वो बचपन की यादें कहानी बड़ी सी
कहानी में राजा और रानी खड़ी सी
वो राजा और रानी के महलों का डेरा
वो महलों की भी एक कहानी बड़ी सी
वो बचपन की …………
कोमल परों से वो ऊँची उड़ानें
कहाँ खो गये , अब मेरे वो ज़माने
सारे जहाँ में भी जागीर अपनी
जहाँ हर घड़ी मन में महफ़िल सजी सी
वो बचपन की …………
हमारे लिए हर था वादा अधूरा
अधूरी थी रातें या सपना अधूरा
कभी खुद सजाते थे सपनों का आंगन
वो आंगन में खुद की परछायी बड़ी सी
वो बचपन की …………
वो पोखर के पानी में कश्ती का डेरा
कश्ती का मालिक था , मैं एक अकेला
कश्ती में बस्ती का घर-घर समाया
कोई मुस्कुराया वो कैसी खुशी थी
वो बचपन की …………
वो चलते हुए टिमटिमाते सितारे
जिन्हें छत पे लेटे हम रातो निहारे
कभी हम पुकारें चले और तारें
तारों बेचारों की छोटी दरी सी
वो बचपन की …………
लेखक - प्रिय मित्र शत्रुधन दूबे
जगजीत सिंह के बाद इन्हीं का नबंर आएगा , ऐसा लगता है।
शब्दों मे जगजीत सिंह की एक ग़ज़ल की मिलावट नज़र आ रही है ।
लेकिन कभी कभार मेलजोल बढ़ाना अच्छा लगता है ।



5 comments:
हम तो इसे पेरोडी ही कहेंगे..मगर है बढ़िया.
bahut khubsurat lagi ye rachana badhai
बचपन की खूबसूरत वादियों मे ले गई आपकी ये पोस्ट.
बहुत ही उम्दा लिखा आपने.
राजा, रानी तारे,पानी, कश्ती बचपन की यादों मे खींच ले गए।
हम तो इसे पेरोडी ही कहेंगे..मगर है बढ़िया.
बचपन की खूबसूरत वादियों मे ले गई आपकी ये पोस्ट.
बहुत ही उम्दा लिखा आपने.
राजा, रानी तारे,पानी, कश्ती बचपन की यादों मे खींच ले गए।
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