Thursday 26 June 2008

गुरु के बचन

 

पिछली बार आपने गुरु बानी का रस लिया । अब पेश है उससे आगे एक और कविता जो कि पिछली बार के प्रसंग पर ही आधारित है ।

 

आ बचवा , चल चिलम लगा दे !

 

रात भई , जी अकुलाता है

कैसा तो होता जाता है

ऊ ससुरा रमदसवा सरवा

अब तक रामचरित गाता है

रमदसवा जल्दी सो जाए

ऐसा कोई इलम लगा दे !

 

आ बचवा , अन्दरवा आजा

हौले से जड़ दे दरवाजा

रामझरोखे पे लटका दे

तब तक यह बजरंगी धाजा ।

 

हाँ , अब , सब कुछ बहुत सही है

फट से ‘फायर फिलम’ लगा दे !

 

अंत मे जिस ओर इशारा है वह साफ़ है - 'फट से फायर फिलम लगा दे' ।

धार्मिक चीजों पर गंभीर व्याख्यान देना , सम्प्रदायवाद आदि के बारे में लेख आदि लिखने के समानांतर ये कविताएं साधुओं - महंतों के भ्रष्टाचार उजागर करती हैं ।

 

ये सारी रचनाएं 'परिकथा' नामक पत्रिका से ली गयीं हैं ।

आप सब तक पहुँचाने का माध्यम बन कर आपके बीच मुस्कुरा रहा हूँ ।

2 comments:

Debu said...

manish bhai...aapke jaise sahas lekhni mein bahoot kam dekhne ko milta hai...aur yahi hamaare dil ko bha jaata hai...aapki lekhni se aapki umra ka pata hi nahi chalta...kahin aap lux to nahi lagaate...khair yeh to majaak hua...lekin such mein aap ek din bahoot vikhyaat lekhak banegei...aisa mera dil kehta hai...luv u ....aap soch rahe honge ki yeh bhi kaisa ladka hai jo luv u keh raha hai...lekin yeh aapki lekhni ko samarpit hai...aapse milne ko dil karta hai..ab aap phir soch rahe honge...khair jo bhi ho....aapko shubhkaamnayein...

Rajesh Kamal said...

a reason to smile...