Monday 23 June 2008

अनुरोध का सिलसिला

वैसे अनुरोध तो हर 'आम' इन्सान कर सकता है लेकिन पिछले कुछ दिनों से "अनुरोध" की बाढ़ सी आ गयी है । जिसमे अनुरोध का सिलसिला ऐसे चला मानो चींटीयों की कतार ।

आपसे विशेष अनुरोध है कि इस अनुरोध के सिलसिले को पढ़ कर अपने बाल न नोचियेगा ।

दरअसल इस सिलसिले की शुरुआत तो बहुत पहले ही हो चुकी थी । लेकिन अंत शायद कभी न हो । शुरुआत में एक सज्जन ने अनुरोध किया कि भाई साहब एक गिलास पानी है क्या? मैनें हामी भरते हुए कहा - हाँ ……बस सिलसिला चल निकला । वे मेरे कमरे मे आये और देखा कि मैं कुछ लिख रहा हूँ । बड़ी उत्सुकता से उन्होनें उस पर नज़र दौड़ाई और बोले भाई कैसे लिखते है वो भी हिन्दी में !!
हमने कहा - उसके लिये कम्प्यूटर की ज़रूरत पड़ती है । वे पहले खिसियाये फ़िर तैश मे आकर बोले दो दिन मे लेंगे आप दिलायेंगे । उन्होने विशेष अनुरोध किया । मैने कहा - क्यों नहीं !

दो दिनों बाद वे फ़िर हाज़िर हुए और कहे चलते हैं मैने उनके इस अनुरोध को माना और चल दिये इन्दिरा भवन । अच्छे खासे दाम को देख कर पहले वे घबड़ाये फ़िर कहे क्रेडिट कार्ड चलेगा । मैने एक नज़र इनकी पतलून पर दौड़ाई । फ़टी जेब से एक चमचमाता क्रेडिट कार्ड बाहर निकला और मेज पर धराशायी हो गया । दुकानदार ने पहली बार इस वाहियात चीज को देखा और दाँत निपोरते हुए बोला - हें हें हें भाई यहाँ तो कैश चलता है । इतना सुन कर भाई बोले भिखारी हो क्या ? जबकि अभी तक दुकानदार इन्हें समझ रहा था ।

मैने उन्हें किसी और दुकान मे चलने का अनुरोध किया । 10 - 15 दुकाने घूमने के बाद एक जगह क्रेडिट कार्ड की सुविधा मिली , और मेरी जान को छुटकारा मिला । संगणक यंत्र खरीद लेने के पश्चात हमसे अनुरोध किया कि हिन्दी वाला साफ़्ट्वेयर दे दीजिये । हमने दिया । 10 घंटे अभी बीते नही कि दौड़ते आये बोले - " वायरस आ गया है जल्दी चलिए "

ऐसी बातें लगभग रोज होती । जो चीज समझ मे नही आती वह उनके लिये वायरस होती । मेरा जीना हराम कर दिया । मैनें उनसे अनुरोध करने उनके कमरे पर जा पहुँचा कि भई रोज - रोज वायरस आता है तो आप किसी डिप्लोमा कोर्स के लिये आवेदन कर दीजिये । लेकिन वहाँ देखा एक और भाई कम्पूटर लेने को उत्सुक थे बोले भाई मुझे लैपटाप चाहिये दिला देंगे ? हमने कहा भाई लैपटाप बहुत खराब होता है "नाजुक" चीज होती है बलिष्ठ हाथों मे ज्यादा दिन तक नहीं टिक पायेगी । वे कहे - मेरे मामा चाचा फूफा सब लिये हैं लेकिन आज तक खराब हुआ । मैने मन मसोस कर कहा - ठीक है लैपटाप चलाने का खानदानी रोग है तो ठीक है । कल ले लेंगे वे बोले नहीं अभी चाहिये । हमने एक बारगी सोचा कि कहां से मैने लैपटाप ले लिया और आफ़त मुफ़्त आ गयी । मैने अपने जीजू से अनुरोध किया कि आज का खाना वे बना दे खाने के वक्त आ सकेंगे । इतना सुन कर वे लाल पीले होने लगे बोले - ठेकेदार हो गये हो ???

