या जताने पर ताने – व्यंग्य या कटूक्तियों के कंटक ही हमारे पल्ले पड़ते हैं। आखिर मनोरोग और व्यवहारिक विकृतियॉ ऐसे ही तो पनपतीं हैं।
वास्तव में माँ बाप के लिये हम वही पगलेठ बने रहते हैं जो पहले थे, समय के साथ हमारे अन्दर हुए भावनात्मक और मानसिक परिवर्तन उन्हें नहीं दिखते। हम खुद उनके सामने बच्चे ही बने रहते हैं, परन्तु ज़रा सा बड़े बनकर उनसे विपरीत बात की तो नसीहत दी जाती है कि बड़ों से कैसे बात की जाती है।
हम वो युवा नहीं जो अपने यौवन को शराब में डुबोकर घुलाते हैं या सिगरेट के धुएं में उड़ाते हैं। हम अध्यात्मिक दृष्टि रखने वाले युवा हैं। यहाँ अध्यात्मिक दृष्टि का मतलब किसी पूजा पाठ, ग्रह शांति, अंगूठी, ताबीज, लाकेट या धर्म से नहीं है, इसका अर्थ तो जिन्दगी की सही और संपूर्ण समझ है। जिसके लिये हम प्रयासरत हैं।
अभिभावक जिन्हें अपने स्वार्थ से मतलब है, वे हमारे लिये केवल पैसा जुटाते हैं। ज्यादा कुछ हुआ तो हमारी महत्वाकांक्षाओं के घास फूस में चिंगारी लगाते हैं। उन्हें अपने दोस्तों, रिश्तेदारों, परिचितों से यह बताने में बेहद खुशी मिलती है कि उनका बेटा इंजीनियरी, डाक्टरी या प्रबंधन की पढ़ाई कर रहा है। पास होते ही बड़ी नौकरी लग जायेगी और कुबेर का खजाना लाकर घर में रख देगा। यदि काफी बातें हुईं तो बस जिम्मेदारी नैतिकता की एक घुट्टी पिला देते हैं।
जो दोस्त हैं वे टाइमपास हैं,क्योंकि सभी अपनी अपनी महत्वाकांक्षाओं के घोड़ों पर सरपट दौड़ रहे हैं। बहुत अच्छी मुलाक़ातों के बावजूद किसी को किसी के मन में झाँकने की फुर्सत नहीं है। इससे अच्छी तो अन्तर्जाल की गोल दुनिया है जहाँ हम अपना समय गुजार लेते हैं और अपने मन के उद्गार लिख छोड़ते हैं। एक आध हैं जैसे – त्रिभुवन जी और सौरभ जी, जो कभी कभार इस विषय पर चर्चा कर लेते हैं बाकी सब अपनी दौड़ गिरते, सँभलते, रोते, गाते दौड़ रहे हैं। फिर भी चर्चा समाधान नही है।
ज़िन्दगी अपेक्षाओं, आकांक्षाओं और जिम्मेदारियों के बोझ तले पिस रही है। मन की कोमल संवेदनाएं कुम्हला रही हैं।
आदर्श की बात सभी करते हैं। माँ बाप, रिश्तेदार, शिक्षक और पुस्तकें, जो भी होता है आदर्शों की सीख देने से नहीं चूकता, परन्तु कहीं कोई यह बताने वाला नहीं है कि आदर्शों को जीवन में उतारने की प्रक्रिया क्या हो।
हमें कोई बताए तो सही कि हम उलझनों से कैसे बाहर निकलें। कोई हमें सुनने वाला तो हो। हमें तो बस डांटने, समझाने और नसीहत देने वाले मिलते हैं।



3 comments:
bhagwan aap jesa beta sab ko de
is umar me ye tever
bhut accha
regards
keep on writing
regards
मांबाप हमेशा मांबाप रहते हैं और बच्चे हमेशा बच्चे.
मैं सुनती हूँ मनीष आप कहिये..
चलिए एक किस्सा सुनती हूँ मेरा एक दोस्त था नितेश नाम था उसका ..जब भी मैं उससे बात करती और परिवार और माता-पिता के बारे मे पूछती चिड़कर जवाब देता .."चुप करो लवली सब मतलबी होतें हैं ..जब पढता था २ महीने तक कोई फोन नही करता था अब जॉब करता हूँ तो सब लोग २ -३ दिन के अन्तराल पर हाल-चाल पूछ्तें हैं ." मैं उसे समझाने की कोशिस करती तो खीज के कहता मैं कोई बच्चा नही जो तुम उन्हें जस्टिफाई कर रही हो मैं चुप हो जाती थी.
बाद मे सोंचा शायद सही भी है ..थोडी मेहनत कीजिये सब ठीक हो जाएगा.हर वक्त एक सा नही रहता .हाँ अध्यात्म के बारे मे मैं कुछ नही कह सकती नास्तिक हूँ.
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