चिलचिलाती धूप
दूर तलक झिलमिलाते
सूखे पेड़
और फैली वीरानियां
सूखे तिनके भी
तड़प उठते हैं
कड़कते हुए
इस झुलसती लू से
कटीली झाड़ियों से
निहारता गिरगिट
सिर को ऊपर नीचे
करते हुए
गोबर के बीच
छिपा गुबरैला
मल की गोलाइयां
बना रहा है
एक भटका पंक्षी
तलाश रहा है
हरे पत्तों की
छाँव
इसी दौरान मेरा
हलक सूख जाता है
और
मचल उठता है
पानी की
एक बूँद के लिए !




3 comments:
हाय रे ये गर्मी!!!
बहुत यथार्थ चित्रण.
बहुत सुंदर ,गर्मी और प्यास...
good job...
apka likhney ka andaaz bahut acha hai
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