महानगर के जग - मग करते व्यस्त
राजपथ के इस पार
जाने कब से ताक रही हैं टुकुर - टुकुर
बकरी लाचार
उसको क्या मालूम कि यह हैं
बधिकों की नगरी खूंखार
उसके सिर पर स्वार्थ लोभ की लटक रही
चम् - चम् तलवार
उसके भूचुम्बी थन घिस - घिस छिल
छिल जाते बारम्बार
दूध भरे थन से रह रहकर बह पड़ती
लोहू की धार
उसके लिए नहीं रूक सकती पलभर
ट्रैफिक की रफ़्तार
माँ - माँ करते उसके बच्चे आस देखते
हैं उस पार .
ये कविता आल्ह छंद मे हैं .इसके लेखक कौन हैं ये तो पता नहीं . लेकिन नामवर सिंह ने अपने एक इंटरव्यू मे इस कविता को पढा था . मैंने जब इसे पढा तो बहुत ही प्रभावित हुआ .....और सोचा कि इसे आप सभी को चुसकाऊं . इस रसीली कविता के रस को ...........
कुछ और कवितायेँ हैं ........
जो कि अगली बार ....



2 comments:
चुसक गये महाराज,,,...बहुत गजब और मारक रचना है. आभार इस चुसकवाने के लिए. :)
बेहतरीन कविता पढ़ानें के लिये बहुत बहुत धन्यवाद , बधाई
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