Sunday 27 July 2008

धन्य है ......

allahabad ke log

वैसे तो इलाहाबाद मशहूर शहर है। पौराणिक काल से इसका नाम लोगों की जुबाँ पर चलता-फिरता है। इन दिनों इलाहाबाद के रहने वाले खासकर गरीब तबके के लोग, जो कभी स्कूल नही गये, वे ऐसी हरकते करना शुरू कर दिये है कि लोग कभी इलाहाबाद का नाम भूल भी न पाये।

अगर आप स्टेशन पर उतरे और मेन गेट से बाहर आये तो पहले यही लोग आपका स्वागत करते हैं। फूल माला न सही अपनी आटो में जबर्दस्ती तो बैठा ही देते हैं। अगर आपने कुछ ज्यादा शरीफ बनने की कोशिश भी की तो लुट जायेंगे।

और ये लोग स्टेशन को ‘टेशन’ कहते हैं कोई बाहर से आये और बोले भाई स्टेशन जाना है तो ये आश्चर्य से कहेंगे “टेशन”!!! मानो सही शब्द यही जानते हैं।

खैर बाते तो कई हैं लेकिन पिछ्ले दिनों एक हरकत दिखा दी इन्होनें। सरकार गिरने वाली थी पढ़े लिखे लोग हर नुक्कड़ पर यही चर्चा करते। नतीजन इन्हें भी जानने की जिज्ञासा हुई कि आखिर देश में हो क्या रहा है। कही पाकिस्तान ने हमला तो नही कर दिया।

आनंद भवन के सामने सरकार बचाने हेतु हवन होने वाला था। एक इलाहाबादी बड़े रौब से अपनी बगल वाले से कहा – अमे!! का होत है? जवाब मिला – सरकार गिरने वाली है। इलाहाबादी ने फिर पूछा – मायावती वाली कि सोनिया वाली ???

लेकिन इस बार जवाब नही मिला बस एक जोरदार ठहाका उठ पड़ा और कोई समझदार इलाहाबादी बोला – हा हा ……… इ माधर… का नही पता। अमे! का जानते हो कुछ जानते भी हो।

इनके कुछ शब्द भी जरा हट के होते हैं। रिक्शे को रिश्का, बुशर्ट को बुशकट,अमरूद को अरमूद, पैन्ट को पाइन्ट, फ़ैक्टरी को फैटकरी आदि आदि।

एक बार अखबार पढ़ते हुए एक इलाहाबादी ने अपने मित्र से पूछा – अमा यार !! इ “युवती” नाम की लड़की के साथ आजकल बहुत लफड़ा हो जा रहा है। कल छपा था युवती के साथ बलात्कार और आज छपा है युवती की हत्या। पहले भी कई बार इसका नाम अखबार में आ चुका है किसी के साथ भागी भी थी। इतना सुन कर उसके दोस्त नें गालियों से नवाज़ते हुए उसे समझाया था कि 18 से 25 बरस की लड़कियों को युवती कहते हैं।

इनके ऐसे कारनामों की फेहरिस्त काफी लम्बी है।

धन्य है इलाहाबाद और धन्य हैं ऐसे इलाहाबादी !

4 comments:

RAJENDRA said...

मनीष भाई,इलाहाबादियों के बारे में आपके ब्लॉग में पढ़ने को मिला। ये काम वैसा ही लगा जैसे हडप्पा में हाथी के दांत खोजना और फिर साबित करना की दांत हाथी के ही हैं। जहां तक 'स्टेशन' को 'टशन' कहने की बात है ये उनकी मादरे ज़बान है और उनके बोलने के अंदाज़ में बेहद खूबसूरत लगता है लेकिन बाकी शब्द मैने नहीं सुने। जहां तक बात स्टेशन से ऑटो में जबरदस्ती बैठाने की है तो ये रोजी रोटी कमाने के दबाव है। महंगाई में खाली ऑटो ले जाना बेहद नुकसान देह है। लेकिन वहां के ये अनपढ़ लोग कभी किसी से ज्यादा पैसे नहीं लेते जितना तय रेट उतना ही लेते हैं। समाज के लिए बेहतर सोचना और बेहतर काम करने वाले केवल डिग्रीधारी ही नहीं है। दोस्त, हालात ने उन्हें किताबों से दूर रखा लेकिन वे कोई चोर लुटेरे नहीं है। जहां बात राजनीति की है तो किसी चाय की दुकान में कप उठाने वाले से भी ओबामा और हिलेरी क्लिंटन के चुनाव के बारे में जाना जा सकता है....राजनीति वहां खून में है...ऐसे में मैं कन्फयूज़ हूं कि आप किस इलाहाबाद के बारे में बात कर रहे हैं। अमा जैसे शब्द कभी इलाहाबाद का हिस्सा नहीं रहे...
ये शब्द कानपुर या फतेहपुर से इलाबाद पढ़ने जाने वाले ज़रूर बोलते मिल जाएंगे।

जहां तक दोस्तों को समझाने के लिए बोले जाने वाले शब्दों की बात है तो भोषड़ी के और मादरचोद जैसे शब्द भी इन्हीं इलाकों के छात्रों की देन हैं..वहां के समाज में जिसकी आप चर्चा कर रहे हैं प्रचलित शब्द हैं भोषड़िया के, गड़िया तोड़ब तब पता चलि हे...
ज्ञान विज्ञान की नगरिया का नाम खूब किन्हा रे बाबू तोखा बड़ा धन्यवाद....
राजेंद्र

vipinkizindagi said...

आपके पोस्ट हमेशा ही अच्छे होते है........

बेहतरीन प्रस्तुति है ....

Udan Tashtari said...

धन्य है इलाहाबाद और धन्य हैं ऐसे इलाहाबादी !

Manish said...

लगता है राजेन्द्र भाई को इलाहाबाद से ज्यादा लगाव है, तभी तो बात को पूरा समझे बगैर हाथी खुजलाने लगे।

भाई, मैने गरीब तबके के लोगों के बारे में आँखों देखी घटना का उल्लेख किया था। लेकिन जल्द बाजी में आपने गलत मतलब समझ लिया।

ऐसा नही है कि इलाहाबाद के बारे मे मैने कुछ जानता नहीं। लेकिन कुछ घटनाये जब घटती हैं तो वे इतिहास नही देखती कि कल यहां क्या हुआ था।

बस एक हल्की सी बात थी तो शेयर कर दिया … बाकी सब ठीक है :) :)

"ज्ञान विज्ञान की नगरिया का नाम खूब किन्हा रे बाबू तोखा बड़ा धन्यवाद....
राजेंद्र"

आपके ये शब्द कुछ चुभ से गये।

वैसे काफी जानकारी मिली आपसे, इसके लिये शुक्रिया !!!

आशा है मार्ग दर्शन मिलता रहेगा :) :)