Sunday 13 July 2008

एक गूँजती आवाज – दही होऽऽऽऽऽऽऽऽओ : लघुकथा

 

सुबह का समय , एक छोटे से गाँव की तरफ़ से आता धूल भरा रास्ता, जिस पर दो नन्हें कदम तेजी से भागे चले आ रहे है । आँसू भरी उसकी दोनों आँखें धूल से सन गयी है ।

वह दौड़ता हुआ पुराने पोखरे की तरफ जा रहा है जहाँ जाने से वह बहुत डरता है । बचपन में वह अपनी माँ से सुना करता था कि पोखरे के पास एक बरगद के पेड़ पर एक बहुत बड़ा दैत्य रहता है । लेकिन आज वह बिना डरे उस तरफ भागा चला जा रहा है ।

वहाँ जाकर उसने उस बरगद की मोटी जड़ों को लात से मारना शुरू कर दिया कि अभी दैत्य आयेगा और उसे मार कर खा जायेगा, ऐसा उसने सुना था । वास्तव मे वह वहाँ मरने के लिये आया है । काफी देर तक हाथ पाँव मारने के बाद वह थक गया लेकिन कोई दैत्य नही आया । वह वही बरगद की मोटी जड़ पर बैठ गया । अपने धूल भरे चेहरे को पोछता हुआ सिसकने लगा और बुदबुदाने लगा कि मैं दही बेचने नही जाउंगा चाहे मुझे मार दो , मैं नही जाउंगा । सिसकते सिसकते उसे नींद आ गयी और पोखरे की तरफ से आती ठंडी हवाएँ उसे सहलाने लगी ।

बरगद की पत्तियाँ उस हवा मे कुछ गुनगुनाने लगी । उसे कुछ सपने आ रहे थे जो उसे अतीत में खींचने लगे ।

उसके पिता उसे कंधे पर बिठाकर गाँव में घूमते और वह खुश होता उनके बाल नोचता । वह अपने पिता का लाडला बेटा था । कुछ महीने पहले उसके पिता एक दुर्घटना मे मारे गये थे और चाचा ने उसके घर और खेतों पर कब्जा कर लिया । गाँव के बाहर वह और उसकी माँ एक छोटी सी झोपड़ी मे एक गाय का दूध दही बेच कर गुजारा करते । कई दिन से उसकी माँ लगातार दही बेचती रही लेकिन अचानक आज तबियत खराब होने से वह नही जा सकी थी । आज उसकी माँ ने इससे कहा तो इसने मना कर दिया । क्रोधवश उसकी माँ ने इसे एक झापड़ मार दिया और वह रोता चिल्लाता मरने चला आया ।

पक्षियों के कलरव से उसकी नीद टूटी और वह उठ बैठा , कुछ देर आँखें मलने के पश्चात वह अपने आप से बात करने लगा ।

मैं नही जाउंगा …

माँ ने मुझे मारा । आजतक तो नही मारा था , आज क्यो मारा ?

कुछ क्षण वह चुप रहा फिर धीमी आवाज में बोला – दही चहिये … दही है दूँ … भैया दही लेना है !!… …

वह सोच रहा था कि वह दही कैसे बेचेगा , क्या बोलेगा । दहीऽऽऽऽऽऽऽऽऽइ !! नहीं ये नही , लोग हसेंगे । वह खुद एक दही वाले पर हँसता था , जब दही वाला बोलता था – दहीऽऽऽऽऽऽऽऽइ तो वह अपने आंगन से चिल्लाता – खइबा त गाड़ बहीऽऽऽऽऽऽऽऽइ , और जोर से हँसता । माँ उसे मना भी करती लेकिन वह नही मानता ।

आज वह इस सोच में डूबा था कि वह कैसे बोलकर दही बेचेगा । अचानक वह जोर से बोल उठा – दही होऽऽऽऽऽऽऽऽऽओ , उसकी यह आवाज उस वीरान में गूंज उठी और वह हँस पड़ा ।

आखिर माँ कैसे दही बेचती होगी ? एकाएक उसके दिमाग मे यह प्रश्न उठा । उसने कुछ शब्द भी सोचे कि शायद ऐसे कहती होंगी और धीमी आवाज मे उसे उच्चारित करने लगा ।

उसने कई बार फेरी वालों को देखा था । चीखते चिल्लाते फेरी वाले , तरह तरह की आवाजें निकालते फेरी वाले जिन्हे वह आश्चर्य से देखता था और कई बार उन पर हँसा भी था ।

उसने सोचा- क्या लोग मेरी माँ पर भी हँसते होंगे ?

अचानक उसकी साँसें तेज चलने लगी , शरीर मे अजीब सा कंपन होने लगा और नथुने फूलने लगे । उसने अपनी मुठ्ठी भींच ली और दाँत पीसता तेजी से गाँव की तरफ़ दौड़ पड़ा ।

          उसी धूल भरे रास्ते से होते हुए …

9 comments:

Udan Tashtari said...

अति मार्मिक..बालक अब जीवन का यथार्थ समझ गया है,.सब ठीक रहेगा. शुभकामनाऐं.

उन्मुक्त said...

मार्मिक।
खड़ी पाई वाक्य के अन्तिम शब्द के बाद तुरन्त लगायें, जैसा कि मैं लगा रहा हूं। आप शायद एक जगह छोड़ कर लगा रहे हैं जिसके कारण वह कहीं कहीं अगली पंक्ति में चली जा रही है :-)

त्रिभुवन said...

सचमुच आप बडे बालमनोयोगी है

मिथिलेश श्रीवास्तव said...

वाकई मार्मिक लघुकथा!...दही....के बाद बालक जो कहकर चिढ़ाता है..वो बेहद सजीव चित्रण है.

neelima sukhija arora said...

मार्मिक लघुकथा

Nitish Raj said...

कहानी उत्तम लेकिन शीर्षक अति उत्तम। शीर्षक ने मुझे ये पढ़ने पर मजबूर कर दिया। पढ़कर अच्छा लगा। यथार्थवाद...उत्तम।

Madurai citizen said...

mi madurai sourashtra!
moka hindi kelaanaa
thumi more bloggum avi ads kilik keruvo
Jai Sai Ram

vipinkizindagi said...

मार्मिक..... बेहतरीन ......
मेरा ब्लॉग भी देखे

rakhshanda said...

dil ko chhoo gayi aapki ye jazbaati kahani...
kafi dino bad aa payi...hope u'll b fine friend