Thursday 26 June 2008

गुरु बानी

 

खैनी चूना बिन दुःख दूना

सब जग सूना लागे है

मैं तो मैं ना ही हूँ , बचवा !

तू भी तू ना लागे है।

 

राम - नाम से जी उचटे है

जब से डिबिया खतम भई

आकुल मनवाँ सिमरन – पथ से

किधरो – किधरो भागे है ।

 

तू तो, बचवा ! दया धरम का

बड़ा धनी है , कर्मठ है

नेम – जोग व्रत – संजय में भी

सब भगतन से आगे है ।

 

जा बचवा , चुपके से लइहो

चमटोली से चुटकी भर

मेरा नाम न लीहो, कइहो –

नया भगतवा मांगे है ।

 

साधु महात्माओं के कितने चरित्र भ्रष्ट होते हैं “गुरु बानी” बतलाती है।

भ्रष्ट ---- शब्द आगामी प्रस्तुति के लिये है । :)

नोट - अध्ययन के दौरान मिली कुछ नायाब कृतियाँ ।

आगे जारी है ……………

3 comments:

advocate rashmi saurana said...

Manishji aapke blog par pahali bar aai.aapko padhana aacha laga. age bhi bani rahugi. acchi rachana ko padane ke liye aabhar.

Mired Mirage said...

कविता बढ़िया है, साधू संतों के चरित्र के बारे में पता नहीं।
घुघूती बासूती

Udan Tashtari said...

नया भगतवा मांगे है--हा हा!! बहुत सही..नाम तो नहीं ही लिया होगा मगर चमटोली से चुटकी भर ला पाया कि नहीं??