Wednesday 11 June 2008

बचपन की यादें

 

वो बचपन की यादें कहानी बड़ी सी

कहानी में राजा और रानी खड़ी सी

वो राजा और रानी के महलों का डेरा

वो महलों की भी एक कहानी बड़ी सी

वो बचपन की …………

 

कोमल परों से वो ऊँची उड़ानें

कहाँ खो गये , अब मेरे वो ज़माने

सारे जहाँ में भी जागीर अपनी

जहाँ हर घड़ी मन में महफ़िल सजी सी

वो बचपन की …………

 

हमारे लिए हर था वादा अधूरा

अधूरी थी रातें या सपना अधूरा

कभी खुद सजाते थे सपनों का आंगन

वो आंगन में खुद की परछायी बड़ी सी

वो बचपन की …………

 

वो पोखर के पानी में कश्ती का डेरा

कश्ती का मालिक था , मैं एक अकेला

कश्ती में बस्ती का घर-घर समाया

कोई मुस्कुराया वो कैसी खुशी थी

वो बचपन की …………

 

वो चलते हुए टिमटिमाते सितारे

जिन्हें छत पे लेटे हम रातो निहारे

कभी हम पुकारें चले और तारें

तारों बेचारों की छोटी दरी सी

वो बचपन की …………

 

                  लेखक - प्रिय मित्र शत्रुधन दूबे

जगजीत सिंह के बाद इन्हीं का नबंर आएगा , ऐसा लगता है।

शब्दों मे जगजीत सिंह की एक ग़ज़ल की मिलावट नज़र आ रही है ।

लेकिन कभी कभार मेलजोल बढ़ाना अच्छा लगता है ।

5 comments:

Udan Tashtari said...

हम तो इसे पेरोडी ही कहेंगे..मगर है बढ़िया.

mehek said...

bahut khubsurat lagi ye rachana badhai

बाल किशन said...

बचपन की खूबसूरत वादियों मे ले गई आपकी ये पोस्ट.
बहुत ही उम्दा लिखा आपने.

mamta said...

राजा, रानी तारे,पानी, कश्ती बचपन की यादों मे खींच ले गए।

Madurai citizen said...

हम तो इसे पेरोडी ही कहेंगे..मगर है बढ़िया.

बचपन की खूबसूरत वादियों मे ले गई आपकी ये पोस्ट.
बहुत ही उम्दा लिखा आपने.

राजा, रानी तारे,पानी, कश्ती बचपन की यादों मे खींच ले गए।