मैनें उन्हें भी इस कमीनी चीज को दिलाया और घर आकर लेट गया । एक - दो दिन तक विशेष राहत मुझे दिया गया लेकिन अगले दिन हाँफ़ते हुए आये बोले - हैंग हो गया , हैंग हो गया । हमने पूछा - क्या ? वे बोले दो बेवकूफ़ फ़ार्मेटिंग कर रहे हैं ……चार घंटे हो गये अभी तक हुआ नहीं । अभी कुछ देर पहले एक विस्फोट हुआ और अब लैपटाप स्टार्ट ही नहीं हो रहा है । मैने एक गहरी सांस ली और कहा चलिये - वहाँ जाकर देखा कि दो बहादुर सीडी डीवीडी अन्दर बाहर कर रहे हैं कोई पावर बटन को मरोड़ रहा है । मुझे देख लोगों ने मुझे स्थान दिया और बोले आप भी तोड़ लीजिये ……बड़ा मजा आ रहा है नया नया लैपटाप चलाने में ,लेकिन पता नही क्या दिक्कत आ गयी चल नहीं रहा है । मैनें अनुरोध किया कि आप लोग मुझे अकेला छोड़े तो कुछ सोच पाउं । दोनो वीर खीस निपोरते हुए रफ़्फ़ूचक्कर हो गये ।मानो कहीं नेवता खाने आये हों ।

दो दिन की कठिन मशक्कत के बाद उनका लैपटाप सही हुआ और मैने कहा भाई अब देखना खराब न हो , आपसे अनुरोध है । उन्होने फ़िर अनुरोध किया कि मुझे भी ब्लाग के बारे मे बताईए मैने एक ब्लाग बना कर दिखाया तो वे 5-6 ब्लाग बना कर बैठ गये और लिखे कुछ नहीं । कुछ दिन बाद कहे कोई कमेंट नही आया मैने कहा ब्लाग्वाणी पर चले आईये । बहुत खलिहर बैठे हैं आपको देखने के लिये । आपकी कालजयी रचनाओं को पढ़ने के लिये । तो कहे ये क्या होता है ? मैने कहा - ब्लाग का अखबार !!

हमसे कहे कैसे नामांकन कराये …………मैनें कहा - यार पता नही । मुझे तो समीर जी ने घसीटा इस 'दलदल' में । मुझे भी घसीटवाइये । मैने कहा -- ठीक है । समीर जी से अनुरोध करूंगा ।

मैने समीर जी से अनुरोध किया , उन्होने मैथिली जी से अनुरोध किया , मैथिली जी ने किसी सहायक से अनुरोध किया होगा । लेकिन सहायक ने एक बार ब्लाग देख कर अनुरोध को लात मार दी होगी । बेचारे आज भी अनुरोध करते हैं कि एक बार फ़िर से अनुरोध करूं लेकिन डर लगता है कि कहीं मुझे न लात पड़ जाये । सो आज तक यही बहाना मार रहा हूँ कि भाई ब्लागवाणी पर कुछ काम चल रहा है । काम पूरा होते ही आप भी 'दलदल' के सदस्य होंगे । लेकिन अनुरोध का सिलसिला आज तक नहीं रूका ।

मैनें उन्हें बहुत चिरकुट टाइप का घोषित कर दिया है लेकिन हैं बड़े अच्छे इन्सान ! अध्यात्म , नैतिकता , सदाचार से ओतप्रोत हैं बस मेरी जान के पीछे पड़े रहते हैं और अनुरोध पर अनुरोध करते ही रहते हैं ।
कभी इस काम के लिये कभी उस काम के लिये ………………

2 comments:

Udan Tashtari said...

जब इतना लिख ही मारे हो तो एक बार हमसे और अनुरोध भी करके देख ही लो..जरा फिर से भेजना ब्लॉग पता. :)

Manish said...

theek hai .....bhej denge.... :)