Thursday 24 July 2008

थोड़ा सा स्नेह

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        आज कथित छुट्टियों के बाद कालेज गया था। पहले ही दिन, बड़े दिनों तक चुप बैठे प्रोफेसर साहब ने सारी कसर निकाल ली। इलेक्ट्रोमैगनेटिक थ्योरी पर इतना लम्बा चौड़ा व्याख्यान दे दिया कि अन्त तक आते आते कई सूरमों के दिमाग की इलेक्ट्रोमैगनेटिक फ़ील्ड पर खतरा मडराने लगा। कई तो वही ढेर हो गये इसके बावजूद कुछ ने एक नया रास्ता अख्तियार किया, बाहर बारिश हो रही थी लेकिन प्यास से व्याकुल होने का नाटक किया और धीरे से निकल लिये।

        उनकी कैद से छूटने के बाद हमने लाइब्रेरी की तरफ रूख़ किया कि शायद कोई हसीन चेहरा दिख जाय जो किताबों में अपनी आँखें गड़ाये हो और हम उस पर गड़ायें। लेकिन निराशा हाथ लगी। कोई तो नही दिखा पर लाइब्रेरी के रखवाले नें देख लिया और बोला – हाँ भाई, तो फाइन के 50 रूपये कब देंगे? आप किताब महीनों तक पढ़ते हैं 20 दिन में एक बार लौटा दिया कीजिये। हम दुख़ के साथ जरा सा मुस्कुराये कि चलो कोई तो समझता है कि हम किताबें महीनों पढ़ते हैं। परन्तु मुस्कुराहट कायम नही रही 50 रूपये लुटा कर बाहर आ गये।

             बारिश के नाम पर कुछ बूँदें आकाश से टपक पड़ती थीं। मौसम खुशनुमा बना था और मैं दोस्तों से विहीन प्राणी, बस टुकुर टुकुर गिरती हुई बूँदों को निहारता। कुछ पल बाद अपने 4 गुणे 5 साइज वाले कमरे पर जाने की इच्छा हुई और हम कालेज से निकल लिये। अभी कुछ दूर ही आया था कि रास्ते में लाचार और अपने में मस्त गायों को देखा जो सड़क पर, सड़क के किनारे ऐसे बैठी थी मानो मातम मनाने बैठी हैं।

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        इतने में एक लड़का उधर से गुजरा और बैठी हुई एक गाय को धीरे धीरे सहलाने लगा। अचानक मिल रहे स्नेह से गाय चौकीं और दोनों कान इकठ्ठा कर एक नज़र उस लड़के पर डाली। लड़का पुचकारने लगा नतीजन गाय भी स्नेह से विह्वल होकर खड़ी हो गयी। लड़के ने गाय के थन को गौर से देखा और पीछे लगी दुकान की तरफ मुँह करके चिल्लाया – पगला सारे ! इ गाय दूध नै देई। इतना कहकर उसने गाय को एक जोरदार घूँसा लगाया। स्नेह के बाद अचानक मिले इस प्रहार से गाय वहाँ से भागी। लेकिन कुछ दूर जाकर उसने उसी प्रेम भरे अंदाज में उस लड़के को देखा।

 

शायद वह थोड़े से मिले स्नेह का कर्ज उतारना चाह रही थी।

6 comments:

Udan Tashtari said...

हा हा!! चलो, कालेज खुल गये.. :)

बस, गाय की फोटो खींचो और छापो. बाकी तो लायब्रेरी खाली है.

अंत अच्छा लगा..!!

दिनेशराय द्विवेदी said...

मनीष जी। बात कहने का ये अंदाज पसंद आया।

डा० अमर said...

बहुत ही अच्छी तरह से वर्णित आलेख है, यह !
याद रहेगा ।

Anil Pusadkar said...

bahut badhiya.badhai aur college bhi yaad dila diya aapne

vipinkizindagi said...

bahut achcha likhte ho manishji
behatarin..........

VIPIN4ALL said...

manish ji aap to bahut accha likh rahe hai kuch hame bhi to bataeye