Tuesday 14 October 2008

अँगरेज़ी स्कूल की भोजपुरी विडम्बना

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            कितने सपने बुनकर वे दोनों स्कूल से भागे थे। सपनों को काफी हद तक उन्होनें साकार कर दिया लेकिन उन्हें महसूस होता है कि कहीं कुछ कमी रह गयी है। वे दोनों एक प्रतिष्ठित कालेज के अध्यापक थे। अमृत जो कि ईसाई समुदाय से था और श्वेता जो कि ब्राह्मण समाज की कन्या थी। कई दिनों से स्कूल में उनकी गतिविधियाँ शंकास्पद थीं। अन्ततः वे दोनो स्कूल से भाग कर कहीं दूर चले गये और वहीँ शादी भी कर लिये। एक बच्चा जनने के पश्चात श्वेता वापस आयी और अमृत बाबू भी आये। बुनियादी समस्याओं से जूझने के बाद उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया गया। वे वापस स्कूल में नौकरी हेतु पहुँचे परन्तु उन्हें वहाँ से निराश ही लौटना पड़ा।

      हाँलाकि ये अलग बात है कि उस स्कूल के मैनेजर बाबू माननीय बजरंग तिवारी लगभग सभी धर्म अपना कर छोड़ चुके है और उन धर्मों की धरोहर स्वरूप तीन चार पत्नियाँ भी हैं लेकिन इन सबके बावजूद वो कभी किसी के साथ भागे नही बल्कि अपने पीछे धर्म के ठेकेदरों को भगाये हैं और अपने इशारों पर नचाये भी हैं।

       बिना नौकरी के कुछ कर पाना ज़रा मुश्किल होता है। लेकिन धन्य हो उन अँगरेज़ों का जो अमृत बाबू के बाप को कई एकड़ जमीन दे गये क्योंकि तब के ज़माने में उनके बाप पूरे सूबे के एकमात्र सर्प चिकित्सक थे। शायद कोई अंग्रेज अफसर इनके हाथों बच गया होगा और इनाम स्वरूप इनको ज़मीन का एक बड़ा टुकड़ा मिल गया।

       कुछ वर्षों की तपस्या से उसी ज़मीन के एक छोटे से टुकड़े पर अमृत बाबू ने एक स्कूल की स्थापना की जो कि उस क्षेत्र का पहला अँगरेज़ी माध्यम वाला स्कूल था। अमृत बाबू मैनेजर बन गये और श्वेता जी प्रधान अध्यापिका।

      सब कुशल मंगल चल रहा था कि एक दिन गार्जियन मीटिंग के दौरान एक छोटी सी घटना हो गयी। एक महाशय अपने सुपुत्रों के साथ आये जिन्हें केवल ठेठ भोजपुरी भाषा का ज्ञान था उनके बच्चे अच्छे अंक नही ला पाते जिसके करण वे शिकायत ले आये थे। मौके वारदत पर मैं भी अपनी छोटी बहन के साथ उपस्थित था।

पेश है उनकी बातचीत के कुछ अंश –

श्वेता जी – (प्रथम कुछ वाक्य अँगरेज़ी में …)

महाशय – बूझनी नाय …

श्वेता जी – (बात समझते हुए) जी मैने कहा, “ आपको क्या कहना है हमारे स्कूल और अपने बच्चों के बारे में?”

महाशय – (अपने बच्चों की तरफ मुखातिब होकर) का कहतहिय रे!!?

बच्चे उन्हे भोजपुरी में बताये उनके अंदाज़ से लगा कि ये ‘रे’ शब्द को सम्मानजनक मनते हैं और फ़िर

महाशय – कहै के त बहुतै है पहिले इ बताव तोहने का पढ़ावत हवा रे ? आँय ! इ ससुरन के कुछ अवेला जाला नही।

श्वेता जी – देखिये श्रीमान आप ढंग से बात कीजिये

महाशय – तैं ढंग सिखइबी आँय !? तही न भागल रहली… दूसरहू के इहै सिखइबी आँय !!?

श्वेता जी – सर यहाँ परसनल बातों के लिये कोई जगह नही है। आप अपनी समस्या खुल कर बताइए।

महाशय फ़िर बच्चों की तरफ मुड़े और भोजपुरी में व्याख्यित वाक्य सुने।

महाशय – हमहूँ के कौनो शौक ना हौ। हा त कहत रहली कि ससुरन के कुछ ना अवेला तोहने का पढ़ावत हवा?

     अबकी बार श्वेता जी अपने को रोक न सकी और मैनेजर साहब को बुला लायीं। मैनेजर साहब आये और उन्हे उनके ढंग से समझाये और रवाना कर दिये।

     दोनों जन कुर्सी पकड़ कर बैठ गये और अपना माथा पीट लिये। मुझे सामने देख श्वेता जी अपने आप को संयमित की और मैनेजर साहब को सँभाला। मैनेजर साहब ने मुझे देखा और बोले – आइये मनीष बाबू !! देख रहे हैं न!? साले जहिल गँवार कैसे बात करते हैं। श्वेता जी ने कहा – इट्स टू मच, उसको मेरी निजी ज़िन्दगी के बारे में कुछ कहने की क्या ज़रूरत थी।

      और फिर बातें चल पड़ी। पूरा इतिहस भूगोल दोनों लोगों ने मेरे सामने उड़ेल दिया कि कैसे कैसे इस स्कूल के बारे में हम लोग सोचे और यहाँ तक पहुँचे।

     मैं बस उनकी हाँ में हाँ मिलाता रहा। रह रह कर अशिक्षा पर भी बोल देता। जब सारी बातें उड़ेल दी गयीं तो दोनों अपने आप को तरोताजा महसूस किये।

      मैं वापस चला आया। वापस आते समय श्वेता जी के कुछ शब्द सुनाई दिये थे वो अपने उनसे कह रही थी कि आज के बाद वो मीटिंग अटेंड नही करेंगी। अमृत जी अपने सपनों में सुधार करने का विश्वास दिलाते हुए उन्हे घर के अन्दर लेकर चले गये थे।

और दूसरे शनिवार का दिन उनके लिये समाप्त हुआ।

1 comments:

लवली / Lovely kumari said...

क्या इन्हे अनपढ़ लोगों से कुछ और अपेक्षा थी .खैर आपकी हालत देखने लायक होगी है न ? :-)