Thursday 10 July 2008

एक एहसास



भारी वर्षा हो रही है ,मेरे सामने एक नन्हा बच्चा बालकनी में बैठा बारिश की मोटी बूँदें देख रहा है । सामने ही कुछ इमारतें खड़ी हैं । मैं धीरे से उसकी बगल में बैठ जाता हूँ , और अपनी नजरों से उस एहसास को महसूस करना चाहता हूँ जो छोटा बच्चा महसूस कर रहा है । मुझे दिख रही है केवल बारिश की बूँदें और सामने का घर …… शायद बच्चे को भी दिख रही हैं ।

अचानक आसमान में एक चकाचौंध कर देने वाली बिजली चमक जाती है छोटे बच्चे की आँखें मुँद जाती है और मेरे सामने तैर जाते हैं कुछ दृश्य ।


बारिश में भीगे ढेर सारे पेड़ , दूर तक फ़ैला वो ज़मीन का टुकड़ा जो कि हल्के कुहासे के धुंधलेपन में सराबोर है और उपर से गिर रही बारिश की बूँदें उस धुंधलेपन पर सफेद आँचल डाल दे रही है ।


वो पत्तियों में छिपी भीगी चिड़िया जो अपने पंखों को झटक रही है और बूँदें लगातार उसे भिगो रही है । कोयल की कूक जो कहीं दूर से आ रही है धीमी सी, बारिश मे ज़मीन की भीनी सी खुशबू घुल गयी है अंतरंग में ।


अलसाया हुआ उल्लू बैठा है एक डाल पर और उसे चिढ़ाते हुए हम चीख रहे हैं एक सुर में । सरसराती हुई झाड़ियां जिसमें एक साँप होने की उम्मीद है ,और डरे हुए हम एक झलक पा जाने की उम्मीद में नज़रें टिकाये हैं ।


गदराई हुई जामुन के काले गुच्छे लटक रहे हैं हमें चिढ़ाते हुए , जिसे ज़मीन पर पटकने को उतारू हम सभी डाल झकझोड़ रहे हैं । बगल के आम के पेड़ पर लटके एक पीले आम को देख कुछ बन्दरनुमा लड़के बारिश मे भीगते हुए चढ़े जा रहे है उसे तोड़ लाने के लिये , और लाचार से खड़े हम बोरिये की चादर ओढ़े बस टुकुर टुकुर ताक रहे हैं मुँह में लार लिये ,


एक साथी कीचड़ मे गिर पड़ा है जिसे जोर से रुलाई आ रही है लेकिन बनावटी हँसी हँसे जा रहा है और उसकी आँखो से अनायास ही निकल जा रहे कुछ आँसू । दूर से आती ठंडी हवाओं में मन बहक रहा है और एक लम्बी दौड़ दौड़ने को बेकाबू सभी का मन , लेकर आम के पत्ते की फिरंगी ।



अचानक आई बादलों की गर्जना ने सारे दृश्य छीन लिये और बेसुध सा बैठा मैं अभी भी फिरंगी लेकर दौड़ रहा हूँ , साँसें तेजी से चल रही हैं लेकिन हाथ खाली है । अजीब सी नजरों से छोटे बच्चे ने मुझे देखा और बारिश की बूँदों को देखने मे व्यस्त हो गया ।



एक एहसास , जो आज भी घुला है मन के एक कोने में । देता है कभी कभी अजीब सी अनुभूति ।



बच्चा अभी भी बारिश की टूट रही बूँदों को देख रहा है , सामने खड़ी इमारत उसे रोक रही है सामने फैले वीरान मैदान देखने से , कंकरीट की सड़क मिट्टी की खुश्बू छीन ले रही है और भी बहुत कुछ जो छिपा है बच्चे की नज़र से । क्या वह कभी देख पायेगा उस मंजर को जो अभी मेरे आँखो से गुजरा है ।


शायद कभी नहीं ………



नोट - काफ़ी कुछ लिखने की फ़िराक मे था , भावनाएं उमड़ रही थी कि अचानक आये एक खलल ने सब कुछ उजाड़ दिया ।


एकान्त अब नही रहा ………





3 comments:

Rajesh Kamal said...

very nice!

अनुराग said...

khyaal fir pakidiye aor badlo se dua kariye fir paani barsaye ...aor kalam utha lijiye...

Udan Tashtari said...

Are, Abhi to barish shuru hui hai..Kalam thame raho-phir se girne ka intezaar karo-Badhiya hain-Seasonal lekhak kahlaoge-jo sirf barish me likhta hai. :)